भारत में आज हवाई सफर आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. कुछ घंटे में देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचना अब पहले जितना मुश्किल नहीं रहा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में हवाई यात्रा की इस कहानी की शुरुआत एक ऐसे शख्स ने की थी, जिसने बहुत पहले आसमान में उड़ने का सपना देख लिया था? उनका नाम था जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, यानी जेआरडी टाटा. उन्हीं की सोच और मेहनत से आगे चलकर एयर इंडिया जैसी बड़ी एयरलाइन की नींव पड़ी.
10 फरवरी 1929 का दिन भारतीय विमानन के इतिहास में खास जगह रखता है. इसी दिन जेआरडी टाटा को भारत में पहला पायलट लाइसेंस मिला था. उस समय विमान उड़ाना आज की तरह आम बात नहीं थी. इसके लिए जुनून, हिम्मत और तकनीकी समझ की जरूरत होती थी. जेआरडी टाटा ने लाइसेंस हासिल करने के बाद सिर्फ विमान उड़ाने तक खुद को सीमित नहीं रखा. उनका सपना था कि भारत में भी अपनी एक ऐसी एयरलाइन हो, जो लोगों और सामान को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचा सके.
उनका यह सपना ज्यादा समय तक सपना बनकर नहीं रहा. साल 1932 में उन्होंने टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की. यह भारत की पहली वाणिज्यिक एयरलाइन थी और यहीं से देश में हवाई परिवहन के एक नए दौर की शुरुआत हुई.
15 अक्टूबर 1932 को टाटा एयरलाइंस ने अपनी पहली उड़ान भरी. इस उड़ान की कमान खुद जेआरडी टाटा के हाथों में थी. उनका विमान कराची से रवाना हुआ और अहमदाबाद होते हुए मुंबई पहुंचा. इस सफर के लिए सिंगल इंजन वाले ‘डी हैविलैंड पस मोथ’ विमान का इस्तेमाल किया गया था.
इस ऐतिहासिक उड़ान में कोई यात्री सवार नहीं था. विमान में करीब 25 किलो डाक थी, जिसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया गया. आज भले ही यह शुरुआत छोटी लगे, लेकिन उस दौर में इसने भारत में हवाई सेवाओं की संभावनाओं का रास्ता खोला.
शुरुआती दौर में ही कंपनी ने अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी थी. पहले साल में 155 यात्रियों ने टाटा एयरलाइंस से सफर किया और इसके विमानों ने ढाई लाख किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय की. इसी साल बॉम्बे यानी आज के मुंबई से त्रिवेंद्रम, जिसे अब तिरुवनंतपुरम कहा जाता है, तक की उड़ान सेवा भी शुरू हुई. उस समय यह कंपनी की सबसे लंबी दूरी की उड़ान थी.
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारत में वाणिज्यिक हवाई सेवाओं पर रोक लगा दी गई थी. युद्ध खत्म होने के बाद विमानन क्षेत्र ने फिर से रफ्तार पकड़नी शुरू की. साल 1946 में टाटा एयरलाइंस को पब्लिक लिमिटेड कंपनी में बदला गया और इसका नाम एयर इंडिया रख दिया गया.
इसके बाद कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय आसमान में कदम रखने की तैयारी की. 8 जून 1948 को एयर इंडिया ने अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान शुरू की. ‘मालाबार प्रिंसेज’ नाम का विमान मुंबई के सांताक्रूज एयरपोर्ट से लंदन के लिए रवाना हुआ और 10 जून को वहां पहुंचा. इस उड़ान में कुल 35 यात्री सवार थे. इनमें जेआरडी टाटा और जामनगर के नवाब अमीर अली खान भी शामिल थे.
यह सिर्फ एक नई उड़ान नहीं थी, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवाओं के विस्तार की दिशा में एक अहम कदम था.
साल 1953 में भारत सरकार ने देश की आठ एयरलाइन कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इसके बाद घरेलू उड़ानों के लिए इंडियन एयरलाइंस और अंतरराष्ट्रीय सेवाओं के लिए एयर इंडिया का गठन हुआ. इस फैसले के साथ एयर इंडिया का नियंत्रण सरकार के पास चला गया, जबकि जेआरडी टाटा भारतीय विमानन क्षेत्र से जुड़े रहे.
फिर आया साल 2021, जब एयर इंडिया के इतिहास में एक बड़ा मोड़ आया. सरकार ने 18,000 करोड़ रुपये के सौदे के तहत एयर इंडिया को दोबारा टाटा समूह को सौंप दिया. इस तरह जिस समूह ने करीब नौ दशक पहले इस एयरलाइन की शुरुआत की थी, उसके पास कंपनी की कमान फिर लौट आई.
एयर इंडिया का सफर सिर्फ एक कंपनी के बनने, बढ़ने और दोबारा अपने पुराने मालिक के पास लौटने की कहानी नहीं है. यह उस सोच की मिसाल भी है, जिसमें किसी बड़े बदलाव की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है. जेआरडी टाटा ने जिस समय भारत में हवाई सेवाओं का सपना देखा था, उस दौर में शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि एक दिन भारतीय विमान दुनिया के अलग-अलग देशों तक नियमित उड़ान भरेंगे.
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-भारत एक्सप्रेस
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