वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए एक स्वर्णिम अध्याय रचेगा, क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए प्रथम आक्रमण के ठीक 1,000 वर्ष पूरे हो रहे हैं. जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस पवित्र स्थल पर क्रूर आक्रमण किया, मंदिर को ध्वस्त कर दिया. यह आक्रमण मात्र एक सैन्य घटना नहीं था, बल्कि आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने का बर्बर प्रयास था. मध्यकालीन बर्बरता की यह शुरुआत आगे चलकर अन्य आक्रमणकारियों को भी प्रेरित करती रही, लेकिन हमारी सभ्यता की लचीलापन ने हर बार हार नहीं मानी. पीढ़ी-दर-पीढ़ी, सोमनाथ को खंडहरों से उठाकर पुनर्जीवित किया गया.
सन् 1026 में महमूद ग़ज़नवी का सोमनाथ पर आक्रमण भारतीय इतिहास का एक काला पृष्ठ है. गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित यह ज्योतिर्लिंग मंदिर, शिव की अनंत शक्ति का प्रतीक था. महमूद की सेना ने न केवल मंदिर की संपदा लूटी, बल्कि इसे पूर्णतः ध्वस्त करने का प्रयास किया. यह आक्रमण धार्मिक अतिवाद और लूट का मिश्रण था, जिसने हिंदू आस्था को गहरा आघात पहुंचाया. इस घटना ने मध्यकालीन भारत पर लंबे समय तक छाया डाली, और बाद में अलाउद्दीन खिलजी, मुजफ्फर शाह जैसे अन्य आक्रमणकारी भी सोमनाथ को निशाना बनाते रहे. लेकिन हर विनाश के बाद, भारतीयों की अटूट इच्छाशक्ति ने मंदिर को पुनः खड़ा किया. यह सिलसिला सैकड़ों वर्षों तक चला, जहां हर बार खंडहरों से एक नया सोमनाथ उभरा—सशक्त, जीवंत और अटल.
सन् 1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद की सोमनाथ यात्रा इस गाथा का एक भावुक मोड़ है. इस यात्रा ने उन्हें भीतर तक आंदोलित कर दिया. सन् 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान में उन्होंने सोमनाथ की अमरता पर गहन चिंतन व्यक्त किया:
“दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे. ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे. इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है. ये बार-बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए. पहले की तरह सशक्त. पहले की तरह जीवंत. यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन-धारा है. इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु. इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा.”
विवेकानंद का यह संदेश सोमनाथ को मात्र एक भौतिक संरचना से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना देता है. उन्होंने सिखाया कि हमारी सभ्यता की शक्ति उसके पुनरुत्थान में निहित है, न कि विनाश में.
आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया. 1947 में दीवाली के पावन अवसर पर उनकी सोमनाथ यात्रा एक ऐतिहासिक क्षण था. मंदिर के खंडहरों को देखकर पटेल भीतर तक झकझोर उठे और तत्काल घोषणा की: “यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा.” उनके नेतृत्व में चंदा इकट्ठा किया गया, और 11 मई 1951 को सोमनाथ का भव्य मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खुल गया. दुर्भाग्य से, सरदार पटेल इस विजयी दिन को जीवित देखने के लिए उपस्थित न थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार हो चुका था.
इस समारोह में एक दिलचस्प राजनीतिक द्वंद्व भी उभरा. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन से उत्साहित न थे. वे चिंतित थे कि यह घटना भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को प्रभावित करेगी, और राष्ट्रपति तथा मंत्रियों को इसमें भाग लेने से रोका. लेकिन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद अडिग रहे. उन्होंने समारोह में भाग लिया, और इस निर्णय ने न केवल सोमनाथ को पुनर्जीवित किया, बल्कि भारतीय एकता का एक नया प्रतीक रचा. यह घटना इतिहास की किताबों में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है.
सोमनाथ का कोई भी उल्लेख के. एम. मुंशी के योगदानों को बिना याद किए अधूरा है. वे सरदार पटेल के कट्टर समर्थक थे और पुनर्निर्माण अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई. उनकी प्रसिद्ध पुस्तक सोमनाथ: द श्राइन इटरनल इस मंदिर की शाश्वतता का जीवंत दस्तावेज है. शीर्षक स्वयं सब कुछ कह जाता है—हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है. मुंशी ने लिखा कि सोमनाथ का भौतिक ढांचा भले नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर बनी रही. कठोपनिषद का यह श्लोक उनकी भावना को प्रतिबिंबित करता है:
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
(न शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है, न जल भिगो सकता है, न वायु सुखा सकती है.)
मुंशी का कार्य सोमनाथ को सांस्कृतिक पुनरुत्थान का माध्यम बनाता है, जो आज भी प्रासंगिक है.
सोमनाथ की गाथा विनाश की नहीं, अपितु पुनरुत्थान की है. 1000 वर्षों में सैकड़ों आक्रमण झेले, लेकिन हर बार यह मंदिर खड़ा हुआ—एक नई आशा, एक नई शक्ति के साथ. 2026 में इस शताब्दी पूर्ति का उत्सव हमें विवेकानंद, पटेल और मुंशी जैसे महानात्माओं की सीख याद दिलाएगा: हमारी सभ्यता की धारा अटल है. यह वर्ष हमें प्रेरित करेगा कि आस्था की ज्योति कभी बुझने न पाए. सोमनाथ न केवल एक मंदिर है, बल्कि राष्ट्रीय जीवन-धारा का प्रतीक है—अमर, अटूट और अनंत.
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-भारत एक्सप्रेस
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