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Singapore Economy History: प्राकृतिक संसाधनों से हीन और दंगों से जूझते एक छोटे से द्वीप को दुनिया के सबसे अमीर व विकसित देशों की कतार में खड़ा कर देना कोई मामूली उपलब्धि नहीं है. ली क्वान यू ने अपनी दूरदर्शी नीतियों, भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन और कड़े नियमों के दम पर सिंगापुर की तकदीर बदल दी. हालांकि, उनकी सफलता के साथ तानाशाही रवैये और कड़े प्रतिबंधों की आलोचना भी जुड़ी रही.
वर्ष 1923 में जन्मे ली क्वान यू ने 1959 से 1990 तक सिंगापुर के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया. 1965 में स्वतंत्रता के बाद उन्होंने अपने कड़े अनुशासन, कारोबार-अनुकूल नीतियों और साफ-सुथरे प्रशासन के बल पर देश की प्रति व्यक्ति आय को 500 डॉलर से बढ़ाकर लगभग 55,000 डॉलर तक पहुंचा दिया. हालाँकि, मीडिया पर पाबंदी और राजनीतिक विरोधियों पर सख्ती के कारण उनकी आलोचना भी हुई. आकार पटेल जैसे विश्लेषकों का मानना है कि सिंगापुर का यह मॉडल भारत जैसे विशाल और लोकतांत्रिक देश में सीधे लागू नहीं किया जा सकता, बल्कि भारत को अपनी विविधता के अनुसार इसके चुनिंदा प्रशासनिक पाठ ही अपनाने चाहिए.
वर्ष 1923 में जन्मे ली क्वान यू 1959 में प्रधानमंत्री बने. उस समय सिंगापुर ब्रिटिश शासन के अधीन एक छोटा-सा भू-भाग था- प्राकृतिक संसाधनों से रहित, बहुभाषी (चीनी, मलय और भारतीय) आबादी वाला और दंगों-अशांति से ग्रस्त. 1965 में उन्होंने मलेशिया से अलग होकर स्वतंत्र सिंगापुर का नेतृत्व किया. उनके प्रमुख सिद्धांत थे- प्रभावी और साफ-सुथरी सरकार, कारोबार-अनुकूल आर्थिक नीतियां तथा कठोर सामाजिक व्यवस्था. इनके बल पर विश्व की बड़ी कंपनियां सिंगापुर पहुंची और देश का जीवन-स्तर तेजी से ऊंचा हुआ.
हेनरी किसिंजर ने उनकी उपलब्धि को रेखांकित करते हुए कहा था कि 1965 में प्रति व्यक्ति आय मात्र 500 डॉलर थी, जो बाद में लगभग 55,000 डॉलर तक पहुंच गई. एक पीढ़ी में ही सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र, दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रमुख बौद्धिक और स्वास्थ्य केंद्र तथा वैश्विक सम्मेलनों का पसंदीदा स्थान बन गया. ली ने पीपुल्स एक्शन पार्टी (पीएपी) की सह-स्थापना की, जो 1959 से निरंतर सत्ता में है. वे 1990 में प्रधानमंत्री पद छोड़कर पीछे हट गए, लेकिन राजनीति पर उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा.
ली की छवि पूरी तरह विवाद-मुक्त नहीं रही. मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश और राजनीतिक विरोधियों के प्रति कठोर रवैये के लिए उनकी आलोचना होती रही. च्यूइंग गम पर पाबंदी और बेंत मारने जैसे शारीरिक दंड जैसे कानूनों ने भी देश की छवि पर असर डाला. फिर भी, स्वच्छता, अनुशासन और आर्थिक सफलता ने सिंगापुर को वैश्विक प्रशंसा दिलाई.
उनके परिवार में दो पुत्र- वर्तमान प्रधानमंत्री ली सीन लूंग और ली सीन यांग तथा पुत्री ली वेई लिंग शामिल हैं. उनकी पत्नी का 2010 में निधन हो चुका था.
ली क्वान यू की सफलता पर कई भारतीय नेता मुग्ध रहे हैं. लेकिन आलोचक आकार पटेल जैसे लेखकों का मानना है कि सिंगापुर की उपलब्धियां भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और संसाधन-संकट वाले देश में आसानी से दोहराई नहीं जा सकतीं. सिंगापुर को ब्रिटिश शासन की विरासत, विकसित बंदरगाह, छोटी आबादी और उद्यमी चीनी प्रवासियों (जिनमें कंफ्यूसियन अनुशासन की परंपरा थी) जैसी अनुकूल परिस्थितियाँ मिली थीं. ली का अनुशासित और ईमानदार प्रशासन इन परिस्थितियों का कुशल उपयोग कर सका.
एकदलीय शासन ने दीर्घकालिक नीतियां लागू करने में मदद की, लेकिन भारत जैसी बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह मॉडल सीधे लागू नहीं हो सकता. सिर्फ एक मजबूत नेता लाने से हालात नहीं बदलते. सिंगापुर जैसी छोटी इकाई में दूसरी गलती की गुंजाइश नहीं थी, जबकि बड़े देश गलतियों से उबर सकते हैं. राज्य की गहरी दखल और नागरिकों पर एकरूपता थोपने के दुष्प्रभाव भी नजरअंदाज नहीं किए जा सकते.
ली क्वान यू ने साबित किया कि साफ शासन, आर्थिक खुलापन और अनुशासन से छोटी जगह भी वैश्विक शक्ति बन सकती है. उनकी विरासत प्रेरणादायक है, खासकर भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन और दीर्घकालिक दृष्टि के मामले में. लेकिन भारत के लिए यह सीधा नकल का मॉडल नहीं, बल्कि अनुकूलन का विषय है. विविधता, लोकतंत्र और विशाल आबादी को ध्यान में रखकर ही सिंगापुर जैसे सबक लिए जा सकते हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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