विश्लेषण

पूर्वांचल के किंगमेकर: ओम प्रकाश राजभर ने उप-जाति की पहचान को कैसे बनाया राजनीतिक पूंजी

‘पूर्वांचल के किंगमेकर’ वाक्यांश पूर्वी उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर की उस क्षमता को दर्शाता है, जिसके दम पर वे बड़े दलों को अपनी छोटी पार्टी ‘सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी’ (SBSP) को गंभीरता से लेने पर मजबूर करते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि वे हर चुनाव के नतीजों को अपने हिसाब से नियंत्रित करते हैं. इसका मतलब यह है कि उन्होंने राजभर और अन्य गैर-प्रभुत्वशाली ओबीसी (OBC) मतदाताओं के बीच इतना प्रभाव बना लिया है कि वे कड़े मुकाबले वाली सीटों पर राजनीतिक गठबंधनों, उम्मीदवारों के चयन, नेतृत्व की भूमिकाओं और सत्ता के संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं.

‘पूर्वांचल के किंगमेकर’ का असली मतलब क्या है?

राजनीति में ‘किंगमेकर’ वह चेहरा होता है जो भले ही खुद सबसे बड़ा पद हासिल न करे, लेकिन यह तय करने की ताकत रखता है कि उस पद पर कौन बैठेगा. राजभर के मामले में, यह शब्द पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) के इलाके में उनकी मजबूत मोलभाव (bargaining) करने की स्थिति की ओर इशारा करता है. उनकी पार्टी का वोट बैंक, सार्वजनिक बयानबाजी और गठबंधन में लचीलापन उन्हें पूर्वांचल में अच्छी पकड़ देता है. यह टैग तब सबसे ज्यादा असरदार साबित होता है जब चुनाव कड़े होते हैं, जीत-हार का अंतर बहुत कम होता है और बड़े दलों को अपने मूल मतदाताओं से आगे बढ़ने के लिए जाति आधारित छोटे संगठनों की जरूरत पड़ती है.

यह प्रभाव भले ही पहचान की राजनीति (identity politics) पर टिका हो, लेकिन यह चुनाव के व्यावहारिक गणित के जरिए काम करता है. राजभर ने खुद को उन समुदायों की आवाज के रूप में पेश किया है जो अक्सर ओबीसी श्रेणी के भीतर बड़े जातिगत समूहों के आगे खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं. यह स्थिति उन्हें बड़े दलों के साथ सीटों, मंत्री पद और नीतिगत प्राथमिकताओं पर बातचीत करने की ताकत देती है, खासकर उन इलाकों में जहां राजभर मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है.

मोलभाव की ताकत के पीछे की जातीय पहचान

ओम प्रकाश राजभर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख हैं, जिसकी स्थापना साल 2002 में हुई थी. यह पार्टी पूर्वी उत्तर प्रदेश में राजभर समुदाय के राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई के आधार पर बनी थी. ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ ने अपनी रिपोर्टों में बताया है कि राजभर समुदाय की मौजूदगी पूर्वी यूपी के कई निर्वाचन क्षेत्रों में है, जबकि ‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट के अनुसार राजभर एक ऐसा ओबीसी समुदाय है जिसका इस क्षेत्र के कई जिलों में बड़ा असर है.

यह राजनीतिक पूंजी किसी सामाजिक पहचान को एक पहचाने जाने योग्य चुनावी वोट बैंक में बदलने से मिलती है. जब कोई नेता प्रामाणिकता के साथ यह कह सकता है कि “मैं इस समुदाय के वोटों को प्रभावित कर सकता हूं,” तो बड़े दल उस नेता को उन मतदाताओं तक पहुंचने का जरिया मानने लगते हैं, जिन तक वे अकेले आसानी से नहीं पहुंच सकते.

राजभर के इस मॉडल की मुख्य विशेषताएं:

समुदाय से जुड़ाव: राजभर पहचान और गैर-यादव ओबीसी गोलबंदी से सीधा और स्पष्ट जुड़ाव.

क्षेत्रीय पकड़: ऐसा प्रभाव जो पूर्वांचल की उन सीटों पर सबसे ज्यादा मायने रखता है जहां जातीय गणित बहुत बारीक और संतुलित है.

गठबंधन में लचीलापन: मोलभाव की ताकत बढ़ाने के लिए बड़े गठबंधनों के बीच आने-जाने की क्षमता.

प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व: राजनीति में भागीदारी को स्वाभिमान, पहचान और सत्ता में हिस्सेदारी के रूप में पेश करना.

स्थानीय शासन में दखल: चुनाव का मौसम बीत जाने के बाद भी मंत्री पद या गठबंधन की भूमिकाओं के जरिए जनता के बीच सक्रिय रहना.

ओम प्रकाश राजभर ने पहचान को राजनीतिक पूंजी में कैसे बदला?

उन्होंने उप-जाति की पहचान को राजनीति में एक स्पष्ट ताकत बनाकर यह हासिल किया. राजभर मतदाताओं को किसी दूसरे दल के बड़े गठबंधन का एक छोटा सा हिस्सा बने रहने देने के बजाय, उन्होंने उन्हें एक पार्टी के बैनर तले संगठित किया, उस बैनर को अपनी खास मांगों से जोड़ा और फिर चुनावों का इस्तेमाल अपनी मोलभाव की कीमत परखने के लिए किया.

उनकी यह रणनीति लगातार चर्चा में बने रहने पर भी निर्भर करती है. राजभर की राजनीति सिर्फ घोषणापत्रों की भाषा तक सीमित नहीं है; इसमें रैलियां, बेबाक जनसभाएं, बातचीत, गठबंधन तोड़ना, वापस लौटना और सहयोगियों पर दबाव बनाना शामिल है. यह शैली उन्हें हमेशा खबरों में रखती है और बड़े दलों को यह संदेश देती है कि उन्हें नजरअंदाज करना चुनावी नुकसान पहुंचा सकता है.

चुनावी रणनीतियां जिन्होंने एक छोटी पार्टी को असरदार बनाया

राजभर की चुनावी रणनीतियां यह दिखाती हैं कि कैसे एक छोटी क्षेत्रीय पार्टी अपनी संख्या से ज्यादा असर डाल सकती है. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए पूरे उत्तर प्रदेश पर कब्जा करने की जरूरत नहीं है; उसे बस इतनी सीटों पर प्रासंगिक बने रहने की जरूरत है जहां से वह सत्ता के समीकरणों को बदल सके.

मुख्य रणनीतियों में शामिल हैं:

सीट-स्तरीय ध्यान: उन निर्वाचन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना जहां राजभर और उनसे जुड़े ओबीसी मतदाता नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं.

मोलभाव पर आधारित गठबंधन: सीटों, पहचान और नेतृत्व की भूमिकाओं के बदले अपने वोट-ट्रांसफर की क्षमता का इस्तेमाल करना.

मुद्दों पर आधारित रुख: ओबीसी श्रेणियों के भीतर आरक्षण (उप-वर्गीकरण), प्रतिनिधित्व और सरकारी योजनाओं तक पहुंच जैसे मुद्दों को उठाना.

व्यक्तिगत ब्रांडिंग: ओम प्रकाश राजभर को खुद पार्टी की पहचान और मोलभाव की ताकत का पर्याय बनाना.

गठबंधन का संकेत: अगले चुनावी चक्र में जो पार्टी सबसे ज्यादा फायदेमंद दिखे, उसकी तरफ कदम बढ़ाना.

ये तमाम दांव-पेच यह स्पष्ट करते हैं कि ‘पूर्वांचल का किंगमेकर’ शब्द एकतरफा नियंत्रण से ज्यादा अपनी बात मनवाने की ताकत (leverage) के बारे में है.

राजनीतिक गठबंधन और सत्ता के समीकरण

राजभर के राजनीतिक सफर की चर्चा अक्सर उनके बदलते गठबंधनों के जरिए होती है. एसबीएसपी ने 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़ा था, बाद में 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले दोनों के रास्ते अलग हो गए, और फिर 2022 का विधानसभा चुनाव उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ा. 2022 में एसबीएसपी ने सपा गठबंधन के साथ 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और छह सीटों पर जीत हासिल की.

बाद में वे फिर से बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) में लौट आए, और मार्च 2024 में उन्हें योगी आदित्यनाथ सरकार में शामिल किया गया. उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय की आधिकारिक सूची में श्री ओम प्रकाश राजभर को पंचायती राज, अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ और हज विभागों के कैबिनेट मंत्री के रूप में जिम्मेदारी दी गई है, जिससे उन्हें सीधे तौर पर स्थानीय शासन और जनता से जुड़े प्रशासन का जिम्मा मिला.

हालांकि, 2024 के घोसी लोकसभा चुनाव के नतीजे इस ‘किंगमेकर’ राजनीति की सीमाओं को भी उजागर करते हैं. एनडीए ने घोसी सीट से उनके बेटे अरविंद राजभर को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी राजीव राय ने उन्हें 1,62,943 वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया.

इस मॉडल की सीमाएं क्या हैं?

यह मॉडल तभी तक काम करता है जब तक जातीय प्रभाव सच में वोटों में बदलता रहे. अगर मतदाता आपस में बंट जाएं, स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) हावी हो जाए, या गठबंधन सहयोगी की छवि से उम्मीदवार को नुकसान पहुंचे, तो दावा किया गया वोट बैंक पूरी तरह से ट्रांसफर नहीं हो पाता.

इसमें विश्वसनीयता का भी जोखिम बना रहता है. बार-बार गठबंधन बदलने से मोलभाव की ताकत तो बढ़ सकती है, लेकिन इससे समर्थकों और प्रतिद्वंद्वियों के बीच नेता की निरंतरता पर सवाल भी उठने लगते हैं. किसी भी जाति-आधारित पार्टी को यह बार-बार साबित करना पड़ता है कि उसकी बातचीत से पूरे समुदाय को प्रतिनिधित्व मिल रहा है, न कि सिर्फ कुछ नेताओं को पद.

आम गलतफहमियां और व्यावहारिक उदाहरण

आम गलतफहमियां:

  • ‘किंगमेकर’ का मतलब गारंटीड जीत है: ऐसा बिल्कुल नहीं है; इसका मतलब सिर्फ कड़े राजनीतिक मुकाबलों में प्रभाव होना है.
  • उप-जाति की राजनीति सिर्फ दिखावा है: व्यावहारिक रूप से, यह टिकटों के बंटवारे, प्रचार के रास्तों, कैबिनेट में जगह और स्थानीय शासन की प्राथमिकताओं को तय करती है.
  • छोटी पार्टियां बेअसर होती हैं: त्रिकोणीय या फंसे हुए मुकाबलों में, छोटी पार्टियां जीत के अंतर और गठबंधन के गणित को पूरी तरह बदल सकती हैं.
  • सिर्फ पहचान ही काफी है: संगठन, उम्मीदवार, गठबंधन और विश्वसनीयता आज भी उतनी ही मायने रखती है.

इस मॉडल के व्यावहारिक उदाहरण:

  • कोई बड़ा दल किसी खास ओबीसी समुदाय को साधने के लिए अपने सहयोगी को सीट देता है.
  • गठबंधन में शामिल होने के बाद किसी क्षेत्रीय नेता को मंत्री पद दिया जाता है.
  • चुनावी अभियानों में स्वाभिमान, प्रतिनिधित्व और सामुदायिक पहचान पर जोर दिया जाता है.
  • स्थानीय स्तर पर मिली हार राजनीतिक दलों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या कोई नेता सच में वोट ट्रांसफर कराने में सक्षम है.

पूर्वांचल की राजनीति के लिए क्यों है अहम?

ओम प्रकाश राजभर का उभार पूर्वांचल के एक बड़े सच को उजागर करता है: स्थानीय स्तर की जातीय पहचान राज्य स्तर की सत्ता के समीकरण बदल सकती है. उनकी राजनीति प्रतिनिधित्व, चुनावी रणनीतियों और गठबंधन के मोलभाव के चौराहे पर खड़ी है.

यही वजह है कि चुनावी झटकों के बावजूद ‘पूर्वांचल के किंगमेकर’ की परिभाषा आज भी प्रासंगिक है. यह इस बात को समझती है कि कैसे एक छोटे सामाजिक वर्ग का नेता पहचान को मोलभाव की ताकत में बदल सकता है, और कैसे वह ताकत नेतृत्व की भूमिकाओं, राजनीतिक गठबंधनों और क्षेत्रीय शासन की दिशा को प्रभावित कर सकती है.

यह भी पढ़ें: भूमिहीन, मजदूरी और सम्मान: बिहार के गांवों में आज भी क्यों कायम है वामपंथ की पकड़?

-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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