विश्लेषण

भूमिहीन, मजदूरी और सम्मान: बिहार के गांवों में आज भी क्यों कायम है वामपंथ की पकड़?

बिहार में वामपंथ केवल चुनाव के समय नजर आने वाली ताकत नहीं है; यह जमीन, मजदूरी, आत्मसम्मान और जातीय वर्चस्व के खिलाफ गांव के स्तर पर बोली जाने वाली एक भाषा है. सीटों की संख्या चाहे बढ़े या घटे, वामपंथी राजनीति लगातार इस बात को तय करती है कि ग्रामीण बिहार की राजनीति में भूमिहीन लोगों, दलितों, खेतिहर मजदूरों और पिछड़े समुदायों के गरीबों के बारे में किस तरह से बात की जाए.

ग्रामीण बिहार में वामपंथ आज भी क्यों अहम है?

वामपंथ आज भी इसलिए मायने रखता है क्योंकि यह उन विवादों की बात करता है जो स्थानीय हैं, बुनियादी जरूरतों से जुड़े हैं और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं: जैसे जमीन का मालिक कौन है, काम किसे मिलता है, किसे बेदखल किया जा रहा है और गांव में अपनी बात कहने का हक किसे है. 2020 के विधानसभा चुनाव में भाकपा (माले) लिबरेशन ने 12 सीटें जीती थीं, जबकि सीपीआई और सीपीआई(एम) को दो-दो सीटें मिली थीं.

उपलब्ध चुनाव-पश्चात विश्लेषणों के अनुसार, 2025 में वामपंथ को बड़ा झटका लगा, जिसमें भाकपा (माले) सिमटकर दो सीटों पर आ गई और सीपीआई(एम) को केवल एक सीट मिली. सीटों में आई यह गिरावट ग्रामीण स्तर की शिकायतों को उठाने वाले एक संगठन के रूप में उसकी भूमिका को खत्म नहीं करती, खासकर तब जब बिहार की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां अक्सर ऊपर से ही जातीय गोलबंदी और समझौते करती हैं.

नारों के पीछे जमीन का असली सवाल

बिहार में ‘भूमिहीन’ होना सिर्फ एक आर्थिक पहचान नहीं है. यह अक्सर जातीय ऊंच-नीच, दबंग भूस्वामियों पर निर्भरता, असुरक्षित आवास और खेती की मजदूरी में मोलभाव की कमजोर क्षमता से जुड़ा होता है. यही वजह है कि वामपंथी अभियान केवल विकास के बड़े-बड़े वादों के बजाय बार-बार बसने के लिए जमीन, भूमि पुनर्वितरण, बेदखली से सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी के मुद्दों पर लौटते हैं.

भाकपा (माले) की हालिया बिहार चुनाव सामग्री में मजदूरों, किसानों, दलितों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और युवाओं के अधिकारों के साथ-साथ भूमिहीन और बेघर परिवारों के लिए जमीन के मुद्दे को प्रमुखता से आगे रखा गया. मतदाता इस एजेंडे को चुनाव में कितना समर्थन देते हैं, यह गठबंधनों, उम्मीदवारों और स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करता है, लेकिन इसके बावजूद यह शब्दावली ग्रामीण गोलबंदी के केंद्र में बनी हुई है.

सीटों से परे वामपंथ का दायरा और प्रभाव

ग्रामीण इलाकों में वामपंथ की ताकत ऐतिहासिक रूप से किसी बड़े दिखावे के बजाय उसके संगठन से आई है. कैडर, यूनियनें, छात्र संगठन, महिला समूह और गांव के स्तर पर चलने वाले अभियान किसी पार्टी को विधानसभा में दबदबा न होने पर भी जमीन पर बनाए रखते हैं.

प्रभाव के मुख्य कारणों में शामिल हैं:

स्थानीय विवादों की राजनीति: मजदूरी के झगड़े, जमीन पर कब्जे, पुलिस केस और जातीय हिंसा के मामलों में अक्सर संगठित समर्थन की जरूरत होती है.

वर्ग और जाति का स्पष्ट संदेश: वामपंथ गरीबी को सिर्फ आमदनी की कमी से नहीं, बल्कि सामाजिक ताकत और वर्चस्व से जोड़कर देखता है.

गठबंधन में बढ़त: जहां कैडर अनुशासित होते हैं, वहां छोटी पार्टियां भी विपक्षी रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं.

मुद्दों की याददाश्त: बेदखली के खतरों, हिंसा या मजदूरी के संघर्ष के समय कौन साथ खड़ा था, इसे परिवार लंबे समय तक याद रखते हैं.

बिहार की राजनीति में आगे क्या देखना जरूरी?

ग्रामीण बिहार की राजनीति के भविष्य को समझने के लिए चुनाव के बाद लोगों के गुस्से की दिशा को देखना चाहिए, न कि केवल यह कि सरकार कौन बना रहा है. 2025 में एनडीए का बड़ा बहुमत कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच, मजबूत नेतृत्व तंत्र, जातीय गठबंधनों और संगठनात्मक क्षमता की ताकत को दिखाता है. वहीं, वामपंथ की घटी हुई सीटें एक कठिन गठबंधन और निर्वाचन क्षेत्रों के समीकरणों के बीच उसकी सीमाओं को दर्शाती हैं.

फिर भी, वामपंथ की प्रासंगिकता तीन बातों पर निर्भर करेगी: क्या वह बूथ स्तर पर विश्वास को फिर से बना सकता है, क्या वह जमीन और मजदूरी के मुद्दों को युवाओं के रोजगार से जोड़ सकता है, और क्या वह अपनी अलग ग्रामीण पहचान खोए बिना नए गठबंधन बना सकता है. बिहार में, सबसे ज्यादा सुनाई देने वाली राजनीति हमेशा सबसे बड़ी पार्टी की ही नहीं होती; कभी-कभी यह वह ताकत भी होती है जो गांव के असहज सवालों को जिंदा रखती है.

यह भी पढ़ें: खेती से हुनर तक: जयंत चौधरी का ‘स्किल-बेस्ड’ मॉडल कैसे संवारेगा यूपी के गन्ना किसानों की किस्मत?

-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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