आज 21 मार्च को विश्व वन दिवस मनाया जा रहा है. इस दिन हम उन हरे-भरे जंगलों, पेड़-पौधों और वन्यजीवों की याद दिलाते हैं जो हमारी धरती का आधार हैं. लेकिन क्या हम सचमुच जंगलों से जुड़े हुए हैं? या सिर्फ एक दिन का उत्सव मनाकर भूल जाते हैं? ठीक इसी सवाल को उठाती है राधाकृष्ण प्रकाशन से हाल ही में प्रकाशित कबीर संजय की पुस्तक ‘जंगलमन की डायरी’. 172 पृष्ठों की यह डायरी-शैली की रचना न सिर्फ़ एक किताब है, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे खोते हुए रिश्ते की एक खुली चुनौती और यादों का उत्सव है.
कबीर संजय का जन्म 10 जुलाई 1977 को इलाहाबाद (प्रयागराज), उत्तर प्रदेश में हुआ. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक उन्होंने साहित्य के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई. लेकिन उनकी रचनात्मकता का केंद्र हमेशा पर्यावरण और वन्यजीवन रहा. उनकी अन्य प्रमुख कृतियां हैं—कहानी-संग्रह ‘सुरखाब के पंख’ और ‘फेंगशुई’; तथा वन्यजीवन पर ‘चीता: भारतीय जंगलों का गुम शहजादा’, ‘ओरांग उटान: अनाथ, बेघर और सेक्स गुलाम’, ‘गोडावण: मोरे अंगना की सोन चिरैया’.
वे ‘तद्भव’, ‘पल प्रतिपल’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘वनमाली कथा’, ‘लमही’, ‘कादम्बिनी’ जैसी पत्रिकाओं में नियमित लिखते रहे. उनका फेसबुक पेज ‘जंगलकथा’ पर्यावरण प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है. ‘सुरखाब के पंख’ के लिए उन्हें ‘रवीन्द्र कालिया स्मृति सम्मान’ भी मिल चुका है. ‘जंगलमन की डायरी’ (ISBN: 9789347265679, 2026 प्रथम संस्करण, मूल्य ₹299) उनकी पर्यावरण-कथाओं की नई कड़ी है, जो पाठक को जंगल से सीधे संवाद कराती है.
पुस्तक डायरी शैली में लिखी गई है. हर पृष्ठ पर लेखक अपने अनुभव, बचपन की यादें, छोटी-छोटी घटनाएं और उनसे निकले सबक दर्ज करते हैं. प्रकाशक की ओर से दी गई भूमिका में स्पष्ट कहा गया है कि ‘हम जिस संसार में रहते हैं वह साझे का संसार है. हमारी पृथ्वी तमाम जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों का साझा घर है. लेकिन सभ्यता के लम्बे अन्तराल में, मनुष्य ने यह ग़फ़लत पाल ली कि वही इसका अकेला मालिक है. इससे प्रकृति के साथ उसका सम्बन्ध लगातार जटिल होता गया… इस अलगाव ने पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को ही संकटग्रस्त कर दिया है.’
लेखक बताते हैं कि मानव-जीवन की कोई तस्वीर केवल मानवों से पूरी नहीं होती. प्रकृति उन तस्वीरों में रंग भरती है—बचपन का कोई पेड़, नदी का घाट, पक्षी के साथ हुई नासमझी, फूलों की गंध, अनजान रास्तों पर सीखे सबक, पेड़ के थाले में छिपाया पछतावा. ये सब ‘कुछ कहा-कुछ अनकहा’ भावनाएं ‘जंगलमन की डायरी’ में जीवंत हो उठती हैं.
पुस्तक में गंगा किनारे बिताया बचपन, आम के बगीचों की यादें, किसानों की समस्याएं, छोटी चीजों का उत्सव और डिजिटल दुनिया से दूर भागने की चाहत प्रमुख हैं. पाठक एक जगह पढ़ते हैं कि यह किताब “प्रकृति से जोड़ेगी, बचपन की यादें लाएगी, छोटी चीजों का उत्सव मनाएगी, किसानों की समस्या दिखाएगी और डिजिटल डिटॉक्स का अनुभव कराएगी”.
ये थीम्स विश्व वन दिवस के मर्म से पूरी तरह मेल खाती हैं. जब हम जंगलों को सिर्फ ‘लकड़ी’ या ‘भूमि’ मानकर काट रहे हैं, तब ‘जंगलमन की डायरी’ हमें याद दिलाती है कि जंगल हमारा ‘मन’ भी है. हमारी भावनाएं, यादें और अस्तित्व.
यह किताब न सिर्फ पढ़ने लायक है, बल्कि अनुभव करने लायक. सरल भाषा, भावुक शैली और छोटे-छोटे अध्याय इसे हर उम्र के पाठक के लिए सुलभ बनाते हैं. जो लोग शहर की भागदौड़ में प्रकृति से कट गए हैं, उनके लिए यह एक पुल है. स्कूली बच्चों को बचपन की यादें, किसानों को अपनी पीड़ा, पर्यावरण कार्यकर्ताओं को नया जोश और आम पाठक को शांति देती है.
जंगलमन की डायरी में सिर्फ़ पर्यावरण प्रेमी नहीं, एक बच्चा भी है जो गंगा किनारे आम के बगीचों में खेलता था… बहुत सारे सबक भी हैं. ‘जंगलमन की डायरी’ हमें सिखाती है कि जंगल बचाना मतलब खुद को बचाना. जब हम पेड़ लगाएंगे, नदी को साफ रखेंगे और प्रकृति से दोस्ती करेंगे, तभी हमारी धरती सांस ले पाएगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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