भारत में एक टाइम जोन होना चाहिए या नहीं
India Time Zone Debate: 19वीं सदी तक भारत में समय पूरी तरह स्थानीय था. सूर्योदय-सूर्यास्त के आधार पर हर शहर अपना समय तय करता था. मुंबई (बॉम्बे टाइम), कोलकाता (कलकत्ता टाइम) और मद्रास टाइम अलग-अलग चलते थे. रेलवे और टेलीग्राफ के विस्तार के साथ यह व्यवस्था अव्यावहारिक हो गई. ट्रेन शेड्यूल और संचार में भारी भ्रम पैदा होता था.
1905-06 में ब्रिटिश शासन ने 82.5° पूर्वी देशांतर (मिर्जापुर/इलाहाबाद के पास) को आधार बनाकर Indian Standard Time (IST = UTC+5:30) लागू करने का फैसला किया. यह पूरे देश के लिए एक समान समय था. लेकिन विरोध हुआ. मुंबई में मिल मजदूरों ने हड़ताल की क्योंकि नई घड़ी के हिसाब से काम सुबह जल्दी शुरू होता था. कोलकाता में भी प्रतिरोध रहा, जो बंगाल विभाजन के राजनीतिक माहौल से जुड़ा था.
आज CSIR-NPL (राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला) IST का रखरखाव करती है. यह परमाणु घड़ियों (सीजियम क्लॉक और हाइड्रोजन मेजर) के जरिए UTC से नैनो-सेकंड स्तर की सटीकता बनाए रखती है और देशभर में प्रसारित करती है. हाल ही में “One Nation, One Time” के तहत कानूनी नियम बनाए गए हैं, ताकि बैंकिंग, रेलवे, टेलीकॉम, पावर ग्रिड आदि आधिकारिक रूप से IST से सिंक रहें (मार्च 2027 से प्रभावी).
भारत पूर्व-पश्चिम में लगभग 29° देशांतर तक फैला है (लगभग 68°E से 97°E). इससे पूर्व और पश्चिम के बीच सूर्योदय-सूर्यास्त में लगभग 1 घंटा 56 मिनट का अंतर आता है. पूर्वोत्तर में गर्मियों में सूरज 4 बजे के आसपास निकलता है और सर्दियों में जल्दी अंधेरा हो जाता है, जबकि पश्चिम में स्थिति उलटी है. एक ही IST के कारण पूर्वोत्तर में सुबह की रोशनी का पूरा उपयोग नहीं हो पाता और शाम जल्दी अंधेरा होने से बिजली की खपत बढ़ती है.
एकल IST के पक्ष में
भारत जैसे घनी आबादी, जटिल परिवहन नेटवर्क और केंद्रीकृत प्रशासन वाले देश में एक समय व्यवस्था प्रबंधन को आसान बनाती है. चीन भी एक ही टाइम जोन रखता है (हालांकि उसका विस्तार और भी बड़ा है). हाल के “One Nation, One Time” नियम इसी दिशा में मजबूती देते हैं. राजनीतिक-रणनीतिक चिंताएं (क्षेत्रीय पहचान मजबूत होने का डर) भी महत्वपूर्ण हैं.
पूर्वोत्तर की वास्तविक समस्या नकारा नहीं जा सकता. जैविक घड़ी, उत्पादकता, ऊर्जा बचत और स्वास्थ्य (नींद, बच्चों की शिक्षा) पर असर पड़ता है. ऊर्जा संकट और नवीकरणीय ऊर्जा के युग में शाम की पीक मांग कम करना व्यावहारिक है. कई बड़े देश (अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया) बहु-जोन सफलतापूर्वक चलाते हैं. तकनीक आज रेलवे सिग्नलिंग और डिजिटल सिस्टम को बेहतर संभाल सकती है.
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IST को 30 मिनट आगे बढ़ाना (UTC+6:00) एक बार का बदलाव है. इससे पूरे देश को कुछ लाभ मिलता है, पूर्वोत्तर की स्थिति सुधरती है, और दो जोन की जटिलताएं नहीं आतीं. ऊर्जा बचत का अनुमान पुराना है; नए आंकड़ों (EV चार्जिंग, सोलर पैनल आदि को ध्यान में रखकर) से दोबारा गणना जरूरी है.
इतिहास बताता है कि एक समान समय लाना आसान नहीं था. मुंबई और कोलकाता ने सालों तक विरोध किया. आज फिर वही सवाल है: एकता और सरलता बनाम भौगोलिक-जैविक वास्तविकता और ऊर्जा दक्षता.
सरकार ने अब तक रणनीतिक कारणों से दो जोन खारिज किए हैं और एकल IST को कानूनी रूप से मजबूत कर रही है. लेकिन ऊर्जा बचत, पूर्वोत्तर की उत्पादकता और जलवायु लक्ष्यों को देखते हुए 30 मिनट आगे बढ़ाने के प्रस्ताव पर गंभीर वैज्ञानिक-आर्थिक अध्ययन और सार्वजनिक चर्चा की जरूरत है. कोई भी बदलाव बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान, रेलवे-एयरलाइंस की तैयारी और चरणबद्ध तरीके से ही संभव है. समय सिर्फ घड़ी का मामला नहीं. यह उत्पादकता, ऊर्जा, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय एकता का सवाल भी है.
-भारत एक्सप्रेस
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