Aviation Safety India: हवाई यात्रा आज आम आदमी की जरूरत बन चुकी है. लाखों यात्री रोज आसमान में उड़ान भरते हैं, इस भरोसे के साथ कि उनके जीवन की बागडोर संभालने वाले पायलट पूरी तरह सचेत, स्वस्थ और नशे से मुक्त होंगे. लेकिन जब भी कोई पायलट नशे या नशीले पदार्थ के प्रभाव में कॉकपिट में बैठता है, तो यह भरोसा टूट जाता है. यह सिर्फ नियम उल्लंघन नहीं, बल्कि सैकड़ों जिंदगियों के साथ खिलवाड़ है. भारत और दुनिया के कई देशों में ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जो यात्री सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.
भारत में नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) के नियम काफ़ी सख्त माने जाते हैं. एयरक्राफ्ट रूल्स 1937 के नियम 24 और सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट्स (सीएआर) सेक्शन 5, सीरीज एफ के तहत पायलट और क्रू को उड़ान शुरू होने से कम से कम 12 घंटे पहले किसी भी नशीले पदार्थ, सेडेटिव, नार्कोटिक या स्टिमुलेंट का सेवन पूरी तरह प्रतिबंधित है. इन सभी पर ‘बॉटल-टू-थ्रॉटल’ नियम लागू है. कानून के मुताबिक ‘ब्लड अल्कोहल कंसन्ट्रेशन’ (बीएसी) जीरो होना चाहिए. हर पायलट और क्रू का ‘प्री-फ्लाइट ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट’ अनिवार्य है, जिसे अब कई जगह वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ किया जाता है. कुछ मामलों में ‘पोस्ट-फ्लाइट टेस्ट’ भी जरूरी है. इसके साथ ही साइकोएक्टिव पदार्थों (जैसे मारिजुआना) के लिए भी सख्त डोप टेस्ट के प्रावधान हैं.
डीजीसीए के नियमों के अनुसार, पहली बार ‘प्री-फ्लाइट पॉजिटिव’ आने पर आमतौर पर तीन महीने का लाइसेंस निलंबन, दूसरी बार तीन साल और तीसरी बार स्थायी रद्दीकरण का प्रावधान है. पोस्ट-फ्लाइट पॉजिटिव पर पहली बार भी एक साल तक निलंबन हो सकता है. गौरतलब है कि टेस्ट से इनकार को भी सकारात्मक माना जाता है. इसके बावजूद इनके आंकड़े चिंताजनक हैं. 2023 की पहली छमाही में ही 33 पायलट और 97 केबिन क्रू ड्यूटी पर नशे में पाए गए.
वहीं हाल के उदाहरण चौंकाने वाले हैं. दिसंबर 2025 में वैंकूवर एयरपोर्ट पर एयर इंडिया के एक पायलट को उड़ान से पहले हटाया गया क्योंकि ‘ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट’ में बहुत ज्यादा अल्कोहल पाया गया. नतीजतन फ्लाइट घंटों देरी से निकली. ताज़ा मामला अगस्त 2026 में एयर इंडिया की फुकेत-दिल्ली फ्लाइट में अचानक 300 फीट ऊंचाई घटने और कई यात्रियों के घायल होने के बाद पायलट-इन-कमांड का डोप टेस्ट पॉजिटिव आया, जिसमें मारिजुआना की पुष्टि हुई. इतना ही नहीं, यात्रियों ने पायलट की अजीब चाल और व्यवहार की शिकायत भी की. जिस कारण डीजीसीए ने दोनों पायलट को ड्यूटी से हटाया.
ऐसा सिर्फ़ भारत में ही नहीं होता, दुनिया भर में भी ऐसे कई मामले हैं. अमेरिका में एफएए के नियम 8 घंटे की ‘अब्स्टिनेंस’ और 0.04 प्रतिशत बीएसी लिमिट के हैं, जबकि यूरोप में ईएएसए 0.02 प्रतिशत तक अनुमति देता है. परंतु भारत का ‘जीरो टॉलरेंस’ कहीं ज्यादा कठोर है. फिर भी उल्लंघन होते हैं क्योंकि इंसान गलती करता है और कभी-कभी सिस्टम में सेंध भी लग जाती है.
ऐसे में पायलट की जिम्मेदारी सबसे बड़ी होती है. उसे खुद घोषणा करनी चाहिए कि उसने कोई नशीला पदार्थ नहीं लिया. मेडिकल सर्टिफिकेट और फिटनेस के लिए ईमानदारी जरूरी है. अगर ऐसी कोई दवा ली है, जिसमें नशीले पदार्थ होते हैं तो कंपनी डॉक्टर से सलाह अनिवार्य है, क्योंकि कई दवाएं भी ‘ब्रेथ टेस्ट पॉजिटिव’ कर सकती हैं. नशे में उड़ान भरना न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है बल्कि आपराधिक लापरवाही भी हो सकती है. नशा निर्णय लेने की क्षमता, रिएक्शन टाइम, स्पेसियल ओरिएंटेशन और आपात स्थिति संभालने की शक्ति को बुरी तरह प्रभावित करता है. थकान के साथ मिलाकर यह घातक हो जाता है. छोटी सी गलती से प्लेन क्रैश हो सकता है, सैकड़ों मौतें हो सकती हैं.
डीजीसीए जैसे नियामक की जिम्मेदारी है कि वह नियमित और सरप्राइज चेक करे, टेस्टिंग की विश्वसनीयता सुनिश्चित करे और उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई करे. नियमों को और कठोर बनाया गया है, वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की गई है, रिपोर्टिंग 24 घंटे में जरूरी है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या हमेशा सख्ती बरती जाती है? कई मामलों में पहली गलती पर तीन महीने का निलंबन और ‘रिहैबिलिटेशन’ का रास्ता खुला छोड़ दिया जाता है. वहीं कुछ निजी चार्टर सेवाओं में कैप्टन एचएस विर्दी जैसे मामलों में डीजीसीए द्वारा कथित तौर पर हल्की सजा देने की शिकायतें भी सामने आई हैं, जहां गंभीर उल्लंघन के बावजूद मामूली सजा दी गई. ऐसे कई उदाहरण हैं जो नियामक की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करते हैं. यात्री सुरक्षा में कोई समझौता नहीं होना चाहिए. अगर कोई पायलट बार-बार उल्लंघन करता है या स्पष्ट रूप से प्रभावित होकर उड़ान भरता है, तो लाइसेंस रद्द करने में देर नहीं लगनी चाहिए.
डीजीसीए ने कई मामलों में सख्ती भी दिखाई है. दिल्ली हाई कोर्ट ने भी जीरो टॉलरेंस नीति को बरकरार रखा है. लेकिन प्राइवेट चार्टर और छोटे ऑपरेटर्स पर नजर रखना चुनौती है. एयरलाइंस को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. सिर्फ नियम बनाने से काम नहीं चलेगा, लागू करने और उदाहरण पेश करने की भी जरूरत है.
नशे में पायलट कोई छोटी गलती नहीं. यह यात्री सुरक्षा के मूल पर हमला है. पायलट को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए, नियामक को कोई नरमी नहीं दिखानी चाहिए. कुछ निजी चार्टर सेवाओं के नशेड़ी पायलटों जैसे मामलों में अगर हल्की सजा दी गई तो यह गलत मिसाल है. यात्री का भरोसा तभी बनेगा जब हर उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई हो. आसमान सुरक्षित तभी रहेगा जब कॉकपिट में पूरी तरह जागरूक और नशे से मुक्त हाथ होंगे. सरकार, डीजीसीए और एयरलाइंस को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी पायलट यात्रियों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ न कर सके. सुरक्षा कोई समझौता नहीं, बल्कि पूर्ण प्रतिबद्धता है.
-भारत एक्सप्रेस
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