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उड़ानों को तरसते नए एयरपोर्ट: करोड़ों खर्च के बाद भी खाली रनवे, कहां चूक गई UDAN योजना?

New Airports Without Flights: भारत में पिछले एक दशक में क्षेत्रीय हवाई संपर्क का नारा जितना जोर से लगाया गया, उतनी ही तेजी से छोटे शहरों में टर्मिनल बने, रिबन कटे और उद्घाटन की तस्वीरें छापी गईं. ‘उड़े देश का आम नागरिक’उड़ान योजनाका वादा था कि टियर-2 और टियर-3 शहर भी हवाई नक्शे पर आ जाएंगे. आंकड़ों में सफलता दिखती हैकि दर्जनों एयरपोर्ट चालू हुए, सैकड़ों रूट आवंटित हुए. लेकिन मैदान पर तस्वीर इससे उलट है. कई नए हवाई अड्डे और पुरानी पट्टियां आज वीरान पड़ी हैं. रनवे साफ है, सीआईएसएफ खड़ा है, बिजली जल रही है, लेकिन विमान नहीं आते. क्या यह महज ‘अस्थायी रुकावट’ है या नीतिगत असफलता का प्रमाण?

15 एयरपोर्ट पर नहीं चल रही नियमित उड़ान

संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, उड़ान के तहत विकसित करीब पंद्रह हवाई अड्डे इस समय अनुसूचित उड़ानों से रहित हैं. इनमें पठानकोट, लुधियाना, शिमला, पाकयोंग, कुशीनगर, अलीगढ़, आजमगढ़, चित्रकूट, श्रावस्ती, मुरादाबाद, भावनगर, अंबिकापुर, राउरकेला, दतिया और कलबुर्गी शामिल हैं. इस सब से उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित है. 2021 के बाद राज्य में शुरू हुए सात नए एयरपोर्ट में से छह पर नियमित व्यावसायिक उड़ानें बंद हो चुकी हैं. केवल अयोध्या ही अपवाद है. कुशीनगर बौद्ध सर्किट के लिए खोला गया, मुरादाबाद पीतल उद्योग के लिए, आजमगढ़ और चित्रकूट पर्यटन व धार्मिक यात्रा के नाम पर. लेकिन कुछ ही महीनों में यहां उड़ानें थम गईं.

करोड़ों रुपये खर्च, लेकिन यात्री सेवा नहीं

असफलता का सबसे ठोस सबूत खर्च बनाम कमाई है. सरकार इन पंद्रह गैर-संचालित केंद्रों के रखरखाव पर करीब 879 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, जबकि वहां नियमित यात्री सेवा नहीं है. पाकयोंग का निर्माण ही करीब 605 करोड़ में हुआ; रखरखाव पर अब तक लगभग 179 करोड़ चुक चुके हैं. शिमला पर रखरखाव खर्च 116 करोड़ से ऊपर बताया गया. मुरादाबाद पर करीब 30 करोड़. भावनगर का हाल और स्पष्ट है, एक रिपोर्ट के अनुसार एक वर्ष में संचालन-रखरखाव पर करीब 18 करोड़ खर्च हुए, वहीं कमाई महज 4 करोड़ ही रही. यानी लागत राजस्व से कई गुना अधिक. गौरतलब है कि जब विमान नहीं उतरते, तब भी रनवे, फायर स्टेशन, सुरक्षा, एटीसी और बिजली का खर्च तो चलता ही रहता है. एयरपोर्ट अथॉरिटी के व्यापक नुकसान का एक हिस्सा इन्हीं सुनसान हवाई अड्डों से आता है.

सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? पहला कारण मांग का गलत आकलन. हवाई अड्डा बनाने से मांग अपने आप नहीं पैदा होती. छोटे शहर में रेल और सड़क पहले से सस्ती व भरोसेमंद हैं. तीन घंटे की दूरी पर अगर ट्रेन है, तो सीमित आय वाला यात्री महंगा टिकट कभी नहीं खरीदेगा, खासकर जब सब्सिडी खत्म होने के बाद किराया दोगुना हो जाए. उड़ान में तीन साल का व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (वीजीएफ) मिलता है. अवधि खत्म होते ही कई रूट ढह जाते हैं. सीएजी की पुरानी समीक्षा पहले ही कह चुकी थी कि शुरुआती चरणों के आधे से अधिक आवंटित रूट कभी शुरू ही नहीं हुए या जल्दी बंद हो गए.

दूसरा, विमान और ऑपरेटर की कमी. क्षेत्रीय उड़ानों के लिए छोटे विमान चाहिए. फ्लाईबिग जैसे ऑपरेटर बंद हुए या उनकी सेवाएं रोक दीं गईं. विमान पट्टे, रखरखाव और पायलट की कमी ने कई रूट को अधर में छोड़ दिया. तीसरा, तकनीकी सीमा. कई छोटे हवाई अड्डे केवल विजुअल फ्लाइट रूल्स पर चलते हैं. उत्तर भारत की सर्दियों में कोहरा आते ही उड़ानें रुक जाती हैं. इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम न होने से विश्वसनीयता खत्म हो जाती है. चौथा, अंतिम छोर की कनेक्टिविटी. शहर से एयरपोर्ट तक सड़क खराब हो, टैक्सी महंगी हो, तो यात्री दोबारा नहीं आता.

इसे विफलता इसलिए कहना चाहिए क्योंकि पैसा करदाता का है और वादा विकास का था. उद्घाटन राजनीतिक पूंजी बन जाता है, लेकिन तीन साल बाद भी खाली टर्मिनल जनता का नुकसान बन जाता है. भूमि अधिग्रहण के बाद गांव वाले विकास की उम्मीद लगाते हैं, लेकिन जब उड़ान नहीं आती, तो अविश्वास बढ़ता है. क्षेत्रीय विमानन तभी सार्थक है जब वह व्यापार, पर्यटन, चिकित्सा आपात और रोजगार से जुड़कर स्थायी यातायात पैदा करे. महज रनवे बिछाना बुनियादी ढांचे का भ्रम है, अर्थव्यवस्था नहीं.

भारत को ज्यादा नहीं, ज्यादा उपयोगी एयरपोर्ट चाहिए

ऐसे में सरकार को क्या करना चाहिए? सबसे पहले, नए हवाई अड्डे खोलने से पहले कठोर अध्ययन अनिवार्य हो. यात्री क्षमता, आसपास के उद्योग, तीर्थ-पर्यटन चक्र और वैकल्पिक परिवहन की तुलना के बिना निर्माण न हो. संशोधित उड़ान में यही सबक शामिल होना चाहिए. दूसरा, सब्सिडी की अवधि तीन से बढ़ाकर पांच-सात वर्ष की जा सकती है, लेकिन भार कारक और स्थानीय राजस्व लक्ष्य पूरे होने पर ही. तीसरा, छोटे हवाई अड्डों को केवल यात्री पर निर्भर न रखा जाए. कार्गो, पायलट प्रशिक्षण, चार्टर, मेडिकल फ्लाइट और राज्य सरकार की आधिकारिक यात्राओं से न्यूनतम उपयोग सुनिश्चित हो. चौथा, मौसम-संवेदनशील अड्डों पर आईएलएस और बेहतर नेविगेशन लगाया जाए, वरना सर्दी या ख़राब मौसम में पूरा नेटवर्क ठप रहेगा.

पांचवां, राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बढ़ाई जाए. भूमि, सड़क, पर्यटन पैकेज और स्थानीय कर रियायत राज्य दें, केंद्र केवल विमानन ढांचा. छठा, किराया नीति लचीली हो. सब्सिडी खत्म होते ही अचानक महंगा टिकट हवाई यात्रा की मांग को मार देता है. चरणबद्ध वृद्धि और ऑफ-पीक छूट से हवाई यात्रा आदत बन सकती है. सातवां, असफल रूट को बिना शर्म के बंद करने और सफल मॉडल, जैसे बेहतर कनेक्टिविटी वाले कुछ औद्योगिक या तीर्थ केंद्रको दोहराने का साहस हो. हर जिले में एयरपोर्ट का नारा राजनीतिक रूप से आकर्षक है, परंतु आर्थिक रूप से घातक.

भारत को अधिक हवाई अड्डों की नहीं, काम करने वाले हवाई अड्डों की जरूरत है. खाली रनवे पर खर्च होते रहना विकास नहीं, बर्बादी है. उड़ान का मकसद आम नागरिक को आसमान देना था, कंक्रीट के स्मारक खड़े करना नहीं. जब रखरखाव का बिल कमाई से बड़ा हो जाए, तब नीति को गर्व नहीं, सुधार चाहिए. सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए, यदि यही हाल रहा तो अगले दस साल में और सौ हवाई अड्डे बनेंगेऔर उनमें से कई फिर वीरान रहेंगे.

-भारत एक्सप्रेस

रजनीश कपूर, वरिष्ठ पत्रकार

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