बांग्लादेश में मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर राष्ट्रपति बने
बांग्लादेश की राजनीति में 35 साल बाद हुए सबसे ऐतिहासिक और बड़े उलटफेर में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कद्दावर नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर (Mirza Fakhrul Islam Alamgir) देश के 23वें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं! जातीय संसद में हुए चुनाव में भारी-भरकम 255 वोट हासिल कर फखरुल ने कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी और छात्र गुटों समर्थित उम्मीदवार को पटखनी दे दी.
लगभग 15 सालों तक हसीना सरकार के अत्याचारों को सहते हुए अपनी पार्टी को संभाले रखने वाले फखरुल का राष्ट्रपति बनना सिर्फ ढाका का पावर गेम नहीं बदल रहा बल्कि नई दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में भी सुकून की सांस ला रहा है.
बांग्लादेश में पिछले साढ़े तीन दशकों से राष्ट्रपति पद पर कोई असली चुनाव ही नहीं होता था, क्योंकि विपक्षी दल अपने कैंडिडेट ही नहीं उतारते थे और एक ही नाम पर मुहर लग जाती थी. लेकिन इस बार(Bangladesh New President Mirza Fakhrul Islam) बाकायदा 343 सांसदों ने वोट डाले.
BNP के संकटमोचक फखरुल के सामने जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) का 11 दलीय गठबंधन खड़ा था, जिसके उम्मीदवार ओली अहमद को सिर्फ 88 वोट मिले. फखरुल की इस एकतरफा जीत ने बांग्लादेश के भीतर पैर पसार रही भारत-विरोधी और कट्टरपंथी ताकतों की हवा निकाल दी है.
भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर राष्ट्रपति मिर्जा फखरुल का नजरिया बेहद व्यावहारिक और सुलझा हुआ है. फखरुल का साफ मानना है कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण जैसे संवेदनशील मुद्दों को कूटनीति से सुलझाया जा सकता है, उससे दोनों देशों के व्यापार और दोस्ती में कड़वाहट नहीं आनी चाहिए.
फखरुल ने डंके की चोट पर कहा था कि अमेरिका और चीन में भी तमाम उलझनें हैं लेकिन वे मिलकर काम करते हैं. जो लोग भारत के साथ दुश्मनी, जंग और संघर्ष की बात करते हैं, वे सरासर पागल हैं!” उनका यह उदारवादी रुख भारत के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है.
78 वर्षीय फखरुल कोई कागजी नेता नहीं हैं बल्कि सड़क से उठे जुझारू राजनेता हैं. 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत में शरण लेकर वामपंथी सेनानियों को एकजुट करने वाले फखरुल बाद में प्रोफेसर बने और फिर राजनीति में आए. जब पूर्व पीएम खालिदा जिया जेल में थीं और उनके बेटे तारिक रहमान लंदन में बैठे थे, तब फखरुल ने ही ढाका की सड़कों पर लाठियां खाईं. हसीना सरकार के दौर में उन पर 111 मुकदमे ठोके गए और वे 11 बार जेल गए, लेकिन पार्टी को बिखरने नहीं दिया.
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फखरुल की ताजपोशी से भारत को कूटनीतिक मोर्चे पर बड़ा फायदा होने वाला है. वे कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी की भारत-विरोधी सनक से दूर रहते हैं और एक स्थिर, शांतिपूर्ण और उदारवादी पड़ोस की वकालत करते हैं. 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के समय भारत में लंबा वक्त बिताने की वजह से वे भारत के ऐतिहासिक योगदान और सुरक्षा जरूरतों को बखूबी समझते हैं. उनके राष्ट्रपति रहते बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल भारत-विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए होना लगभग नामुमकिन है.
-भारत एक्सप्रेस
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