US Dollar Dominance Declining: दशकों से दुनिया की अर्थव्यवस्था में जिस अमेरिकी डॉलर का सिक्का चलता था, अब उसकी चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी है. एक समय था जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर का मतलब ही ‘भरोसा’ होता था, लेकिन अब दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपनी तिजोरियों से डॉलर को कम कर रहे हैं और उसकी जगह पीली धातु यानी सोने को तरजीह दे रहे हैं. ‘केयरएज की हालिया रिपोर्ट ने इस बदलाव की एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 14 सालों में दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी में 11% से ज्यादा की गिरावट आई है. अगर हम साल 2000 से 2009 के बीच की बात करें, तो दुनिया भर के बैंकों के पास जितना भी पैसा जमा था, उसमें 66% हिस्सा अकेले अमेरिकी डॉलर का होता था. लेकिन 2020-24 के बीच यह आंकड़ा गिरकर साढ़े 58% पर आ गया है.
सिर्फ डॉलर ही नहीं, बल्कि यूरोप की मुद्रा ‘यूरो’ की साख में भी कमी देखी गई है. इसके उलट, लोग अब जापानी येन और ब्रिटिश पाउंड जैसी मुद्राओं पर ज्यादा भरोसा जता रहे हैं.
डॉलर से दूरी बनाने के बाद बैंकों ने अपना रुख सोने की तरफ मोड़ लिया है. साल 2010 के आसपास दुनिया भर के केंद्रीय बैंक साल भर में मुश्किल से 100 टन सोना खरीदते थे. लेकिन अब हालात ये हैं कि 2023-24 में यह खरीद बढ़कर 1,000 टन सालाना के करीब पहुंच गई है. यानी करीब 10 गुना की बढ़ोतरी! आज के दौर में केंद्रीय बैंकों के लिए ‘रिटर्न’ से ज्यादा ‘सुरक्षा’ मायने रखती है, और इस कसौटी पर सोना सबसे खरा उतर रहा है.
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इस बड़े बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह है भू-राजनीतिक तनाव. पिछले कुछ सालों में जिस तरह अमेरिका और यूरोप ने दूसरे देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, उसने दुनिया को डरा दिया है. कई देशों को अब यह लगने लगा है कि सिर्फ डॉलर या यूरो पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है. अगर कल को रिश्ते बिगड़ते हैं, तो उनका विदेशी भंडार खतरे में पड़ सकता है. इसीलिए, अब ‘बास्केट ऑफ करेंसी’ (अलग-अलग मुद्राओं का मिश्रण) और सोने को ज्यादा सुरक्षित माना जा रहा है.
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. अंतरराष्ट्रीय पेमेंट और व्यापार में डॉलर अभी भी सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि अब एक ‘बहुध्रुवीय’ सिस्टम उभर रहा है, जहां किसी एक देश की मुद्रा की मनमानी नहीं चलेगी. कुल मिलाकर, बदलते वैश्विक हालात में केंद्रीय बैंक अपनी पुरानी रणनीति बदल रहे हैं. डॉलर का दबदबा आज भी है, लेकिन सोना और अन्य मुद्राएं उसे कड़ी टक्कर दे रही हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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