पश्चिम एशिया में जारी युद्ध अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां केवल मिसाइलें और बम ही नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगी की सबसे बुनियादी जरूरत यानी पानी भी एक बड़ा हथियार बन गया है. ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के कारण कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे खाड़ी के समृद्ध अरब मुल्कों पर पीने के पानी का अभूतपूर्व संकट मंडराने लगा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचा, तो इन देशों में लोग बूंद-बूंद पानी को तरस जाएंगे.
ताजा घटनाक्रम में, अमेरिकी सेना द्वारा किए गए भीषण हवाई हमलों में ईरान के भीतर भारी नुकसान हुआ है. इन हमलों के कारण ईरान के ग्रामीण इलाकों में पानी की बुनियादी संरचना पूरी तरह ध्वस्त हो गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, सैकड़ों गांवों की पानी की सप्लाई लाइनें, पंपिंग स्टेशन और स्थानीय जलाशय पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं.
इस तबाही का बेहद बुरा असर पड़ने वाला है. जल आपूर्ति ठप होने से लाखों लोग बिना पानी के जीने को मजबूर हो गए हैं. युद्धग्रस्त इलाकों में पानी की भारी किल्लत के कारण संक्रामक बीमारियों और महामारी फैलने का खतरा कई गुना बढ़ गया है. बुनियादी सुविधाओं के इस विनाश ने ईरान के भीतर एक बड़ा मानवीय संकट खड़ा कर दिया है.
भौगोलिक रूप से अरब देश पूरी तरह से मरुस्थलीय (रेगिस्तानी) इलाके हैं, जहां न तो बारमासी नदियां हैं और न ही पर्याप्त भूमिगत जल (Groundwater). ऐसे में सवाल उठता है कि ये देश अपनी प्यास कैसे बुझाते हैं?
डिसैलिनेशन प्लांट (Desalination Plants) – समंदर को मीठा बनाने की तकनीक: खाड़ी देश पीने के पानी के लिए पूरी तरह से समंदर के पानी पर निर्भर हैं. इन देशों ने तटीय इलाकों में दुनिया के सबसे बड़े और आधुनिक ‘डिसैलिनेशन प्लांट’ (वि-लवणीकरण संयंत्र) लगा रखे हैं. ये विशाल मशीनें और संयंत्र समंदर के खारे पानी को रिफाइन करके उसे पीने योग्य मीठे पानी में तब्दील करते हैं. सऊदी अरब और यूएई अपनी जरूरत का 70 से 80 प्रतिशत से ज्यादा पीने का पानी इन्हीं भारी-भरकम संयंत्रों से हासिल करते हैं.
यह एक आम धारणा है कि खाड़ी देश भारत या अन्य देशों से पीने का पानी आयात (खरीदते) करते हैं, लेकिन व्यावसायिक स्तर पर ऐसा नहीं है. पानी को जहाजों के जरिए इतनी दूर ले जाना बेहद खर्चीला होता है. हालांकि, पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर (बोतलबंद पानी) और प्रीमियम वॉटर का कुछ हिस्सा जरूर भारत और यूरोपीय देशों से आयात किया जाता है, लेकिन वहां की आम जनता और उद्योगों के लिए पानी का मुख्य स्रोत उनके अपने घरेलू डिसैलिनेशन प्लांट ही हैं.
अरब देशों की यही सबसे बड़ी ताकत अब उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी है. ये सभी डिसैलिनेशन प्लांट फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के तटों पर स्थित हैं, जो सीधे तौर पर युद्ध क्षेत्र के दायरे में आते हैं. यदि ईरान या उसके सहयोगी गुटों ने जवाबी कार्रवाई में इन संयंत्रों या इन्हें बिजली देने वाले पावर ग्रिडों को निशाना बनाया, तो सऊदी अरब, कुवैत और यूएई जैसे देशों में पानी की सप्लाई चंद घंटों में ठप हो जाएगी.
इन देशों के पास पानी का बैकअप या स्टोरेज बहुत सीमित दिनों का होता है. ऊर्जा और तकनीक पर टिकी यह जल व्यवस्था युद्ध के एक ही झटके में चरमरा सकती है. यही कारण है कि इस युद्ध को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर चिंताएं जताई जा रही हैं, क्योंकि पानी का यह संकट समूचे मध्य पूर्व को भुखमरी और तबाही की ओर धकेल सकता है.
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