एड. लोकेश मंगल: मानव सभ्यता के इतिहास को अगर करीब से देखें, तो एक बात साफ हो जाती है कि जिस देश ने ऊर्जा के स्रोतों पर अपनी पकड़ मजबूत की, उसी ने भविष्य की दिशा तय की है. आदिम युग से लेकर आज के इस डिजिटल दौर तक, ऊर्जा ही वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द विकास का पहिया घूमता है. आज दुनिया भर में इस बात पर बहस छिड़ी है कि ऊर्जा का उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए और इसका संरक्षण कैसे हो. भारत के संदर्भ में देखें तो केंद्र सरकार इस दिशा में काफी सक्रिय नजर आ रही है.
सरकार की इसी दूरगामी सोच का नतीजा है- “भारत के रूपांतरण हेतु परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और संवर्धन विधेयक, 2025”, जिसे आम बोलचाल में ‘शांति विधेयक’ भी कहा जा रहा है. ये विधेयक न केवल ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम है, बल्कि ये भारत के औद्योगिक इतिहास में एक नए युग की शुरुआत भी है.
भारत की आजादी के बाद से अब तक परमाणु ऊर्जा का क्षेत्र पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में रहा है. सुरक्षा और संवेदनशीलता के कारण निजी कंपनियों को इससे दूर ही रखा गया था. लेकिन अब 2025 का ये नया विधेयक इस पुरानी परंपरा को तोड़ रहा है. पहली बार निजी क्षेत्र के बड़े खिलाड़ियों को परमाणु ऊर्जा के उत्पादन और इसके सतत संवर्धन में हिस्सा लेने का मौका दिया गया है.
बाजार के दिग्गज इस बदलाव को बड़ी उम्मीदों के साथ देख रहे हैं. सरकार ने दिसंबर 2025 तक इसे पूरी तरह लागू करने का लक्ष्य रखा है. दिलचस्प बात ये है कि इस विधेयक को ‘शांति विधेयक’ का नाम देकर भारत ने दुनिया को ये संदेश भी दिया है कि हमारा परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों और ऊर्जा सुरक्षा के लिए समर्पित है.
इस ऐतिहासिक कानून को एक यादगार और सम्मानजनक स्वरूप देने के लिए मध्य प्रदेश के इंदौर में एक अनोखी पहल की गई. पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती के मौके पर इस पूरे ‘शांति विधेयक 2025’ को पीतल के पन्नों पर हूबहू छापा गया है.
इसे तैयार करने वाली टीम का कहना है कि स्व. अटल जी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में बड़े फैसले लेने के लिए जाने जाते थे, और ये विधेयक भी उसी श्रेणी का एक बड़ा कदम है. इस पीतल के दस्तावेज को तैयार करने में 28 लोगों की टीम ने दिन-रात मेहनत की और लेजर तकनीक की मदद से इसे 83 पन्नों पर उकेरा गया.
ये विधेयक कानूनी रूप से भी अपनी प्रक्रिया पूरी कर चुका है. 17 दिसंबर 2025 को इसे लोकसभा और अगले ही दिन 18 दिसंबर को राज्यसभा द्वारा पारित किया गया. राष्ट्रपति की अनुमति मिलने के बाद अब ये एक मजबूत कानून बन चुका है. इसकी महत्ता को देखते हुए ही इसे पीतल पर स्थाई रूप से उकेरकर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विरासत के तौर पर पेश किया गया है.
अगर हम इस 83 पृष्ठों के विस्तृत विधेयक की आंतरिक संरचना पर नजर डालें, तो इसे कई महत्वपूर्ण अध्यायों और खंडों में विभाजित किया गया है. शुरुआत में इस कानून के नाम और इसकी परिभाषाओं को स्पष्ट किया गया है, ताकि भविष्य में किसी भी तरह की कानूनी पेचीदगी से बचा जा सके. सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा लाइसेंसिंग प्रक्रिया और सुरक्षा प्राधिकरण से जुड़ा है.
अध्याय II में स्पष्ट किया गया है कि परमाणु ऊर्जा के उत्पादन या उपयोग के लिए लाइसेंस कैसे दिए जाएंगे और रेडियोधर्मी पदार्थों के खनन से लेकर उनके प्रसंस्करण (processing) तक के नियम क्या होंगे. सरकार ने ये भी सुनिश्चित किया है कि अनुसंधान और नवाचार से जुड़ी गतिविधियों को लाइसेंस की कठोर शर्तों से थोड़ी छूट दी जाए ताकि वैज्ञानिक शोध बिना किसी बाधा के चलते रहें.
अध्याय III और IV इस कानून की रीढ़ की हड्डी की तरह हैं. इसमें ऑपरेटरों के कर्तव्यों और उनके दायित्वों को विस्तार से समझाया गया है. अगर कोई परमाणु घटना होती है, तो उसका उत्तरदायित्व किस पर होगा और मुआवजे की सीमाएं क्या होंगी, ये सब कुछ इस कानून में पहले ही तय कर दिया गया है.
इसके अलावा, एक शक्तिशाली ‘परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड’ के गठन का प्रावधान भी है, जो पूरी प्रक्रिया पर नजर रखेगा. बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति, उनके अधिकार और रणनीतिक प्रकृति की गतिविधियों का विनियमन कैसे होगा, इसे लेकर सरकार ने बहुत पारदर्शी व्यवस्था बनाई है.
परमाणु ऊर्जा जैसे संवेदनशील विषय में सुरक्षा सबसे ऊपर है. इसीलिए अध्याय V और VI में सरकार को विशेष शक्तियां दी गई हैं. जांच एजेंसियों के पास किसी भी प्रतिष्ठान में प्रवेश करने, निरीक्षण करने और जरूरत पड़ने पर तलाशी व जब्ती के अधिकार होंगे. इसके अलावा, सरकार को ये भी अधिकार होगा कि वह विशेष परिस्थितियों में अनुबंधों का नवीनीकरण कर सके या कुछ सामग्रियों की मांग कर सके. बिजली उत्पादन और आविष्कारों के संबंध में भी विशेष प्रावधान किए गए हैं ताकि देश के वैज्ञानिकों द्वारा की गई खोज सुरक्षित रहे.
विवादों को सुलझाने के लिए ‘परमाणु ऊर्जा निवारण सलाहकार परिषद’ और ‘अपीलीय न्यायाधिकरण’ की स्थापना की बात भी इस विधेयक में कही गई है. यदि किसी पक्ष को नियामक बोर्ड के फैसले से आपत्ति है, तो वह इन निकायों में अपील कर सकता है. यहां तक कि अंतिम विकल्प के रूप में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का प्रावधान भी रखा गया है, जो इस कानून की लोकतांत्रिक गरिमा को बढ़ाता है.
किसी भी संभावित दुर्घटना की स्थिति में प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने के लिए ‘परमाणु क्षति दावा आयोग’ की स्थापना की व्यवस्था अध्याय VIII में की गई है. येाँ मुआवजे के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया और न्यायनिर्णयन की पूरी प्रणाली को सरल और स्पष्ट रखा गया है. इसके साथ ही, नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए अध्याय IX में कठोर दंड और सजा का जिक्र है. चाहे वह कोई निजी कंपनी हो या सरकारी विभाग, कानून की नजर में सबकी जवाबदेही तय की गई है.
अंत में, विविध खंडों के माध्यम से ये सुनिश्चित किया गया है कि ये अधिनियम अन्य पुराने कानूनों पर अधिभावी प्रभाव रखेगा और सरकार को आने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए नियम बनाने की पूरी शक्ति देगा. कुल मिलाकर, ‘शांति विधेयक 2025’ भारत के विकास की कहानी में एक नया और चमकदार अध्याय जोड़ने के लिए तैयार है.
-भारत एक्सप्रेस
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