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नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाला 18वां BRICS शिखर सम्मेलन सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रहने वाला. इस बार BRICS की मेज पर युद्ध, प्रतिबंध, डॉलर, तेल, समुद्री रास्ते और बदलती विश्व व्यवस्था सब एक साथ मौजूद हैं.
अमेरिका और इजरायल के साथ जारी युद्ध और बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का नई दिल्ली पहुंचना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तेहरान के लिए BRICS अब केवल कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक विकल्पों का संभावित नेटवर्क भी बनता जा रहा है. युद्ध ने BRICS के भीतर खास तौर पर ईरान और UAE के बीच तनाव बढ़ा दिया है और संगठन के लिए एक साझा रुख बनाना कठिन हो गया है.
ईरान की प्राथमिकता साफ दिखाई देती है कि पश्चिमी प्रतिबंधों से निकलने के लिए नए व्यापारिक रास्ते, वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था, राष्ट्रीय मुद्राओं में कारोबार और रूस-चीन-भारत जैसे बड़े देशों के साथ रणनीतिक सहयोग.
लेकिन यहीं से BRICS की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है. क्योंकि ईरान चाहता है कि पश्चिम एशिया के युद्ध पर BRICS ज्यादा स्पष्ट राजनीतिक रुख अपनाए.
दूसरी तरफ UAE और कुछ अन्य सदस्य ईरान के हमलों और ऊर्जा ढांचे पर हमलों को लेकर अलग दृष्टिकोण रखते हैं. यही कारण है कि मई में BRICS के विदेश मंत्रियों की बैठक बिना संयुक्त बयान के समाप्त हो गई थी. ईरान और UAE के मतभेदों के कारण पश्चिम एशिया संकट पर साझा भाषा नहीं बन पाई थी.
बता दें कि अब दिल्ली में BRICS के Sherpas इसी भाषा को लेकर अंतिम सहमति बनाने में जुटे हैं. ताजा रिपोर्टों के अनुसार ईरान और UAE के बीच मतभेदों को पाटने की कोशिश हुई है और दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया युद्ध के संदर्भ में ऐसी भाषा तलाशने का प्रयास हो रहा है जिसे सभी सदस्य स्वीकार कर सकें.
ईरान की समस्या सिर्फ युद्ध नहीं है. उसके सामने प्रतिबंध, बैंकिंग चैनलों पर दबाव, तेल निर्यात, विदेशी मुद्रा और व्यापारिक भुगतान जैसी समस्याएं हैं.
ऐसे में रूस और चीन उसके लिए पहले से महत्वपूर्ण हैं.अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव के बीच चीन और ईरान के बीच तेल के बदले सामान जैसी वैकल्पिक व्यापार व्यवस्थाएं विकसित हुई हैं.
रूस भी पश्चिमी प्रतिबंधों से लंबे समय से जूझ रहा है. यानी तेहरान, मॉस्को और बीजिंग के बीच एक साझा अनुभव है पश्चिमी आर्थिक दबाव से निपटने का अनुभव.
वहीं, भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है, लेकिन रूस से भी उसके मजबूत संबंध हैं और ईरान के साथ भी भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्ते हैं. यही कारण है कि नई दिल्ली ईरान के लिए केवल एक और BRICS सदस्य नहीं है. बल्कि भारत उसके लिए पश्चिम और पूर्व के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पुल हो सकता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अगस्त को SCO सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति पेजेंशकियन से मुलाकात की थी. भारत ने साफ कहा कि पश्चिम एशिया की समस्या का समाधान संवाद और कूटनीति से होना चाहिए. मोदी ने समुद्री व्यापार और navigation की स्वतंत्रता की रक्षा पर भी जोर दिया. भारत ने BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर ईरान के साथ सहयोग जारी रखने की बात कही.
इसका मतलब यह है कि भारत ईरान से दूरी बनाने के बजाय संवाद का रास्ता खुला रखना चाहता है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत ईरान की हर राजनीतिक मांग स्वीकार करेगा.
भारत की चुनौती यही है कि ईरान को नाराज भी न करे, अमेरिका को संदेश भी न दे कि भारत किसी anti-US bloc का हिस्सा बन रहा है, और BRICS को भी युद्ध का सैन्य-कूटनीतिक गठबंधन बनने से रोके.
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-भारत एक्सप्रेस
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