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वैश्विक ऊर्जा बाजार से भारत के लिए एक बेहद चिंताजनक और तनाव बढ़ाने वाली खबर सामने आ रही है. अभी बीते दिनों ही जब खबरें आई थीं कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा भीषण युद्ध समाप्त होने जा रहा है और दोनों देशों के बीच शांति वार्ता से होर्मुज मार्ग खुलने वाला है, तो दुनिया भर में खुशी का माहौल था. लेकिन यह राहत ज्यादा दिनों तक टिकती नहीं दिख रही है.
ताजा मीडिया रिपोर्ट्स और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के दावों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच शांति वार्ता पूरी तरह परवान नहीं चढ़ पाई है और ईरान एक बार फिर बुरी तरह नाराज हो गया है. आशंका जताई जा रही है कि ईरान रणनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को दोबारा पूरी तरह ब्लॉक कर सकता है, जिससे दुनिया भर में तेल-गैस की भयंकर किल्लत और महंगाई का नया दौर शुरू हो जाएगा.
प्रतिष्ठित अमेरिकी समाचार आउटलेट की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने व्हाइट हाउस को चेतावनी दी है कि हालिया संघर्ष के बाद इस पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल चुका है. तेल और गैस की सप्लाई के लिए दुनिया के सबसे जरूरी समुद्री रास्ते पर अब ईरान का दबदबा और वास्तविक नियंत्रण पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है.
एक अमेरिकी मीडिया ने बताया कि अब ईरान के पास इस जलमार्ग पर ऐसा कंट्रोल है, जो किसी भी परमाणु हथियार से ज्यादा खतरनाक और ताकतवर साबित हो सकता है. ईरान जब चाहे, तब दुनिया की दुखती रग दबाकर वैश्विक व्यापार को ठप कर सकता है.
अगर ईरान इस रास्ते को दोबारा ब्लॉक करता है, तो इसका सबसे सीधा और क्रूर असर भारत के आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा. भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. देश में बीते महीने ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार 4 बार बढ़ोतरी हो चुकी है, जिसने पहले ही आम आदमी का बजट बिगाड़ रखा है.
अगर होर्मुज मार्ग पर दोबारा ग्रहण लगा, तो कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसमान छूने लगेंगी. नतीजतन, न केवल पेट्रोल-डीजल बल्कि घरेलू और कमर्शियल एलपीजी गैस की किल्लत भी दोबारा पैदा हो सकती है.
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विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की आवाजाही प्रभावित होना किसी भी बड़े आयातक देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकता है. हालांकि, राहत की बात यह है कि फिलहाल इस खबर पर दोनों देशों की तरफ से कोई आधिकारिक या पुख्ता मुहर नहीं लगी है. यह पूरी तरह अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और मीडिया रिपोर्ट्स के दावों पर आधारित है. लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार ने इस रिपोर्ट के आते ही अपनी सांसें थाम ली हैं और तेल कंपनियों ने अपनी रणनीतियां बदलनी शुरू कर दी हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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