“मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित
चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं…”
ये पंक्तियां सुनते ही हृदय में देशभक्ति की लहर दौड़ जाती है. सरल शब्दों में गहरी अनुभूति का जादू, जो मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना को एकदम सहज बना देता है. यही शैली थी राष्ट्रकवि, गीतकार और देशभक्त रामावतार त्यागी की. आज, 17 मार्च 2026 को उनकी जन्मशताब्दी (जन्म: 17 मार्च 1925) के अवसर पर हम उन महान साहित्यकार को याद करते हैं, जिनकी कविताएं आज भी स्कूली पाठ्यक्रमों में देशभक्ति की प्रेरणा दे रही हैं.
रामावतार त्यागी का जन्म 17 मार्च 1925 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद (वर्तमान संभल) जिले के कुरकावली गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था. पिता उदल सिंह त्यागी और माता भागीरथी देवी के घर पहली संतान के रूप में उनका जन्म हुआ. मात्र 10 वर्ष की आयु में शिक्षा शुरू हुई, 16 वर्ष की उम्र में विवाह हो गया और 1944 में हाईस्कूल पास किया. इसके बाद चंदौसी डिग्री कॉलेज, मुरादाबाद से स्नातक और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से हिंदी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) की उपाधि प्राप्त की.
त्यागी जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने नवभारत टाइम्स में क्राइम रिपोर्टर के रूप में काम किया और साप्ताहिक स्तंभ “मलूक दास की कलम से” के माध्यम से राजनीतिक व्यंग्य लिखे. वे राजीव गांधी और संजय गांधी को व्यक्तिगत रूप से हिंदी भाषा की शिक्षा भी देते थे. लेकिन उनकी असली पहचान थी कविता और गीत लेखन. उन्होंने 15 से अधिक कविता संग्रह और कुछ उपन्यास लिखे. प्रमुख पुस्तकें:
उनके उपन्याससमाधान और पत्रात्मक उपन्यासचारित्रहीन के पत्र भी उल्लेखनीय हैं. उनकी कविताएं एनसीईआरटी की नवीं-बारहवीं कक्षा की किताबों में शामिल हैं, जबकि “समर्पण” नामक कविता उत्तर प्रदेश की बुनियादी शिक्षा की आठवीं कक्षा में पढ़ाई जाती है.
राष्ट्रकवि होने के साथ-साथ त्यागी जी ने हिंदी सिनेमा के लिए भी गीत लिखे. 1975 की फिल्मजिंदगी और तूफान के लिए उन्होंने “जिंदगी और बता तेरा इरादा क्या है” जैसा गीत रचा, जो उनकी गीतकार प्रतिभा का प्रमाण है. सरल भाषा में गहरी भावनाएं भरकर उन्होंने बड़े पर्दे पर भी देशभक्ति और जीवन-दर्शन को छुआ.
त्यागी जी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वो सरल शब्दों में गहरी अनुभूति रा देते थे. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा था: “त्यागी ने ऐसे गीत लिखे हैं जो प्रमाणित करते हैं कि हिंदी के गीतों में नई भाषा, नई कहावतें, नया ढंग, नया दृष्टिकोण है. त्यागी का काम मुझे बहुत पसंद है. वे जिस तरह रोते हैं, हंसते हैं, चिढ़ते हैं और गर्व करते हैं, उसमें एक अनोखी शैली है जो दिल जीत लेती है.”
उनकी कविता “और भी दूं” (समर्पण) इसका सर्वोत्तम उदाहरण है. इसमें कवि मातृभूमि से कहते हैं:
“गान अर्पित, प्राण अर्पित, रक्त का कण-कण समर्पित.
चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं.”
12 अप्रैल 1985 को दिल्ली में मात्र 60 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी जीवित हैं. स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली उनकी कविताएं नई पीढ़ी को देशप्रेम सिखाती हैं. जन्मशताब्दी के इस पावन अवसर पर हमें याद करना चाहिए कि त्यागी जी ने कभी बड़े-बड़े शब्दों का सहारा नहीं लिया. उन्होंने दिल की बात सीधी और सरल भाषा में कही.
आज जब देश एकता, समर्पण और सकारात्मक सोच की बात करता है, तब रामावतार त्यागी की कविताएं प्रासंगिक हो उठती हैं. उनकी जन्मशताब्दी सिर्फ स्मरण नहीं, बल्कि प्रेरणा का अवसर है कि हम भी देश की धरती को “कुछ और भी” दे सकें.
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-भारत एक्सप्रेस
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