Bangladesh Saudi Arabia Over Death Penalty: सऊदी अरब के मक्का में दो बांग्लादेशी नागरिकों नजरुल इस्लाम और सिती अख्तर को गोपनीय तरीके से मौत की सजा दिए जाने के बाद ढाका के सियासी गलियारों में भारी आक्रोश है. लेकिन इस जनाक्रोश के बावजूद, बांग्लादेश की सरकार सऊदी अरब के खिलाफ कोई कड़ा कूटनीतिक कदम उठाने की स्थिति में नहीं दिख रही है. बांग्लादेशी दूतावास को बिना कोई पूर्व सूचना दिए अपने दो नागरिकों को सूली पर चढ़ा दिए जाने के बाद, बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने रियाद में केवल एक औपचारिक ‘राजनयिक पत्र’ भेजकर विरोध दर्ज कराया है.
सवाल उठ रहा है कि क्या बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार सऊदी क्राउन प्रिंस व प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद के सख्त रुख के सामने अपने नागरिकों के मानवाधिकारों के लिए आवाज बुलंद कर पाएगी या फिर आर्थिक लाचारी के चलते ढाका को पूरी तरह खामोश रहना पड़ेगा?
राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश चाहे कितना भी नाराज हो, वह सऊदी अरब से रिश्ते बिगाड़ने का जोखिम कतई नहीं उठा सकता. इसके पीछे सीधे तौर पर बांग्लादेश की चरमराती अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार की निर्भरता है.
सऊदी अरब में वर्तमान में करीब 25 से 30 लाख बांग्लादेशी प्रवासी काम करते हैं, जो वहां के निर्माण, सफाई, होटल और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में कार्यरत हैं. बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खाड़ी देशों से आने वाले विदेशी धन (रेमिटेंस) पर टिकी है. सऊदी अरब से हर महीने अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बांग्लादेश के ग्रामीण परिवारों तक पहुंचती है.
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अगर बांग्लादेश की सरकार ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ज्यादा तूल दिया, तो सऊदी हुकूमत बांग्लादेशी कामगारों के वीजा पर रोक लगा सकती है या प्रवासियों को वापस भेजना शुरू कर सकती है. यह झटका बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर देगा.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के हालिया आंकड़े बताते हैं कि सऊदी अरब में मृत्युदंड की रफ्तार अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई है. वर्ष 2026 के शुरुआती 9 महीनों में ही सऊदी अरब 175 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार चुका है. इनमें से 94 से अधिक लोग 20 अलग-अलग देशों के विदेशी नागरिक थे.
अधिकांश मामलों में गरीब एशियाई और अफ्रीकी देशों (जैसे बांग्लादेश, पाकिस्तान, यमन, इथियोपिया) के प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाया जाता है. इन प्रवासियों के पास न तो अरबी भाषा का ज्ञान होता है और न ही महंगे वकीलों को नियुक्त करने की आर्थिक हैसियत. जब तक उनके दूतावासों को जानकारी मिलती है, तब तक बंद कमरों में ‘ताजीर’ के तहत फैसला सुनाकर शाही फरमान से उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता है.
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सामने घरेलू जनता का भारी दबाव है, जो अपने नागरिकों के साथ हुए इस अमानवीय व्यवहार पर सख्त रुख की मांग कर रही है. वहीं दूसरी ओर, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) अपनी घरेलू संप्रभुता और शरिया कानूनों पर किसी भी बाहरी मुल्क का दबाव स्वीकार नहीं करते.
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ढाका अच्छी तरह जानता है कि सऊदी अरब के साथ किसी भी तरह की कूटनीतिक तनातनी का सीधा असर देश की ऊर्जा आपूर्ति (कच्चा तेल), हज कोटे और आर्थिक इमदाद पर पड़ सकता है. यही वजह है कि औपचारिक कूटनीतिक विरोध की रस्म अदायगी के बाद ढाका इस पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने के लिए मजबूर है. यह घटना साबित करती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आर्थिक रूप से कमजोर देश अपने नागरिकों की जान की कीमत पर भी शक्तिशाली मुल्कों के आगे बेबस नजर आते हैं.
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