फ्रांस में 'इस्लाम कब्जा करना चाहता है'? ट्रंप के दावे की पड़ताल (इमेज-X.com)
France Violence: फ्रांस की सड़कों पर इस वक्त पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जंग जैसे हालात हैं. स्कूलों से शुरू हुआ यह प्रदर्शन अब फ्रांस के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच गया है. चारों तरफ आगजनी, हिंसा और लूटपाट की खबरें सामने आ रही हैं. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की तस्वीरें दुनिया भर के न्यूज चैनल्स और अखबारों का हिस्सा बन रहे हैं. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ ऐसा दावा कर दिया, जिसने इस मामले को पूरी तरह से नये मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. ट्रंप ने कहा है कि फ्रांस में जो कुछ हो रहा है, उसके पीछे बड़े पैमाने का इमिग्रेशन है. उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि इस्लाम एक महान देश पर कब्जा करना चाहता है.
तब सवाल ये उठ रहा है कि क्या फ्रांस में चल रहा आंदोलन वास्तव में इमिग्रेशन या इस्लाम के खिलाफ किसी प्रकार का संघर्ष है. जब हम सामने आ रही रिपोर्टों को देखते हैं तो यह तस्वीर इतनी सीधी नहीं दिखती जितनी बताई जा रही है.
फ्रांस में सितंबर से ही हाई स्कूल के छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं. उनका कहना है कि देश के स्कूलों की हालत बद से बदतर हो चुकी है. स्कूल सुविधाओं और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं. 6 अक्टूबर को देशभर में प्रदर्शन हुए. फ्रांस के गृह विभाग के मुताबिक इस प्रदर्शन में करीब 2.66 लाख लोग शामिल हुए थे. हालांकि प्रदर्शन के आयोजकों का मानना था कि इसमें करीब 4.5 लाख लोग शामिल हुए. इस प्रदर्शन के दौरान कई जगहों पर हिंसा हुई. पेरिस के अलग-अलग इलाकों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की भी स्थिति बनी रही.
AFP की रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस में चल रहा मौजूदा छात्र आंदोलन किसी धार्मिक पहचान को लेकर नहीं बल्कि स्कूलों में सुविधाओं को बढ़ाने के लिए हुआ है. फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बारो ने ट्रंप की टिप्पणी के बाद कहा कि फ्रांस को अपनी स्थिति और अपनी कहानी खुद दुनिया के सामने रखने की जरूरत है.
🔴FRANCE 🇫🇷|High school student protests and the ensuing riots are continuing in several French cities. More than 400 schools are closed due to vandalism and threats against staff. Police are struggling to contain the violence; the army has been deployed to help secure the sites. https://t.co/VN6szjtVc4
— Nanana365 (@nanana365media) October 2, 2026
इसका मतलब यह नहीं है कि फ्रांस में इमिग्रेशन को लेकर बहस नहीं है. यूरोप के कई देशों लगातार बढ़ रहे अवैध प्रवासन से जूझ रहे हैं. अब तो यूरोप में यह राजनीतिक फलक पर भी दिखना शुरू हो गया है.
ट्रंप के बयान को समझने के लिए फ्रांस की आबादी में लगातार हो रहे बदलाव को देखना होगा. फ्रांस में मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ रही है. INSEE के 2019-20 के आंकड़ों के मुताबिक, 18 से 59 साल की शहरी फ्रांसीसी आबादी में करीब 10 फीसदी लोग खुद को मुस्लिम बताते हैं. इस यूरोपीय देश में अवैध प्रवासियों की संख्या लगातार बढ़ रही है.
हालांकि ये प्रवासी आबादी पूरे फ्रांस में नहीं बंटी है. पेरिस और उसके आसपास के कुछ इलाकों में प्रवासियों की संक्या काफी ज्यादा है. 2020-21 के आंकड़ों के मुताबिक सीन-सेंट-डेनिस (Seine-Saint-Denis) में करीब 32 फीसदी आबादी अप्रवासी थी, जबकि पेरिस में यह करीब 20 फीसदी थी. हालांकि यहां एक जरूरी फर्क समझने की जरूरत है कि अप्रवासी होना और मुस्लिम होना दोनों अलग-अलग बातें हैं. हालांकि इन अप्रवासियों में अधिकतर मुस्लिम धर्म को मानने वाले लोग जरूर हैं.
फ्रांस में लगातार बढ़ रही मुस्लिम आबादी का असर यहां की राजनीति पर भी देखने को मिल रहा है. विपक्षी दल के कई नेता मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को ‘इस्लामिक कॉलोनियां’ जैसे शब्दों से नवाजते दिखाई देते हैं.
फ्रांस में असली राजनीतिक बहस सिर्फ मुस्लिम आबादी की संख्या को लेकर नहीं हो रही है. इस्लामिक संगठन भी फ्रांस की राजनीति में चिंता के नजर से देखा जा रहा है. सरकार के भीतर एक बड़ा मुद्दा इस्लामी विचारधारा से जुड़े संगठनों के प्रभावों को रोकने की बात करता है.
फ्रांस के सीनेट ने मई 2026 में इस्लामिस्ट प्रवेश (entrisme) से निपटने वाली एक विधेयक को 208-124 के अंतर से मंजूरी दी. इस प्रस्ताव के मुताबिक सरकार का उद्देश्य ऐसे संगठनों और गतिविधियों से निपटना है जिन्हें फ्रांस के मूल सिद्धांतों के लिए चुनौती माना जाता है.
गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने भी इस बहस में एक महत्वपूर्ण फर्क रखा है. उन्होंने कहा कि उन्हें फ्रांस में इस्लाम से समस्या नहीं है, बल्कि वे उन लोगों और संगठनों के खिलाफ हैं जो इस्लाम का इस्तेमाल फ्रांसीसी गणराज्य के सिद्धांतों को कमजोर करने के लिए करते हैं. उनके मुताबिक समस्या तब पैदा होती है जब कोई संगठन सार्वजनिक संस्थाओं को धार्मिक नियमों के हिसाब से चलाने की मांग करता है या लैंगिक समानता और फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ जाता है.
फ्रांस की चिंता मुस्लिम ब्रदरहुड और उससे जुड़े नेटवर्क भी हैं. अप्रैल 2026 में फ्रांस के गृह मंत्री नुनेज ने ‘Musulmans de France’ के एक कार्यक्रम पर रोक लगाने की कोशिश की थी. प्रशासन का कहना था कि कार्यक्रम में कुछ ऐसे लोग और सामग्री आ सकती है जो फ्रांस के लोकतांत्रिक मूल्यों को सवालों के कटघरे में रखती है. हालांकि बाद में प्रशासनिक अदालत ने इस कार्यक्रम को आयोजित करने की अनुमति दे दी.
फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन इस मुद्दे पर सरकार से कहीं ज्यादा सख्त रुख रखती हैं. सितंबर 2026 में उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए जनादेश मिलता है तो वह सार्वजनिक तौर पर इस्लामी हिजाब पर प्रतिबंध लगाएंगी. उन्होंने मस्जिदों की फंडिंग, कट्टरपंथी इमामों और मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े नेटवर्क के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की बात कही है.
अगर हम इन मामलों को विस्तृत तौर पर देखें तो फ्रांस में इस समय राजनीतिक बहस दो स्तरों पर चल रही है. एक तरफ तो बढ़ती मुस्लिम आबादी और इमिग्रेशन है तो दूसरा इस्लामिक संगठनों का फ्रांसिसि कानूनों के साथ टकराव है.
फ्रांस के मामले को ब्रिटेन के उदाहरण से समझना आसान है. इंग्लिश चैनल के रास्ते ब्रिटेन पहुंचने वाले अवैध प्रवासियों की संख्या लंबे समय से राजनीतिक मुद्दा बनी हुई है. ब्रिटिश सरकार के मुताबिक जून 2026 तक के एक साल में करीब 38 हजार अवैध प्रवासी ब्रिटेन पहुंचे थे.
यूरोपीय देशों में लगातार बढ़ रहे अवैध इमिग्रेशन को रोकने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस ने कड़े कदम उठाये. दोनों देशों ने अप्रैल 2026 में अवैध चैनल क्रॉसिंग रोकने के लिए सहयोग बढ़ाने का समझौता किया. ब्रिटिश सरकार के मुताबिक दोनों देशों के सहयोग से 2024 के बाद 42 हजार से ज्यादा अवैध प्रवासियों को चैनल पार करने से रोका गया. साल 2025 में 480 मानव तस्करों की गिरफ्तारी भी हुई.
इन सभी मामलों को लेकर यूरोप में पोलैंड की नीति को अपनाने की बात कही जा रही है. दरअसल बेलारूस सीमा पर प्रवासन के दबाव को देखते हुए पोलैंड ने मार्च 2025 से अंतरराष्ट्रीय संरक्षण के लिए आवेदन करने के अधिकार को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया. मई 2026 में इस व्यवस्था को 60 दिनों के लिए फिर बढ़ाया गया. पोलिश सरकार के एक मंत्री ने टीवी पर खुलेआम कहा कि पोलैंड एक भी मुस्लिम अवैध प्रवासियों को अपने देश में घुसने नहीं देगा.
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा था कि हम नहीं चाहते कि पोलैंड की भी स्थिति ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसी हो जाए. जहां की यूरोपीय आबादी घरों से बाहर निकलने से डर रही है. उन्होंने अपनी नीतियों की सफलता का बखान करते हुए दावा किया था कि आज पोलैंड में एक भी अवैध मुस्लिम प्रवासी नहीं है. जिसकी वजह से पोलिश लोग खुली हवा में सुरक्षित जिंदगी जी रहे हैं.
यहां दो अलग सवालों को अलग करना जरूरी है. पहला क्या यूरोप में इमिग्रेशन और अवैध इमिग्रेशन बड़ा मुद्दा है? तो इसका जवाब हां है. ब्रिटेन, पोलैंड और यूरोप के कई अलग-अलग देशों में यह एक गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है.
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दूसरा- क्या फ्रांस में इस समय हो रहे छात्र प्रदर्शनों का कारण ‘इस्लाम का फ्रांस पर कब्जा’ है? मौजूदा उपलब्ध रिपोर्टों में इसका प्रमाण नहीं मिलता. प्रदर्शन की वजह फ्रांस में खराब होती शिक्षा व्यवस्था और शासन की विफलता है.
-भारत एक्सप्रेस
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