West Bengal Election 2026: हुगली नदी के किनारे बसा बैरकपुर का नोआपाड़ा इलाका आज इतिहास और बदहाली के दोराहे पर खड़ा है. यह वही ऐतिहासिक भूमि है जहाँ 1857 में मंगल पांडे ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था, लेकिन आज यहाँ की जनता अपनी ‘रोजी-रोटी’ के लिए संघर्ष कर रही है. भारत एक्सप्रेस के विशेष कार्यक्रम ‘क्या सोचता है भारत’ के लिए सहयोगी अतुल यादव ने नोआपाड़ा के औद्योगिक सन्नाटे और चुनावी शोर के बीच जमीनी हकीकत का जायजा लिया.
नोआपाड़ा की पहचान कभी उन विशाल जूट मिलों और कपड़ा फैक्ट्रियों से होती थी, जहाँ से हजारों परिवारों की रसोई चलती थी. आज स्थिति इसके बिल्कुल उलट है. फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं और धंधे पूरी तरह बर्बाद हैं. जो इलाका कभी पूरे बंगाल को नौकरी देने के लिए जाना जाता था, आज वहां के युवा रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं.
स्थानीय निवासियों का दर्द गहरा है. उनका कहना है कि औद्योगिक मंदी ने केवल मजदूरों को ही नहीं, बल्कि छोटे दुकानदारों और मध्यम वर्ग को भी आर्थिक गर्त में धकेल दिया है. 95% शहरी आबादी वाले इस क्षेत्र में ‘बंद मिलें’ अब केवल खंडहर नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की विफलता का प्रतीक बन गई हैं.
नोआपाड़ा के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो यहाँ समीकरण बदलते रहे हैं. 2021 में मंजू वसु (TMC) ने 1.37 लाख से अधिक वोट पाकर बड़ी जीत दर्ज की थी, लेकिन गिरता वोट प्रतिशत (2011 में 83% से 2021 में 73.50%) यह संकेत दे रहा है कि जनता में व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ रही है.
करीब 2.60 लाख मतदाताओं वाले नोआपाड़ा में 14% दलित और 11% मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. शहरी मतदाताओं की भारी तादाद होने के कारण यहाँ का मुद्दा बिजली-सड़क से कहीं ज्यादा ‘औद्योगिक पुनरुद्धार’ है. मंगल पांडे की इस क्रांतिकारी धरा पर इस बार विद्रोह का सुर बेरोजगारी के खिलाफ है. अब देखना यह होगा कि इस बार नोआपाड़ा की जनता बंद फैक्ट्रियों का ताला खोलने की उम्मीद में किसे अपना प्रतिनिधि चुनती है.
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