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पं. दीनदयाल उपाध्याय न कभी सांसद बने, न विधायक. फिर भी वे भारत की पीढ़ियों के लिए इतिहास-पुरुष के रूप में प्रासंगिक बने हुए हैं. कारण साफ है कि उन्होंने राजनीतिक अस्तित्व के लिए मूल्यों का क्षरण नहीं होने दिया. सत्ता या पद की लालसा से ऊपर उठकर उन्होंने सिद्धांत, चरित्र और संगठन की उस भूमि को सींचा, जो आज भी सूखने का नाम नहीं लेती.
1963 में जौनपुर लोकसभा उपचुनाव इसका जीवंत उदाहरण है. जनसंघ के सांसद की असामयिक मृत्यु के बाद उपचुनाव हुआ और दीनदयाल जी उम्मीदवार बनाए गए. उन्होंने जातिगत पहचान को राजनीति के लिए घातक माना. जिन पहचानों को राजनीतिक स्वार्थ के लिए उभारने का परिणाम आज समाज भुगत रहा है, उन पर वे खुले भाषणों में प्रहार करते थे.
सामंती आधिपत्य को यह चुनौती नागवार लगी. परिणाम अपेक्षित था- वे हार गए. पर आदर्श का पौधा लगा गए. भले ही वह पौधा माली की प्रतीक्षा में हो, पर मुरझाया नहीं है. जातिविहीन समाज का सपना न मरा है, न पराजित होगा. दीनदयाल भारत के आदर्श की उर्वरा भूमि से कभी लुप्त नहीं होंगे और समय आने पर सशक्त होकर उभरेंगे.
राजस्थान में जागीरदारी के प्रश्न पर भी उनका रवैया यादगार है. पार्टी के अधिकांश विधायकों का मत उसे समाप्त करने के विरुद्ध था. समानता के प्रश्न पर राजनीतिक त्याग का ऐसा उदाहरण दूसरा नहीं मिलता. उन्होंने उन सबको पार्टी से निलंबित कर नए सिरे से संगठन खड़ा किया. पद और संख्या की जगह सिद्धांत को प्राथमिकता देने का यह उदाहरण आज भी दुर्लभ है.
उनके भाषणों, लेखनों और संवादों में प्रतिक्रियावाद नहीं होता था. एक भी शब्द आपत्तिजनक हुए बिना वे विचार को प्रामाणिक और प्रभावी तरीके से रखते थे. राजनेता के लिए स्वाध्याय और चिंतन-मनन जैसे आवश्यक गुणों को उन्होंने स्वयं उदाहरण प्रस्तुत कर स्थापित किया.
यद्यपि वह काल ऐसा था जिसमें गांधी, नेहरू, कृपलानी, मुंशी, कामथ, टंडन, लोहिया, लिमये, वाजपेयी, जगन्नाथ राव जोशी, हीरेन मुखर्जी, भूपेश गुप्ता जैसे अनेक नेता पढ़ने-लिखने वाले थे. समय का चक्र उलट गया. पढ़ने वाले राजनेता अयोग्य माने जाने लगे और गालीबाज सफल होते गए. पर इतिहास का चक्रवात अंततः सबको दुरुस्त करता है.
उनकी लेखनी में रचनात्मकता थी. पंचवर्षीय योजनाओं की न्यूनताओं को देखते हुए उन्होंने देश के सामने Two Plans नामक तथ्य-तर्क युक्त दस्तावेज रखा. जनसंघ राजनीति में सिद्धांत-व्यवहार-मूल्यों का मानक बना, तो उसके पीछे उनकी दृष्टि और सामूहिक तप से मूल्यों का सृजन था. वे संगठक, नेता और चिंतक तीनों के संयोग थे. श्री गुरुजी (गोलवलकर) ने उन्हें शत-प्रतिशत स्वयंसेवक कहा था. यह प्रशंसा उनकी समर्पित जीवन-शैली और शुद्ध विचार-धारा की गवाही देती है.
दीनदयाल जी का महत्व इसलिए नहीं है कि उन्होंने कितनी सीटें जीतीं, बल्कि इसलिए है कि उन्होंने राजनीति को मूल्यों की कसौटी पर कसने का प्रयास किया. जाति, सामंतवाद और अवसरवाद के खिलाफ उनका संघर्ष आज भी प्रासंगिक है. उनके आदर्श का पौधा अभी भी जीवित है. आवश्यकता केवल उस माली की है जो इसे सींचे और आगे बढ़ाए. इतिहास उन्हें संसद की कुर्सी से नहीं, बल्कि चरित्र और विचार की ऊंचाई से याद रखेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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