भारत में युवाओं का गुस्सा कोई नई घटना नहीं है. लगभग हर दशक में किसी न किसी रूप में युवा प्रदर्शनों ने व्यवस्था को हिलाया है चाहे वह 1970 के दशक का जयप्रकाश नारायण आंदोलन हो, 1990 के आरक्षण विरोधी प्रदर्शन हों, या फिर 2010 के बाद के भ्रष्टाचार-विरोधी और नागरिकता कानून संबंधी आंदोलन. जेन जेड भी इस परंपरा से अलग नहीं है. आज के युवा भी सड़कों पर उतर रहे हैं, सोशल मीडिया पर अपनी आवाज उठा रहे हैं और व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं. लेकिन समस्या यह है कि इन प्रदर्शनों को समझने का हमारा तरीका बदल गया है.
आज का राजनीतिक विमर्श इतना ध्रुवीकृत हो चुका है कि हर युवा प्रदर्शन तुरंत “भाजपा बनाम विपक्ष” या “सत्ता बनाम विपक्ष” की चौखट में फिट कर दिया जाता है. एक तरफ से इसे “विदेशी साजिश” या “विपक्षी उकसावे” करार दिया जाता है, तो दूसरी तरफ इसे “सरकार के खिलाफ जनआक्रोश” बताकर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश होती है. इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात खो जाती है युवाओं का असली गुस्सा और हताशा. जब हर प्रदर्शन को राजनीतिक रंग दे दिया जाता है, तो उनके पीछे छिपे ठोस कारणों पर चर्चा ही नहीं हो पाती.
वास्तविकता यह है कि शासन व्यवस्था में कई गंभीर कमियां मौजूद हैं. शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार के अवसर, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, डिजिटल डिवाइड और भविष्य की अनिश्चितता ये ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे युवाओं के जीवन को प्रभावित करते हैं. डिग्री मिलने के बाद भी नौकरी न मिलना, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताएं, स्टार्टअप इकोसिस्टम में असमान अवसर, और नीतिगत फैसलों में युवा आवाज की उपेक्षा ये सब मिलकर हताशा पैदा करते हैं. जब व्यवस्था इन मुद्दों पर पर्याप्त जवाबदेही नहीं दिखाती, तो गुस्सा स्वाभाविक रूप से सड़क पर या सोशल मीडिया पर फूट पड़ता है.
युवा आज सिर्फ नारा लगाने नहीं आ रहे. वे जवाबदेही चाहते हैं. वे बेहतर अवसर चाहते हैं. वे ऐसे समाधान चाहते हैं जो उनके जीवन की वास्तविक समस्याओं को छूएं. उन्हें राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा दिलचस्पी इस बात में है कि परीक्षा प्रणाली कितनी पारदर्शी है, रोजगार सृजन की दर कितनी है, और उनकी आवाज नीति-निर्माण में कितनी सुनी जा रही है.
इस स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. राजनीतिक दोषारोपण के खेल से आगे बढ़कर इन चिंताओं को गंभीरता से सुनना जरूरी है. अगर युवा आक्रोश को सिर्फ राजनीतिक चुनौती मानकर दबाया या खारिज किया गया, तो हताशा और गहरा सकती है. इसके विपरीत, अगर व्यवस्था इन मुद्दों को स्वीकार करे, संवाद स्थापित करे और ठोस कदम उठाए, तो यह गुस्सा रचनात्मक बदलाव में बदल सकता है.
युवा आक्रोश को न तो राजनीतिक हथियार बनाया जाना चाहिए और न ही इसे “अवसरवादी” कहकर खारिज किया जाना चाहिए. यह व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है समझने और जवाब देने की. अगर हम सिर्फ राजनीतिक रंगत देखने में उलझे रहेंगे, तो असली समस्याएं अनसुलझी रह जाएंगी और युवाओं का विश्वास व्यवस्था से और टूटेगा.
संक्षेप में, जेन जेड का गुस्सा पिछले दशकों के युवा आक्रोश की निरंतरता है. इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण की नजर से देखने के बजाय, शासन की कमियों और युवा अपेक्षाओं के संदर्भ में समझना ज्यादा जरूरी है. व्यवस्था को इस आक्रोश को सुनना होगा, समझना होगा और ठोस जवाब देना होगा इससे पहले कि यह और व्यापक रूप ले ले.
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