इंसान ने जब पहली बार आसमान में उड़ने का सपना देखा होगा, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन विमान इतनी तेज रफ्तार से उड़ेंगे कि पिस्टन इंजन पीछे छूट जाएंगे. विमानन की दुनिया में कई ऐसी उड़ानें हुईं, जिन्होंने इतिहास बदल दिया. लेकिन 27 अगस्त 1939 की एक छोटी-सी उड़ान ने आने वाले दशकों की दिशा तय कर दी. इसी दिन जर्मनी में दुनिया का पहला जेट विमान हेइंकेल एचई-178 आसमान में उड़ा.
यह उड़ान महज छह मिनट की थी, लेकिन इसका महत्व बहुत बड़ा था. खास बात यह थी कि विमान किसी पारंपरिक पिस्टन इंजन से नहीं, बल्कि जेट इंजन से उड़ रहा था.
इस कहानी के केंद्र में जर्मन वैज्ञानिक हांस योआखिम पाब्स्ट फॉन ओहेन थे. 1930 के दशक की शुरुआत में उनके दिमाग में एक अलग तरह का विचार आया. उनका सवाल था कि क्या विमान को पिस्टन इंजन की मदद के बिना गैस टर्बाइन से उड़ाया जा सकता है?
ओहेन ने इसी विचार पर काम शुरू किया और 1935 में जेट इंजन से जुड़ा अपना पेटेंट कराया. अगले साल उनकी मुलाकात विमान निर्माता एर्न्स्ट हाइकल से हुई. हाइकल को यह विचार पसंद आया और उन्होंने ओहेन तथा उनकी टीम को अपनी कंपनी में काम करने का मौका दिया.
इसके बाद एक ऐसे विमान को बनाने की कोशिश शुरू हुई, जिसका डिजाइन तो काफी साधारण दिखता था, लेकिन उसके अंदर की तकनीक अपने समय से कहीं आगे थी.
ओहेन की टीम ने शुरुआत में एचईएस-1 नाम का इंजन तैयार किया. यह हाइड्रोजन से चलता था और मुख्य रूप से परीक्षण के लिए बनाया गया था. इसके बाद एचईएस-2 और एचईएस-3 इंजन विकसित किए गए, जिन्हें गैसोलीन से चलाया जा सकता था.
इन्हीं प्रयोगों के आधार पर एचई-178 तैयार किया गया. विमान के डिजाइन पर हांस रेगनर और उनकी टीम ने काम किया. इसकी सबसे खास बात इसका इंजन था. विमान की नाक के हिस्से से हवा अंदर जाती थी और पीछे से गर्म गैसें तेज गति से बाहर निकलती थीं. यही प्रक्रिया विमान को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी जोर पैदा करती थी.
27 अगस्त 1939 की सुबह रोस्टॉक के एयरफील्ड में वह पल आया, जिसका इंजीनियरों को लंबे समय से इंतजार था. टेस्ट पायलट एरिक वार्सिट्ज कॉकपिट में बैठे और एचई-178 ने रनवे पर दौड़ना शुरू किया.
शुरुआत में विमान की रफ्तार सामान्य लगी, लेकिन कुछ दूरी तय करने के बाद उसकी गति तेजी से बढ़ने लगी. आखिरकार विमान जमीन से ऊपर उठ गया. पहली उड़ान करीब छह मिनट चली.
समय भले ही कम था, लेकिन विमानन इतिहास के लिए यह एक बड़ी छलांग थी. एचई-178 ने साबित कर दिया कि विमान को जेट इंजन की ताकत से भी उड़ाया जा सकता है.
इस परियोजना की एक और दिलचस्प बात यह थी कि इसका विकास काफी हद तक गुप्त रखा गया था. जर्मन वायु मंत्रालय को भी इसकी पूरी जानकारी नहीं थी. हाइकल इसे अपनी कंपनी की निजी पहल के रूप में आगे बढ़ा रहे थे और चाहते थे कि उनकी कंपनी विमानन तकनीक में दूसरों से आगे निकले.
जब एचई-178 को अधिकारियों के सामने पेश किया गया, तो उसे उम्मीद के मुताबिक सरकारी समर्थन नहीं मिला. उस समय जर्मनी युद्ध की ओर बढ़ चुका था और पारंपरिक पिस्टन इंजन वाले विमान अभी भी उपयोगी साबित हो रहे थे. इसलिए जेट तकनीक को तत्काल प्राथमिकता नहीं दी गई.
एचई-178 की गति लगभग 600 से 700 किलोमीटर प्रति घंटा तक बताई जाती है. लेकिन इसके इंजन की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह लंबे समय तक लगातार नहीं चल सकता था. यही वजह थी कि इसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार विमान के बजाय एक प्रायोगिक विमान माना गया.
इसके बाद जर्मनी ने जेट तकनीक पर और काम किया. एचई-280 और बाद में मेसर्सचमिट एमई-262 जैसे जेट विमानों ने इस तकनीक को आगे बढ़ाया. हालांकि तब तक द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थितियां काफी बदल चुकी थीं.
ये भी पढ़ें- आरक्षण समीक्षा की आवश्यकता: सबकैटेगराइजेशन, आर्थिक मापदंड और सामाजिक यथार्थ
-भारत एक्सप्रेस
हेमचन्द्र विक्रमादित्य, जिन्हें इतिहास में हेमू के नाम से भी जाना जाता है, 16वीं सदी…
UP News: मेरठ के चर्चित सांप कांड में अदालत ने अमित की पत्नी रविता और…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन और जन्मदिन के अवसर पर शिवसेना…
Delhi News: दिल्ली के सीमापुरी इलाके में चार मंजिला इमारत गिरने से हड़कंप मच गया.…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर उनकी राजनीतिक यात्रा…
भारतीय सेना ने 17,500 फीट की ऊंचाई पर सफल ट्रायल के बाद 225 FPV ड्रोन…