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डिजिटल युग में AI और आधुनिक तकनीकों का राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने लगा है. इसे एक नए, स्पष्ट और प्रभावशाली रूप में इस्तेमाल करने की ज़रूरत है. ऐसा नहीं करना कहीं न कहीं डिजिटल दमन के नए दौर को बढ़ावा देगा. साथ ही एआई और सत्ता के संतुलन को बनाए रखना निहायत ही आवश्यक है. आज के समय में एआई और डिजिटल तकनीकें केवल विकास का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक नियंत्रण का एक प्रमुख हथियार बन चुकी हैं. ऐसा हम हाल फिलहाल में ऑपरेशन सिन्दूर में और साथ ही दुनिया भर के युद्धों में देख रहे हैं. बाजार और स्टॉक मार्किट में लगातार समाचार में दिखने को मिल रहा है. AI लगातार राजनितिक-सामाजिक क्षेत्र में चुनौतियों को बढ़ा रहा है.
दुनिया भर के कई देश तकनीकी नवाचारों का उपयोग अपने नागरिकों पर नियंत्रण बढ़ाने और किसी भी प्रकार के विरोध या असहमति को दबाने के लिए कर रहे हैं. जिस देश में भी लोकतान्त्रिक परम्परायें कमज़ोर होती है वैसे देशों में इनका लगातार दुरूपयोग हो रहा है और आगे भी ये बढ़ता चला जायेगा. सुरक्षा के नाम पर इसे वैध बनाने की कोशिश हो रही है.
यह प्रवृत्ति केवल तानाशाही देशों तक सीमित नहीं है. लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेता भी अब निजता का हनन करने वाली नीतियों और निगरानी उपकरणों को अपना रहे हैं. दमन में वृद्धि , इंटरनेट शटडाउन, सेंसरशिप, निगरानी और फर्जी खबरों के जरिए नियंत्रण बढ़ाया जा रहा है.
वैश्विक प्रभाव: उत्तर कोरिया, म्यांमार और चीन जैसे कड़े दमनकारी देशों के साथ-साथ अमेरिका, अर्जेंटीना और इटली जैसे उन देशों में भी निगरानी की प्रवृत्तियां बढ़ी हैं, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र माना जाता रहा है.
पहले एआई-आधारित निगरानी मुख्य रूप से चीन जैसे गिने-चुने देशों तक सीमित थी, लेकिन अब इसका प्रसार हर जगह हो चुका है. एआई शासकों को तीन सबसे बड़ी ताकतें देता है: दायरा (Scale), गति (Speed), और दक्षता (Efficiency). सूचनाओं का विश्लेषण के नाम पर दुनिया भर की सुरक्षा एजेंसियां अब व्यक्ति के पर्सनल मैसेज, सोशल मीडिया एक्टिविटी, बैंक रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा, ड्रोन फुटेज और बायोमेट्रिक डेटा को एक साथ विश्लेषित कर सकती हैं. सस्ती तकनीक होने के कारन और साथ ही एआई मॉडल्स को चलाने की लागत घटने के कारण अब कम संसाधन वाले देश और छोटे नेता भी इन दमनकारी उपकरणों को आसानी से अपना रहे हैं.
तकनीक ही दूसरी तरफ प्रतिरोध का साधन बनता हुआ भी दिखाई दे रहा है. तमाम पाबंदियों के बावजूद, तकनीक केवल शासकों का हथियार नहीं है, यह नागरिकों और कार्यकर्ताओं को भी शक्ति प्रदान करती है. आंदोलन खरा करने में ऐसी तकनीक का उपयोग लगातार बढ़ने लगा है. ये तकनीक पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने में भी योगदान कर रही है. अतः डिजिटल युग में भ्रष्टाचार को छिपाना और बंद कमरों में सरकार चलाना मुश्किल हो गया है. साथ ही दुनिया के कई देशों में राजनीतिक बदलाव का कारण बनता दिख रहा है. कई देशों में स्वतंत्र डिजिटल मीडिया के जरिए सरकारी भ्रष्टाचार उजागर हुआ, जिससे राजनीतिक समीकरण बदले.
दूसरी तरफ युवा जन आंदोलनों में नेपाल और बांग्लादेश में ‘जेन-जी’ (Gen Z) के युवाओं ने स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके जन-आक्रोश को संगठित किया और सत्ताधारियों को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया. भारत में भी हाल में नीट एग्जाम के मुद्दे में छात्रों ने तकनीक का इस्तेमाल करके केंद्र सरकार को झुकने पर मजबूर किया.
एआई और डिजिटल तकनीकें एक दोधारी तलवार हैं. जहाँ एक तरफ ये सत्ता को असीमित निगरानी और नियंत्रण की शक्ति देती हैं, वहीं दूसरी तरफ ये आम नागरिकों को तानाशाही के खिलाफ आवाज़ उठाने और जवाबदेही तय करने का सशक्त माध्यम भी प्रदान करती हैं. अतः दुनिया के देशों को एकजुट होकर AI की चुनौती को देखना चाहिए.
अगर ऐसा नहीं हुआ तो एंथ्रोपिक से जिस तरह एक इंजीनियर ने इस्तीफा दिया और दुनिया को आगाह किया कि इसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो यह पूरी दुनिया को ख़त्म करने की कूबत रखता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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