सुचेता दलाल और देबाशीष बासु की 2026 में प्रकाशित किताब पाथब्रेकर्स: हाउ 10 विजनरी लीडर्स ट्रांसफॉर्म्ड इंडिया आधुनिक भारत के कुछ सबसे प्रभावशाली नेताओं की निजी यात्राओं को करीब से देखने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है. रूपा पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित यह किताब सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं है, बल्कि उन असाधारण व्यक्तियों की कहानी है जिन्होंने असफलताओं और चुनौतियों के बावजूद अपनी दृष्टि नहीं खोई.
लगभग दो दशक पहले लेखकों ने इनमें से कई साक्षात्कार किए थे. 2026 का यह नया संस्करण बदलते भारत के संदर्भ में उन बातचीतों को फिर से जीवंत करता है. किताब में मुकेश अंबानी, के.वी. कामथ, दीपक पारेख, उदय कोटक, संजीव बिखचंदानी, सतीश मगर और राजकुमार हिरानी के नए साक्षात्कार शामिल हैं. साथ ही रतन टाटा, अमिताभ बच्चन और आर.एच. पाटिल जैसे दिग्गजों के पुराने लेकिन आज भी प्रासंगिक साक्षात्कार भी दोबारा प्रस्तुत किए गए हैं.
किताब की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह इन नेताओं को सिर्फ हेडलाइंस, मार्केट कैप या सार्वजनिक छवि के जरिए नहीं देखती. हर अध्याय में व्यक्ति का परिचय देने के बाद लंबी और खुलकर की गई बातचीत के अंश दिए गए हैं. पाठक इनके बचपन, परिवार, शुरुआती संदेहों, महत्वपूर्ण फैसलों, जोखिम उठाने की हिम्मत और असफलताओं से निपटने के तरीकों के बारे में जान पाते हैं.
किताब में बार-बार उभरने वाले विषय हैं- स्पष्ट उद्देश्य, गणना करके जोखिम उठाने की क्षमता, संकट में लचीलापन और अल्पकालिक सफलता की जगह टिकाऊ संस्थान बनाने की प्रतिबद्धता. लेखकों के अनुसार सच्चा ‘पाथब्रेकर’ वही होता है जो आसान और आम रास्ता छोड़कर अलग रास्ता चुनता है और इतनी देर तक उस पर अडिग रहता है कि बाद में वह रास्ता स्वाभाविक लगने लगता है.
सुचेता दलाल (पद्मश्री) और देबाशीष बासु की पत्रकारिता की गहराई किताब में साफ झलकती है. 1992 के हर्षद मेहता घोटाले को उजागर करने वाले इस जोड़ी ने इन नेताओं से बेहद खुलकर बातचीत की है. मुकेश अंबानी रिलायंस के उत्तराधिकार पर, उदय कोटक आरबीआई को अदालत में चुनौती देने पर, आर.एच. पाटिल नेशनल स्टॉक एक्सचेंज बनाने पर, संजीव बिखचंदानी नौकरी डॉट कॉम बनाने पर और राजकुमार हिरानी कहानी कहने की कला पर खुलकर बोलते हैं.
यह किताब सफलता का कोई फॉर्मूला नहीं बताती. बल्कि यह चरित्र, लचीलेपन और नेतृत्व की एक मास्टरक्लास है. लगभग 300 पन्नों की यह किताब ₹695 में उपलब्ध है. व्यापार, बैंकिंग, उद्यमिता, सिनेमा या आधुनिक भारत के निर्माण में रुचि रखने वाले किसी भी पाठक के लिए यह एक मूल्यवान दस्तावेज है.
पाथब्रेकर्स हमें याद दिलाती है कि महान संस्थान और बड़े बदलाव सिर्फ सफलता की चमक से नहीं, बल्कि निजी विश्वास, दृढ़ता और असफलताओं से सीखने की क्षमता से बनते हैं.
सुचेता दलाल और देबाशीष बासु की किताब ‘पाथब्रेकर्स’ सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं है. इसमें 10 नेताओं की व्यक्तिगत यात्राएं हैं, जिनमें असफलताएं, जोखिम, परिवार का प्रभाव और दूरदृष्टि साफ दिखती है. कुछ प्रमुख कहानियां इस प्रकार हैं:
मुकेश अंबानी का साक्षात्कार किताब के सबसे रोचक हिस्सों में से एक है. भाई-बंटवारे के ठीक बाद जब लेखकों ने पहली बार उनसे बात की थी, तब रिलायंस की कुल मार्केट वैल्यू लगभग 1.5-2 लाख करोड़ रुपये थी. आज उनका साम्राज्य करीब 19-20 लाख करोड़ रुपये का है.
अंबानी बताते हैं कि उनके पिता धीरूभाई बच्चों के साथ समय बिताने को बहुत महत्व देते थे और पढ़ाई के अलावा अन्य रुचियों को बढ़ावा देते थे. मुकेश अंबानी उत्तराधिकार को परिवार का नाटक नहीं, बल्कि एक ‘इंजीनियरिंग समस्या’ मानते हैं- ऐसा संस्थान कैसे बनाया जाए जो संस्थापक के बाद भी चले. उनकी सोच में निरंतरता साफ दिखती है: अगली जरूरी सुविधा को भारतीय कीमत पर उपलब्ध कराना.
उदय कोटक कहते हैं, ‘मैं लगातार खुद से पूछता हूं कि इतिहास का बोझ क्या है और इतिहास के सबक क्या हैं.’ 1980 के दशक के अंत में जब एनबीएफसी कंपनियां तेजी से खुल रही थीं, कोटक महिंद्रा फाइनेंस भी उनमें से एक थी. बाद में जब ज्यादातर कंपनियां बंद हो गईं, कोटक ने सतर्कता बरती और बच गए.
उन्होंने गोल्डमैन सैक्स जैसी बड़ी कंपनी को सिर्फ 25 प्रतिशत हिस्सेदारी पर जॉइंट वेंचर में लाया. किताब में वे आरबीआई को अदालत में चुनौती देने का भी जिक्र करते हैं. उनकी कहानी जोखिम लेने और सही समय पर संयम बरतने की मिसाल है.
संजीव बिखचंदानी खुद को ‘सबसे ज्यादा जोखिम से बचने वाला व्यक्ति’ बताते हैं. फिर भी उन्होंने नौकरी.कॉम जैसी कंपनी बनाई. उनका तरीका था-हर मौके पर जोखिम कम करते जाना. यह बात बताती है कि उद्यमिता हमेशा बेतहाशा जोखिम लेने से नहीं, बल्कि सोच-समझकर आगे बढ़ने से भी बनती है.
आर.एच. पाटिल ने हर्षद मेहता घोटाले के बाद जब बाजार पर से विश्वास उठ गया था, तब इलेक्ट्रॉनिक नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) बनाने का जोखिम उठाया. पुरानी ब्रोकर-चालित व्यवस्था को बदलना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने संस्थान बनाने पर जोर दिया. उनकी कहानी दिखाती है कि संकट के समय भी बड़े बदलाव संभव हैं.
सतीश मगर ने टाउनशिप बनाते समय किसानों को विरोधी नहीं, बल्कि साझेदार बनाया. यह सामाजिक बदलाव का उदाहरण है, जहां विकास को समावेशी तरीके से आगे बढ़ाया गया.
फिल्मकार राजकुमार हिरानी की कहानी सिनेमा की दुनिया से है. उन्होंने ऐसी फिल्में बनाईं जो दर्शकों को बुद्धिमान मानती हैं. किताब में वे एआई के दौर में कहानी कहने की कला कैसे बदल रही है, इस पर भी बात करते हैं.
रतन टाटा की यात्रा सीधी नहीं थी. लंबे समय तक उन्हें समूह के अंदर अपनी बात मनवाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. अमिताभ बच्चन की करियर यात्रा भी उतार-चढ़ाव भरी रही- फिल्मों से लेकर टेलीविजन तक. दोनों की कहानियां दिखाती हैं कि असफलता के बाद फिर से खड़ा होना कितना महत्वपूर्ण है.
ये कहानियां एक बात साफ करती हैं- सच्चा पाथब्रेकर वही है जो आसान रास्ता छोड़कर अलग राह चुनता है और उस पर लंबे समय तक अडिग रहता है. किताब इन नेताओं को सिर्फ सफल व्यक्ति नहीं, बल्कि संघर्ष करने वाले इंसान के रूप में पेश करती है. यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.
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-भारत एक्सप्रेस
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