Iran Israel War Oil Prices: अमेरिका और इजरायल ने ईरान के 30 शहरों पर हमला किया है, जिसके जवाब में ईरान ने भी ‘फतह-ए-खैबर’ ऑपरेशन शुरू कर दिया है. इजरायल से लेकर कतर, बहरीन और UAE तक पूरे मिडल ईस्ट में धुआं-धुंआ हो रखा है. इस युद्ध से दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई करने वाले होर्मुज मार्ग पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है. बता दें कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो कच्चे तेल के दाम 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल बेतहाशा महंगे हो जाएंगे.
इजरायल ने ईरान की राजधानी तेहरान सहित उसके तीस बड़े शहरों पर भीषण बमबारी की है. इस अप्रत्याशित सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है. ईरान ने पीछे न हटते हुए ‘फतह-ए-खैबर’ नाम से एक जवाबी सैन्य अभियान की शुरुआत कर दी है. ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इजरायल के साथ-साथ अमेरिकी सहयोगी देशों को भी निशाना बनाएगा. बहरीन और कतर में अमेरिकी सैन्य अड्डों पर भी हमले की खबरें हैं.
ईरान हर दिन करीब 33 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करता है, जो पूरी दुनिया की कुल सप्लाई का लगभग तीन प्रतिशत है. लेकिन असली चिंता का विषय उत्पादन नहीं, बल्कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला यातायात है. दुनिया भर के कुल तेल व्यापार का बीस फीसदी हिस्सा इसी बेहद अहम समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है.
आंकड़ों के अनुसार, हर रोज लगभग दो करोड़ बैरल कच्चा तेल और रिफाइंड उत्पाद इसी रास्ते से पूरी दुनिया के बाजारों में पहुंचते हैं. वैश्विक तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी का बीस प्रतिशत व्यापार भी पूरी तरह होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर है.
बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर हालात ऐसे ही बिगड़ते रहे तो सबसे खराब स्थिति में कच्चे तेल के दाम 110 डॉलर प्रति बैरल तक उछल सकते हैं. यह मौजूदा कीमतों के मुकाबले 57 प्रतिशत की एक बहुत बड़ी और भयानक बढ़ोतरी होगी. शुक्रवार को ही कच्चे तेल ने 72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू लिया था और अभी ब्रेंट क्रूड 72.87 डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा था.
बाजार में इस समय सामान्य मांग और आपूर्ति के अर्थशास्त्र के बजाय युद्ध की दहशत का माहौल हावी है. इक्विरस सिक्योरिटीज के विशेषज्ञ मौलिक पटेल और खुशबू बालानी के विश्लेषण के अनुसार, तनाव से होर्मुज स्ट्रेट पर सीधा खतरा पैदा हो रहा है. थोड़ा सा भी गतिरोध या व्यवधान तेल की कीमतों में 20 से 40 डॉलर प्रति बैरल का भारी भरकम ‘फियर प्रीमियम’ जोड़ सकता है.
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फारस की खाड़ी के तेल उत्पादक देशों के सामने एक बड़ी भौगोलिक मजबूरी है. राबोबैंक इंटरनैशनल के अनुसार, इन देशों के पास पाइपलाइन नेटवर्क की क्षमता काफी सीमित है. इसका सीधा अर्थ यह है कि वे अपने तेल निर्यात के लिए इस अहम जलडमरूमध्य को नजरअंदाज करके कोई दूसरा रास्ता नहीं अपना सकते. यह समुद्री रास्ता बंदर अब्बास जैसे प्रमुख और बड़े ईरानी बंदरगाह के बिल्कुल करीब स्थित है. ईरान के पास इस पूरे समुद्री इलाके में छोटी नावों, तेज रफ्तार वाले हमलावर यानों और समुद्री माइंस का एक बहुत बड़ा बेड़ा मौजूद है. अगर इन हथियारों का इस्तेमाल होता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह बाधित होगी.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है. वहीं होर्मुज स्ट्रेट पर कोई भी व्यवधान भारत के लिए भी बहुत महंगा साबित हो सकता है. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा चला तो भारत में महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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