India Energy Efficiency: भारत की ऊर्जा दक्षता, जो किसी कार्य को पूरा करने के लिए उपयोग की जाने वाली ऊर्जा की मात्रा को दर्शाती है, 2000 और 2023 के बीच 1.9 प्रतिशत बढ़ी है. यह वृद्धि वैश्विक औसत 1.4 प्रतिशत से तेज है, जैसा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में उल्लेख किया गया है.
भारत की ऊर्जा दक्षता में सुधार, हालांकि विकासशील देशों के लिए एक सकारात्मक संकेत है, यह विकसित देशों के मुकाबले कुछ कम रही है. अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों ने इस अवधि में 2 प्रतिशत से अधिक की ऊर्जा दक्षता वृद्धि दर्ज की. हालांकि, भारत अपने BRICS देशों के मुकाबले काफी आगे है, क्योंकि इन देशों की ऊर्जा दक्षता वृद्धि केवल 1.62 प्रतिशत रही.
अध्यान के अनुसार, भारत ने 2012 से 2022 के बीच कुल 706 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन जोड़ा. इसका मुख्य कारण आर्थिक विकास है, जिसने 1000 मिलियन टन से अधिक कार्बन उत्सर्जन का कारण बना. हालांकि, बढ़ती ऊर्जा दक्षता ने इस प्रक्रिया से 399 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद की.
रिजर्व बैंक के शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि आने वाले समय में उत्सर्जन कारक प्रभाव (Emission Factor Effect) और भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा धीरे-धीरे जीवाश्म ईंधनों को प्रतिस्थापित कर रही है और हरा हाइड्रोजन (Green Hydrogen) का उपयोग उद्योगों में बढ़ रहा है, इस कारण भारत के उत्सर्जन में और कमी आने की उम्मीद है.
हालांकि भारत ने उत्सर्जन को विकास से अलग करने में कुछ सफलता प्राप्त की है, लेकिन शुद्ध शून्य (Net Zero) लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और अधिक बदलाव की आवश्यकता होगी. रिजर्व बैंक के शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि भारत को नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए.
भारत में सौर और पवन ऊर्जा की लागत अब नए कोयला बिजली संयंत्रों की लागत से कम हो चुकी है, जिससे पहले की यह चिंता दूर हो गई है कि नवीकरणीय ऊर्जा महंगी है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सौर और पवन ऊर्जा में महत्वपूर्ण क्षमता वृद्धि हुई है, फिर भी ये 2022-23 में केवल 2.1 प्रतिशत प्राथमिक ऊर्जा का हिस्सा बने.
-भारत एक्सप्रेस
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