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भारत में सहकारी और वित्तीय संघवाद का नया युग, पिछले 11 वर्षों में मोदी सरकार में ऐसे हुआ सामाजिक-आर्थिक विकास

पिछले 11 वर्षों में भारत ने सहकारी और वित्तीय संघवाद का एक नया युग देखा है. केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर देश के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए काम कर रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाए गए ‘टीम इंडिया’ के विचार ने इस सहयोग को मजबूती दी है. इस दौरान कई बड़े संस्थागत और प्रक्रियात्मक सुधार हुए हैं, जिनका असर हर स्तर पर दिखाई दिया. सबसे बड़ी उपलब्धि 25 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकालना है.

2015 में योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग किया गया. यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण था. योजना आयोग में केंद्र से राज्यों तक एकतरफा नीति प्रवाह होता था, जबकि नीति आयोग ने केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगी भागीदारी को बढ़ावा दिया. पहले जहां ज्ञान केंद्रित था, वहीं अब नीति आयोग डिजिटल और भौतिक दुनिया के बीच की दूरी कम करने का काम करता है. यह राज्यों को अपने विकास की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित करता है और केंद्र-राज्य के बीच पुल का काम करता है.

नीति आयोग की भूमिका और केंद्र-राज्य संवाद

नीति आयोग की वार्षिक गवर्निंग काउंसिल बैठक केंद्र और राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व के लिए राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा का प्रमुख मंच है. वहीं, मुख्य सचिव सम्मेलन देश के वरिष्ठ अधिकारी अपनी चुनौतियों पर चर्चा करते हैं और सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं को साझा करते हैं. नीति आयोग के बनाए गए सूचकांक राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देते हैं. इसके तहत आश्रित जिलों और ब्लॉकों का विकास हुआ है. लगभग 350 जिलों और 500 ब्लॉकों की हालत सुधरी है, जो पिछड़े इलाकों को राज्य के औसत स्तर तक लाने में मददगार साबित हुए हैं.

राज्यों के विकास की कुंजी संसाधनों की उपलब्धता है. इस दिशा में एक बड़ा कदम था राज्यों को कर राजस्व के हिस्से में 32% से बढ़ाकर 42% करने का फैसला. यह 14वीं वित्त आयोग की सिफारिश पर केंद्र ने किया. इससे राज्यों को अपने विकास के लिए अधिक स्वतंत्रता मिली. वित्त आयोग की नीतियां समय-समय पर बदलती रही हैं, जिससे राज्यों को वित्तीय स्वायत्तता और असमानता को कम करने में मदद मिली है. उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्यों को वित्त आयोग के तहत अधिक संसाधन मिले हैं. 2014-15 से 2024-25 के बीच केंद्र करों में राज्यों का हिस्सा लगभग 3.37 लाख करोड़ से बढ़कर 12.23 लाख करोड़ रुपये हो गया है.

जीएसटी परिषद और वित्तीय संघवाद की मजबूती

जीएसटी परिषद ने भी वित्तीय संघवाद को मजबूत किया है. यहां केंद्र और राज्यों के बीच सहमति से निर्णय लिए जाते हैं. जीएसटी से मिलने वाली कुल आय का लगभग 71% हिस्सा राज्यों को मिलता है, जबकि केंद्र का हिस्सा 29% है. 2017-18 से 2024-25 तक केंद्र ने जीएसटी मुआवजे के तौर पर राज्यों को लगभग 6.52 लाख करोड़ रुपये दिए हैं.

पिछले दशक में केंद्र ने राज्यों को ज्यादा संसाधन दिए हैं. 2015-16 से पहले के दशक में राज्यों को जीडीपी के अनुपात में कुल धन हस्तांतरण 5.2% था, जो अब बढ़कर 6.5% हो गया है. इस दौरान केंद्र से मिलने वाली अनुदान राशि 234% बढ़ी है और कर्ज़ 992% तक पहुंच गया है. वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में राज्यों को पूंजीगत व्यय के लिए 50 साल के ब्याज मुक्त कर्ज के तौर पर 1.5 लाख करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में केंद्र से मिलने वाले कर और अनुदान की हिस्सेदारी पिछले दशक की तुलना में बढ़ी है.

केंद्र-प्रायोजित योजनाओं का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

संविधान में विषयों को केंद्र, राज्य और समवर्ती सूची में बांटा गया है, जिससे सरकार के विभिन्न स्तरों की जिम्मेदारियां स्पष्ट होती हैं. फिर भी, केंद्र राज्य सूची और समवर्ती सूची में आने वाले विषयों पर केंद्र-सरकारी योजनाओं के माध्यम से योगदान करता रहता है. 2015-16 से 2023-24 के बीच केंद्र और केंद्र-प्रायोजित योजनाओं की वित्तीय सहायता में 197% की वृद्धि हुई है. इनमें से कई योजनाओं का आम जनता की जिंदगी पर गहरा असर पड़ा है.

जल जीवन मिशन के तहत 2019-20 से 2025-26 तक संसाधन आवंटन में 570% की बढ़ोतरी हुई है, जिससे 15.44 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल का पानी मिला है. प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के बजट में 2018-19 से 2025-26 तक 292% की वृद्धि हुई है, जिससे लोगों की जेब से स्वास्थ्य खर्च कम हुआ है. प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के लिए 2020 से 2025 तक लगभग 181% अधिक राशि दी गई है, और अब तक 2.67 करोड़ घर बनाए जा चुके हैं. ये योजनाएं यह दर्शाती हैं कि केंद्र और राज्य मिलकर कैसे आम जनता के जीवन में बदलाव ला रहे हैं.

संविधान में “संघवाद” शब्द कहीं सीधे तौर पर नहीं लिखा गया है, फिर भी यह हमारे लिए मार्गदर्शक सिद्धांत रहा है. डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि हमारा संविधान समय और परिस्थिति के अनुसार संघीय और एकात्मक दोनों हो सकता है. बीते दशक ने सहकारी, प्रतिस्पर्धात्मक और वित्तीय संघवाद की ताकत को साबित किया है और इसके सकारात्मक परिणाम पूरे देश के 140 करोड़ नागरिकों के जीवन में देखे जा सकते हैं.

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-भारत एक्सप्रेस 

 

निहारिका गुप्ता

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