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डूबने से बचा था परिवार और फुटबॉल-टैंगो का शौक, जानिए कैसी है पोप फ्रांसिस की नई आत्मकथा?

पोप फ्रांसिस की आत्मकथा ‘आशाओं की एक विरासत’ (मूल अंग्रेज़ी शीर्षक Hope: The Autobiography) को पढ़ना किसी धार्मिक नेता की जिंदगी के पन्ने पलटने भर जैसा नहीं है. यह एक ऐसे इंसान की कहानी है जिसने साधारण परिवार में जन्म लिया, मुश्किल दौर देखे, गलतियां कीं, संघर्षों से सीखा और आगे चलकर दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक पदों में से एक तक पहुंचा. खास बात यह है कि यह इतिहास में पहली बार हुआ जब किसी पद पर रहते हुए पोप ने अपनी आत्मकथा प्रकाशित की.

दिलचस्प बात यह भी है कि फ्रांसिस का शुरू में इसे अपनी मृत्यु के बाद प्रकाशित कराने का इरादा था. लेकिन 2025 के जुबली वर्ष, जिसे उम्मीद और आशा से जोड़ा गया था, और दुनिया के मौजूदा हालात को देखते हुए उन्होंने किताब को जनवरी 2025 में ही पाठकों के सामने लाने का फैसला किया.

करीब 300 पन्नों की यह किताब सिर्फ उनके जीवन की घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा नहीं देती. इसमें आज की दुनिया, समाज, युद्ध, गरीबी, प्रवासन और इंसानी रिश्तों को लेकर उनकी सोच भी सामने आती है. किताब पिछले छह वर्षों के दौरान इतालवी पत्रकार कार्लो मुसो के साथ हुए विस्तृत संवादों पर आधारित है.

आत्मकथा का शुरुआती प्रसंग बेहद मार्मिक है. पोप फ्रांसिस बताते हैं कि उनके दादा-दादी और पिता इटली से अर्जेंटीना जाने वाले थे. उन्होंने जिस जहाज का टिकट लिया था, वह बाद में समुद्र में डूब गया और उस हादसे में सैकड़ों लोगों की जान चली गई. संयोग से उनका परिवार आखिरी वक्त पर उस जहाज पर सवार नहीं हो पाया.

फ्रांसिस इस घटना को अपने परिवार के लिए ईश्वर की कृपा के रूप में देखते हैं. शायद इसी वजह से प्रवासियों और विस्थापित लोगों के दर्द को लेकर उनकी संवेदनशीलता इतनी गहरी रही. उनकी नजर में प्रवासी केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोग हैं जो बेहतर जिंदगी की उम्मीद में अपना घर छोड़ने का कठिन फैसला लेते हैं.

1936 में ब्यूनस आयर्स में जन्मे जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो का बचपन एक साधारण इतालवी प्रवासी परिवार में बीता. घर में बहुत दौलत नहीं थी, लेकिन आत्मसम्मान और मेहनत की कमी भी नहीं थी. जिस माहौल में वे बड़े हुए, वहां अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग साथ रहते थे. यह बहुलता आगे चलकर उनके सोचने के तरीके का अहम हिस्सा बनी.

फुटबॉल, टैंगो और जिम्मेदारियों से भरा बचपन

पुस्तक का मानवीय पक्ष यहां खास तौर पर उभरता है. इसमें पोप को केवल गंभीर धार्मिक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक आम लड़के के रूप में देखा जा सकता है. फुटबॉल के प्रति उनका लगाव, टैंगो का शौक, युवावस्था के सपने और परिवार से जुड़े अनुभव उनकी कहानी को जमीन से जोड़ते हैं.

पिता की अचानक मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारियों ने भी उन्हें कम उम्र में जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराया. इन अनुभवों ने शायद उन्हें यह समझने में मदद की कि आम परिवारों की परेशानियां क्या होती हैं और किसी भी व्यक्ति के लिए सम्मान के साथ जीवन जीना क्यों जरूरी है.

इसके बाद उनकी जिंदगी धीरे-धीरे आध्यात्मिक दिशा में मुड़ती है. वे जेसुइट पादरी बनने की राह चुनते हैं. लेकिन यह रास्ता भी आसान नहीं था. अर्जेंटीना के राजनीतिक रूप से उथल-पुथल भरे दौर में जेसुइट समुदाय का नेतृत्व करना उनके लिए बड़ी चुनौती रहा. इस दौरान लिए गए फैसलों, मुश्किल परिस्थितियों और अपने अनुभवों पर वे आत्मकथा में काफी खुलकर बात करते हैं.

2013 का वह पल, जब नाम बना ‘फ्रांसिस’

2013 में जब जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो को पोप चुना गया, तो उनकी जिंदगी ने एक बिल्कुल नया मोड़ लिया. कार्डिनल ह्यूम्स ने उस समय उनसे गरीबों को न भूलने की बात कही. इसी भावना से प्रभावित होकर उन्होंने संत फ्रांसिस के नाम पर अपना पोप नाम चुना.

यही नाम उनकी प्राथमिकताओं को भी काफी हद तक बयान करता है. गरीब, कमजोर और समाज के हाशिये पर खड़े लोग.

आत्मकथा में उनका संदेश बार-बार एक ही दिशा में लौटता है: इंसान को उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए. उनके मुताबिक दुनिया ने युद्ध, नफरत, हिंसा और मौत के बहुत से दौर देखे हैं, लेकिन इन्हीं के बीच इंसानियत और करुणा की ताकत भी लगातार बनी रही है.

पोप फ्रांसिस के विचारों की सबसे खास बात उनका चर्च को देखने का नजरिया है. वे चर्च को एक ऐसे किले के रूप में नहीं देखना चाहते जहां नियम सबसे ऊपर हों. उनकी कल्पना में चर्च एक ‘क्षेत्रीय अस्पताल’ जैसा होना चाहिए—जहां पहले घायल व्यक्ति का इलाज हो और उसकी तकलीफ समझी जाए.

उनके लिए करुणा, सेवा और विनम्रता केवल धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में अपनाए जाने वाले मूल्य हैं.

इसी सोच के चलते वे युद्ध और हिंसा से लेकर आर्थिक असमानता, अनियंत्रित पूंजीवाद, पर्यावरण संकट और प्रवासन जैसे मुद्दों पर मुखर रहे. आत्मकथा में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने, समलैंगिक जोड़ों के आशीर्वाद और चर्च के भीतर सुधारों की जरूरत को लेकर उनके विचार भी सामने आते हैं.

सिर्फ धार्मिक किताब नहीं

हिंदी पाठकों के लिए इस पुस्तक की खासियत यह है कि इसका अनुवाद मंजीत ठाकुर ने सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा में किया है. इसलिए किताब को समझने के लिए किसी खास धार्मिक पृष्ठभूमि की जरूरत महसूस नहीं होती.

यह आत्मकथा उन लोगों को भी आकर्षित कर सकती है जो धर्म से इतर मानवीय मूल्यों, नेतृत्व और समाज की मौजूदा चुनौतियों को समझना चाहते हैं. इसमें एक वैश्विक धार्मिक नेता के साथ-साथ उस व्यक्ति की आवाज भी सुनाई देती है जिसने बचपन में परिवार की परेशानियां देखीं, सामान्य खुशियों का आनंद लिया और धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन की बड़ी जिम्मेदारियों तक पहुंचा.

आखिर में इस किताब का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि मुश्किल हालात के बावजूद उम्मीद को बचाए रखना जरूरी है. पोप फ्रांसिस की विरासत को अगर कुछ शब्दों में समझना हो तो उसमें दया, न्याय, सेवा और आशा सबसे आगे दिखाई देते हैं.

ये भी पढ़ें- बाबू जगत सिंह: सारनाथ को इतिहास में वापस लाने वाला भारतीय; और वो वंशज जिसने उनका नाम दोबारा दर्ज कराया

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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