Bihar Pablo Escobar Kamdev Singh
Bihar Pablo Escobar Kamdev Singh: कभी ज्ञान की धरती कहे जाने वाले बिहार की आबोहवा में आज खून, बारूद और बंदूक की आवाज गूंज रही है. इस क्राइम और सियासत के कॉकटेल का इतिहास भारत की आजादी के समय से है. जहां सत्ता के संरक्षण में अपराधियों ने हथियार के दम पर अपने साम्राज्य खड़े कर दिये. आज हालत ये है कि जिस लोकतंत्र को जनता का शासन कहा जाता है, वो बिहार में बंदूक के आगे दम तोड़ती दिख रही है.
1947 में भारत की आजादी से लेकर आज 2025 तक बिहार में कई ऐसे अपराधी हुए जिन्होंने अपने क्रूरता और हिंसा के दम पर जंगलराज की नई इबारत लिखी. माफिया से माननीय बनने की ये फेहिस्त शहाबुद्दीन से होते हुए सूरजभान सिंह और अनंत सिंह जैसे कुख्यातों तक आती है. लेकिन आज कहानी इनकी नहीं, आज ऐसे माफिया की कहानी बताने जा रहे हैं जिसे बिहार का पाब्लो एस्कोबार कहा जाता है. यह कहानी उस अपराधी की है जिसने बिहार में माफिया से माननीय बनने का कल्चर शुरू किया. यह कहानी उस माफिया की है जिसकी शुरुआत जितनी शानदार थी, अंत उतना ही क्रूर. ये कहानी बिहार के कुख्यात अपराधी रहे कामदेव सिंह की है.
कामदेव सिंह की कहानी भारत की आजादी के पहले से शुरू होती है. उनका जन्म 1930 में बेगूसराय में एक भूमिहार परिवार में हुआ था. भारत के स्वतंत्र होते ही देश में भूमि सुधार का काम शुरू हो गया. आजादी के समय जिसके पास ज्यादा जमीनें थी उनसे जमीनें सरकार ने छीन ली और उसे भूमिहीन लोगों में बांट दी. बिहार में भी यह कई खामियों के साथ लागू हुआ. कई लोगों से जमीन ले ली गईं और बांट दी गईं, लेकिन कई जातियों को आंशिक रूप से छूट भी मिल गई. जिसने बिहार में आर्थिक असमानता पैदा की. उसी आर्थिक असमानता न बाद में जाकर जातीय वर्चस्व और गैंगवार की नींव रखी.
भारत के बंटवारे के बाद से ही बिहार के ग्रामीण इलाकों में भूमिहारों और राजपूतों के बीच छोटे-मोटे हिंसक विवाद होने लगे थे. राजपूतों का आरोप था कि बिहार के मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिंह भूमि सुधार जाति देखकर कर रहे हैं. उनका आरोप था कि राजपूतों से जमीनें तो ले ली जा रही हैं, लेकिन भूमिहारों को इसमें छूट दी जा रही है. चूंकि श्री कृष्ण सिंह खुद भूमिहार समुदाय से आते थे. इसलिए ये आरोप उनपर और लग रहे थे.
बेगूसराय जैसे जिलों में आर्थिक असमानता ज्यादा गहरी थी. जिसकी वजह से यहां तस्करी और डकैती आम हो गई थी. स्थानीय जमींदार अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए गुंडों को संरक्षण दे रहे थे. चूंकि बंटवारे की वजह से भारत की कानून व्यवस्था काफी लचर हो चुकी थी. लिहाजा ताकतवर इसका फायदा उठा रहे थे. कामदेव सिंह जैसे उभरते अपराधियों को यहीं से पंख लगा. जमींदारों के शह पर कामदेव सिंह ने बंदूक के दम पर दबदबा बनाये रखने के लिए हत्यायें करनी शुरू कर दी. 1952 में जब पहला विधानसभा चुनाव हुआ तब कामदेव सिंह ने जमकर उत्पात मचाया. उसने बूथ कैप्चरिंग कर इलाके के नेताओं को भरपूर मदद की.
1950 के दशक में कामदेव सिंह बेगूसराय में अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल रहा. उसका मुख्य पेशा डकैती, हत्या, तस्करी और राजनीतिक हिंसा था. कामदेव सिंह ने कम्युनिस्टों के खिलाफ अभियान चलाकर कांग्रेसी नेताओं को जमकर सपोर्ट किया. उसने 1957 के विधानसभा चुनाव में कम से कम 34 पोलिंग बूथ कब्जाए और अपने संरक्षक सूर्युग प्रसाद सिंह को जीत दिलाई.
कामदेव सिंह बेहद ही खूंखार और हिंसक था. उसने कलकत्ता से लेकर नेपाल तक अपना नेटवर्क स्थापित कर लिया था. जिसकी वजह से उसके पास भरपूर पैसे आने लगे थे. इन पैसों का उपयोग कामदेव सिंह ने अपनी छवि चमकाने के लिए भी किया. वह गरीबों की शादियां और अंतिम संस्कार का खर्च उठाता था. जिसकी वजह से स्थानीय लोग उसे ‘सम्राट’ और ‘रॉबिन हुड’ जैसी उपाधी दे रखी थी.
अपने हिंसक कार्यों के लिए कुख्यात कामदेव सिंह का साम्राज्य बढ़ता ही जा रहा था. 1960 आते आते उसका वर्चस्व बिहार के उत्तरी जिलों तक पहुंच गया. उसने इलाके में गुंडों की फौज खड़ी कर रखी थी. यहीं वह दौर था जब बिहार की राजनीति का अपराधीकरण हो रहा था. जहां अपराधी अब माननीय बनने लगे थे.
1960 के दशक में उसने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में भी जबरदस्त छाप छोड़ी. इलाके में उसका जबरदस्त वर्चस्व था. बेगूसराय से लेकर मुजफ्फरपुर तक उसके नेटवर्क के तार जुड़े हुए थे. जहां से वो हथियारों की तस्करी और डकैती को अंजाम देकर अकूत कमाई करता था. उसके मनी और मसल पावर देख राजनीतिक दलों ने उसे हायर करना शुरू कर दिया. 1969 के विधानसभा चुनाव में उसने फिर अपनी दबंगई दिखाते हुए 34 बूथ कब्जाए. तबतक बिहार में जातीय संघर्ष भी बढ़ने लगा था. जहां भूमिहारों के गैंग्स ने पिछड़ों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था. इसका सबसे बड़ा कारण पिछड़ों के अंदर राजनीतिक चेतना का उभार था. पिछड़े अब चुनाव में खड़े होने और जीत दर्ज कर सियासी मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे थे.
बिहार को इस हिंसक और बर्बर दौर में ले जाने में पुलिस की भी बड़ी भूमिका रही. पुलिस की नाकामी और भ्रष्टाचार ने बिहार को गर्त में धकेलने की शुरुआत कर दी थी. भ्रष्ट अधिकारी पैसे लेकर कामदेव सिंह को टिप्स देते थे. जिसके बाद वो अपने हिंसक काम को अंजाम देता था. मौका देखकर उसके बेटे राजकुमार सिंह ने राजनीति में कदम रख दिया. 1970 आते आते बिहार में 20-30 बड़े गैंग्स उभरकर सामने आ गए. जिनका मुख्य पेशा रंगदारी और हत्या करना था.
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कामदेव सिंह 1970 आते-आते बिहार में अपना वर्चस्व स्थापित कर चुका था. हालत ये हो गई थी कि इसकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी. पिछड़ी जातियों पर इसके दमन ने सरकार को इसके खिलाफ कार्रवाई करने को मजबूर कर दिया. साल 1980 में बिहार के पाब्लो एस्कोबार कहे जाने वाले कामदेव सिंह के खिलाफ पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की. पुलिस ने उसे एनकाउंटर में मार गिराया. पुलिस ने यह एनकाउंटर गंगा नदी के तट पर उस समय किया. जब वह जान बचाकर गंगा नदी के किनारे से होते हुए भाग रहा था. उसकी लाश गंगा नदी के तट पर मिली.
कामदेव सिंह की मौत ने बिहार के अपराध जगत में एक खाली जगह पैदा कर दिया. जिसे भरने के लिए अनेकों अपराधी आगे आये. कामदेव सिंह के ही कई गुंडों ने अपना-अपना गैंग बनाकर राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ी. जिन अपराधियों को जेल के सलाखों के पीछे होने चाहिये था, वो बिहार में माननीय बन गए और इस तरह बिहार की राजनीति का जो माफियाकरण शुरू हुआ. वह आजतक बदस्तूर जारी है.
-भारत एक्सप्रेस
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