West Bengal Election 2026: आज पश्चिम बंगाल में दूसरे दौर का मतदान जारी है लेकिन इसके साथ साथ एक ये भी बहस छिड़ी हुई है कि क्या ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) होने से टीएमसी को ज्यादा फायदा होगा क्योंकि अभी तक के आए आंकड़ों के मुताबिक SIR में 60 लाख हिन्दू मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से बाहर कर दिये गए हैं.. हमेशा से पश्चिम बंगाल का चुनाव ध्रुवीकरण के लिए जाना जाता रहा है. अब तक यह माना जाता था कि यहां की सियासत ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ के इर्द-गिर्द घूमती है. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में SIR के जरिये हिन्दू वोटर के ज्यादा नाम कटने से ‘हिंदुस्तानी बनाम बांग्लादेशी’ की जंग भी खुलकर सामने आ रही है .
चुनाव आयोग के SIR के तहत 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे जाने से राज्य में एक ‘डेमोग्राफिक भूकंप’ आ गया है. इस छंटनी ने केवल टीएमसी के अल्पसंख्यक वोट बैंक को ही नहीं, बल्कि भाजपा के कट्टर समर्थक माने जाने वाले हिंदू खासकर ‘मतुआ समुदाय’ को भी गहरे सदमे में डाल दिया है. क्या यह महज़ एक प्रशासनिक प्रक्रिया है या बंगाल को ‘घुसपैठियों’ से मुक्त करने का कोई मास्टरस्ट्रोक? आइए समझते हैं.
अक्टूबर में जब एसआईआर (SIR) शुरू हुआ, तो राज्य में 7.66 करोड़ मतदाता थे. लेकिन फरवरी तक 63.67 लाख नाम (मौत, डुप्लिकेशन आदि) हटा दिए गए. इसके अलावा 60.06 लाख मतदाताओं को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (समीक्षा के दायरे में) रखा गया, जिनमें से 6 अप्रैल को 27.16 लाख वोटरों को अयोग्य करार दे दिया गया. कुल मिलाकर 90.83 लाख नाम मतदाता सूची से गायब हो गए. आंकड़े बताते हैं कि इस कैंची का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. दावा है कि कटे हुए नामों में 31.1 लाख मुस्लिम वोटर हैं, तो वहीं 60 लाख हिंदू, सिख और ईसाई वोटर भी हैं.
पहले चरण की 152 सीटों पर 13 लाख मतदाताओं के नाम कम हुए हैं. इस चरण में मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना और नदिया जैसे सीमावर्ती जिले शामिल थे, जहां कुछ सीटों पर मुस्लिम आबादी 50% से 70% तक है.
अगर पहले चरण में मुस्लिम वोटरों पर गाज गिरी, तो दूसरे चरण (142 सीटों) में 78 लाख नाम कटने से सबसे बड़ा झटका हिंदुओं और विशेषकर ‘मतुआ समुदाय’ को लगा है. यह चरण शहरी इलाकों (अकेले कोलकाता से 7 लाख नाम कटे) और मतुआ बाहुल्य क्षेत्रों का है.
समीक्षा के दौरान काटे गए 27 लाख नामों में से 65% नाम मुर्शिदाबाद और मालदा के मुस्लिम मतदाताओं के होने का दावा है. शमशेरगंज, लालगोला और फरक्का जैसी टीएमसी की पारंपरिक सीटों पर सबसे ज्यादा नाम कटे हैं. विपक्ष इसे भाजपा की चाल बता रहा है. हालांकि, भाजपा नेता इसे इसे घुसपैठ पर प्रहार बता रहे हैं. हालांकि, कुल आंकड़ों में देखा जाए तो हिंदू और गैर मुस्लिमों के वोट ज्यादा कटे हैं.
इस बहस के बीच शक की सुई बांग्लादेश में आए लोगों के धर्म को लेकर भी है..ये कयास भी लगाए जा रहे है कि वास्तव में जो लोग गैर आधिकारिक तरीके से भारत में प्रवेश हुए क्या वे सच में हिंदू है या पहचान बदल कर आए लोग. इसलिए बीजेपी ने भी इस लड़ाई को हिन्दू बनाम मुस्लिम नहीं बल्कि हिन्दुस्तानी बनाम बांग्लादेशी बना दिया है… बीजेपी के ट्वीटर हैंडल से अध्यक्ष नितिन नबीन के नाम से एक ट्वीट किया गया था. इसमें कहा गया था कि-
‘SIR में तो हिंदुओं के भी नाम कटे हैं. लेकिन, जो बांग्लादेशी या मुसलमान बांग्लादेश से यहां आकर नागरिकता लेने का प्रयास करेगा, तो उस पर कार्रवाई हो रही है… ममता दीदी आपने तो सिर्फ बांग्लादेशियों की चिंता की, बंगाल की जनता (हिंदुस्तानियों) की चिंता हम करने वाले हैं.’
लेकिन बीजेपी के लिए कोई परेशानी की वजह बन सकता है तो वो है मतुआ समुदाय जिन्हें नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के जरिए भारतीय नागरिक बनने का सपना दिखाया गया था. इसी कारण वह भाजपा के समर्थन में आया था. हालांकि, पश्चिम बंगाल में इस समुदाय के भारी संख्या में नाम कटे हैं. जो अभी तक पिछले चुनावों में वोट करते आया है. हालांकि, इसमें से बड़ी संख्या में लोग किसी कारण से बांग्लादेश से आकार भारत में रह रहे थे.
भाजपा के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार बन गई है. एक तरफ वह ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ के नाम कटने का श्रेय ले रही है, तो दूसरी तरफ उसे अपने ही ‘हिंदू शरणार्थी’ वोट बैंक को समझाना पड़ रहा है. केंद्रीय मंत्री और बोंगांव के सांसद शांतनु ठाकुर ने डैमेज कंट्रोल करते हुए दावा किया कि 3000-4000 मतुआ लोगों को नागरिकता मिल चुकी है और बाकी लोगों को भी CAA के तहत नागरिकता दी जाएगी. अभी भी नाम जुड़ने का विकल्प खुला है.
आधिकारिक तौर पर देखा जाए तो वोटर लिस्ट से नाम कटना और जुड़ना भाजपा और सरकार का विषय ही नहीं हैं. हालांकि, विपक्ष के आरोपों को मान भी लिया जाए तो भी आंकड़े साफ बताते हैं कि वोटर लिस्ट से कटे नामों में हिंदुओं की संख्या अधिक है. अगर इस पूरी प्रक्रिया में भाजपा का दखल था तो भी उसने जाति, धर्म के आधार पर फैसला नहीं लिया. यहां फैसला राष्ट्रीयता और कागजों के आधार पर लिया गया है.
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क्योंकि, परंपरागत रूप से मुसलमानों को भाजपा का वोटर नहीं माना जाता और इस छंटनी में उनकी संख्या कम ही है. साथ ही इसका असली असर 4 मई को ही देखने को मिलेगा जहां ये तय हो जाएगा कि जिन हिन्दुओं के नाम कटे वो वास्तव में बीजेपी का वोटबैंक थे या बांग्लादेशी घुसपैठिये जैसा आरोप बीजेपी हमेशा से लगाती आई है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को ममता सरकार गैरकानूनी तरीके से संरक्षण देती है.
पश्चिम बंगाल का यह चुनाव अब तक का सबसे अनोखा चुनाव बन गया है. चुनाव आयोग की 91 लाख नामों की इस छंटनी ने साबित कर दिया है कि लड़ाई अब मंदिरों और मस्जिदों की नहीं रही, बल्कि दस्तावेजों, सरहदों और नागरिकता की है. असली चुनौती टीएमसी और भाजपा दोनों के लिए है. एक टीएमसी को यह साबित करना है कि कटे हुए नाम वैध हिंदुस्तानी नागरिकों के थे, और दूसरे को यह सुनिश्चित करना है कि हिंदू हो या मुस्लिम शरणार्थी जो बांग्लादेश से आए हैं, वे सिस्टम की इस ‘सफाई’ में गैर-हिंदुस्तानी न मान लिए जाएं.
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