हिमालय की ऊंची चोटियां अपनी खूबसूरती और दुर्गम रास्तों के लिए जानी जाती हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन्हीं बर्फीले पहाड़ों में कभी एक ऐसा गुप्त मिशन चलाया गया था, जिसका संबंध चीन के परमाणु कार्यक्रम से था? इस अभियान में भारत और अमेरिका ने मिलकर चीन की गतिविधियों पर नजर रखने की कोशिश की थी. कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा उत्तराखंड की नंदा देवी चोटी से जुड़ा है, जहां एक खास निगरानी उपकरण लगाया जाना था. अभियान तो खत्म हो गया, लेकिन उस उपकरण का क्या हुआ, यह सवाल आज भी चर्चा में आता है.
भारत और चीन के बीच 1962 में हुआ युद्ध सिर्फ सीमा विवाद तक सीमित नहीं था. इसने एशिया की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी गहरा असर डाला. युद्ध के दौरान भारत को मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उसने अमेरिका समेत पश्चिमी देशों से मदद मांगी.
उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी थे. दूसरी ओर, चीन के रिश्ते सोवियत संघ के साथ भी बिगड़ रहे थे. माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीन अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में जुटा था. परमाणु हथियारों को लेकर माओ के आक्रामक बयानों ने दुनिया की बड़ी शक्तियों की चिंता बढ़ा दी थी.
अमेरिका को आशंका थी कि चीन जल्द ही परमाणु शक्ति बन सकता है. ऐसे में उसके परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल क्षमता से जुड़ी जानकारी जुटाना बेहद जरूरी हो गया था.
उस दौर में आज की तरह आधुनिक जासूसी उपग्रहों की सुविधा नहीं थी. दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए खुफिया एजेंसियों को जमीन पर मौजूद लोगों, विमानों और जोखिम भरे अभियानों पर निर्भर रहना पड़ता था.
इसी जरूरत के तहत भारत और अमेरिका के बीच सहयोग बढ़ा. तिब्बती लड़ाकों को प्रशिक्षण देकर करीब 5,000 सदस्यों वाली एक विशेष टुकड़ी तैयार की गई. आगे चलकर यही बल स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) के नाम से जाना गया. इसका प्रमुख केंद्र उत्तराखंड के चकराता में था और मेजर जनरल सुजान सिंह उबन इसके नेतृत्व से जुड़े थे.
इसके साथ ही एविएशन रिसर्च सेंटर (एआरसी) की स्थापना हुई. इस केंद्र का काम हवाई निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाना था. इसमें अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की मदद के साथ भारतीय अधिकारियों की भूमिका भी अहम थी. रामनाथ काओ इसके शुरुआती प्रमुख बने, जो आगे चलकर भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के संस्थापक प्रमुख बने.
16 अक्टूबर 1964 को चीन ने शिनजियांग के लोप नोर में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया. इस घटना ने भारत और अमेरिका की चिंताओं को और बढ़ा दिया. अब सवाल सिर्फ यह नहीं था कि चीन परमाणु बम बना रहा है, बल्कि यह भी था कि उसकी सैन्य तकनीक कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है.
इसी बीच हिमालय की ऊंची चोटियों का इस्तेमाल निगरानी के लिए करने की योजना सामने आई. विचार था कि पहाड़ पर ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाया जाए, जो चीन की परमाणु और मिसाइल गतिविधियों से जुड़े संकेत पकड़ सके.
इस योजना में भारतीय पर्वतारोही कैप्टन एम.एस. कोहली की अहम भूमिका रही. अमेरिकी पक्ष में भी कई अधिकारी और विशेषज्ञ इससे जुड़े थे. इस पूरे अभियान का विवरण एम.एस. कोहली और केनेथ कॉनबॉय की किताब Spies in the Himalayas में मिलता है.
योजना के मुताबिक, नंदा देवी की करीब 25,645 फीट ऊंची चोटी के पास एक विशेष निगरानी उपकरण लगाया जाना था. यह सामान्य बैटरी से चलने वाला यंत्र नहीं था, बल्कि परमाणु ईंधन सेल से ऊर्जा हासिल करने के लिए बनाया गया था, ताकि लंबे समय तक काम कर सके.
लेकिन अभियान के दौरान मौसम ने साथ नहीं दिया. पर्वतारोहियों को उपकरण शिखर के पास से वापस लाना पड़ा. अगले साल जब उसे दोबारा हासिल करने के लिए टीम पहुंची, तो वह वहां नहीं मिला.
यहीं से इस मिशन ने एक ऐसा रहस्य पैदा किया, जो दशकों बाद भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है.
कुछ लोगों का मानना है कि उपकरण ग्लेशियर में कहीं दब गया होगा या बर्फ के साथ नीचे खिसक गया होगा. दूसरी ओर, इसके रेडियोधर्मी पदार्थ के पानी में पहुंचने की आशंका भी जताई जाती रही है. कुछ अटकलों में यह तक कहा गया कि उपकरण को किसी ने वहां से हटा लिया होगा. हालांकि, इन दावों से यह साबित नहीं होता कि वह वास्तव में कहां गया.
नंदा देवी पर मिली नाकामी के बाद अभियान पूरी तरह बंद नहीं हुआ. 1967 में नंदा कोट पर इसी तरह का एक उपकरण लगाया गया, लेकिन बर्फ से एंटीना ढक जाने के कारण उसकी उपयोगिता प्रभावित हुई. बाद में उसे वापस लाया गया.
दिसंबर 1969 में लेह के पास एक अन्य पर्वत पर गैस से चलने वाला उपकरण लगाने की कोशिश सफल रही. हालांकि, इस तरह की तकनीक का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा. अमेरिका के पास बेहतर जासूसी उपग्रह आने लगे थे, जिनसे चीन की गतिविधियों पर नजर रखना पहले के मुकाबले आसान हो गया.
इसके बाद भारत और अमेरिका के बीच इस तरह के अभियानों की जरूरत भी घटने लगी. लेकिन नंदा देवी पर छूटे उपकरण का सवाल अपनी जगह बना रहा.
अप्रैल 1978 में भारतीय संसद में नंदा देवी के ग्लेशियर में मौजूद संभावित रेडियोधर्मी उपकरण का मुद्दा उठाया गया. चिंता थी कि अगर उसमें मौजूद खतरनाक पदार्थ बाहर निकले या पानी में पहुंचे, तो पर्यावरण और लोगों के लिए परेशानी पैदा हो सकती है.
1982 में नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व को पर्यावरणीय सुरक्षा के मद्देनजर आगंतुकों के लिए बंद कर दिया गया. हालांकि, इस फैसले को केवल उस गुप्त अभियान से जोड़कर देखना सही नहीं होगा, क्योंकि इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी भी बेहद संवेदनशील है.
दिसंबर 2001 में एशियन एज की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि गढ़वाल राइफल्स की 40 सदस्यीय टीम ने सितंबर में नंदा देवी पर चढ़ाई के दौरान 800 किलोग्राम से अधिक खतरनाक अपशिष्ट बरामद किए थे. तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने सेना के पर्यावरण संरक्षण प्रयासों की सराहना की थी.
हालांकि, इस रिपोर्ट में बताए गए पदार्थों की वास्तविक पहचान और उनका 1960 के दशक के उपकरण से संबंध अपने आप में महत्वपूर्ण सवाल हैं. सिर्फ इस जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बरामद सामग्री वही परमाणु उपकरण था, जो दशकों पहले गायब हुआ था.
भारत और अमेरिका का यह गुप्त अभियान शीत युद्ध के दौर की उस राजनीति को दिखाता है, जिसमें दुश्मन की सैन्य ताकत का पता लगाने के लिए बेहद जोखिम भरे कदम उठाए जाते थे. उस समय हिमालय की ऊंचाइयां सिर्फ पर्वतारोहण का मैदान नहीं थीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा भी बन गई थीं.
आज आधुनिक उपग्रह और निगरानी तकनीक ने खुफिया जानकारी जुटाने के तरीके बदल दिए हैं. फिर भी नंदा देवी से जुड़ा यह मामला कई सवाल छोड़ता है. क्या वह उपकरण अब भी ग्लेशियर के भीतर कहीं मौजूद है? उसमें इस्तेमाल रेडियोधर्मी पदार्थ का क्या हुआ? और 2001 में बरामद बताए गए खतरनाक अपशिष्ट आखिर किस तरह के थे?
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