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महबूबा का पतन, अब्दुल्ला का कमबैक और BJP की धाक; 370 हटने के 7 सालों में कैसे धुआं-धुआं हुई अलगाववाद की सियासत

Jammu Kashmir Political Changes: आज ही के दिन साल 2019 में केंद्र की मोदी सरकार ने जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A को हटाया था. जिसे आज कुल 7 साल पूरे हो चुके हैं. इन सात सालों में जम्मू-कश्मीर में कई बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव देखने को मिले हैं. जहां भाजपा ने इस कोर एजेंडे को लागू कर अपनी सियासी जमीन को मजबूत किया, वहीं कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व का एक नया संकट खड़ा हो गया. इसी दौरान केंद्र शासित प्रदेश बनने से लेकर नई सरकार के गठन तक कई सत्ता समीकरण बने और बिगड़े. चलिए समझते हैं कि इन बीते सात सालों में घाटी की सियासत, अर्थव्यवस्था और डेमोग्राफी पर क्या और कितना असर पड़ा है.

राजनितिक बदलाव क्या देखने को मिले?

5 अगस्त 2019 को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A को खत्म कर दिया था. इस ऐतिहासिक कदम को आज पूरे सात साल हो चुके हैं. इन सात सालों में न केवल जम्मू-कश्मीर के भूगोल में बड़े बदलाव देखने को मिले, बल्कि वहां की सियासत, सत्ता समीकरण और सियासी दलों के वजूद में भी जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिला है. कभी दिल्ली के इशारे पर चलने वाली घाटी की राजनीति आज एक नए दौर में है, जहां अलगाववाद और ‘विशेष दर्जे’ की जगह ‘पूर्ण राज्य की बहाली’ मुख्य मुद्दा बन चुकी है.

1. महबूबा की सरकार गिरने से लेकर उमर अब्दुल्ला की ताजपोशी तक का सफर

जम्मू-कश्मीर की सत्ता में पिछले सात सालों में कई समीकरण बने और बिगड़े. जिसकी शुरुआत जून 2018 में ही हो गई थी, जब भाजपा ने महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली PDP-BJP गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था और सरकार गिरने के बाद वहां राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति शासन लागू हुआ था. लगभग 5 साल तक केंद्र द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल (LG) के हाथों में शासन रहने के बाद, सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश पर साल 2024 के अंत में ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव कराए गए. इस चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) ने जीत दर्ज की और उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने.

2. नेशनल कॉन्फ्रेंस बनी ‘किंग’, घाटी में बिखरा महबूबा मुफ्ती का कुनबा

इन सात सालों में कश्मीर घाटी की क्षेत्रीय राजनीति में भारी उथल-पुथल हुई. अनुच्छेद 370 हटने के बाद लंबे समय तक नजरबंदी झेलने वाली फारूक और उमर अब्दुल्ला की पार्टी ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ सबसे मजबूत ताकत बनकर उभरी. 2024 के चुनावों में अकेले NC ने 42 सीटें जीतकर अपनी सियासी जमीन को फिर से मजबूत कर लिया. इससे पहले, साल 2014 में 28 सीटें जीतकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनने वाली महबूबा मुफ्ती की पीडीपी का पूरी तरह पतन हो गया. बीजेपी के साथ पुराना गठबंधन और घाटी के बदले मिजाज के कारण पीडीपी 2024 में महज 3 सीटों पर सिमट कर रह गई, जिसे घाटी की सियासत का सबसे बड़ा उलटफेर माना जा रहा है.

3. जम्मू में भाजपा का ‘राज’, कांग्रेस के सामने वजूद का संकट

बता दें कि, धारा 370 को हटाना हमेशा से भाजपा के कोर एजेंडे में शामिल रहा और इसका सबसे बड़ा सियासी फायदा पार्टी को जम्मू संभाग में मिला. परिसीमन (Delimitation) के बाद जम्मू क्षेत्र की सीटें बढ़ने से बीजेपी का आधार और मजबूत हुआ और पार्टी 29 सीटें जीतकर राज्य की दूसरी सबसे बड़ी ताकतवर पार्टी बन गई. वहीं दूसरी ओर, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए यह सात साल किसी डरावने सपने से कम नहीं रहे. साल 2014 में 12 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2024 में सिर्फ 6 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. जम्मू में भाजपा को चुनौती देने में कांग्रेस पूरी तरह नाकाम रही, जिसकी वजह से आज उसे नेशनल कॉन्फ्रेंस की जूनियर पार्टनर बनकर रहने पर मजबूर होना पड़ा है.

4. ‘पूर्ण राज्य’ और स्थानीय अधिकारों की लड़ाई

अनुच्छेद 370 हटने का सबसे बड़ा राजनीतिक बदलाव यह हुआ कि अब घाटी से ‘विशेष दर्जा’ और ‘अलग अधिकारों’ की मांग पूरी तरह खत्म हो चुकी है. आज वहां की मुख्यधारा की पार्टियों के पास सिर्फ एक बड़ा मुद्दा यही बचा है कि जम्मू-कश्मीर को फिर से ‘पूर्ण राज्य’ का दर्जा वापस मिले. वर्तमान के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लगातार केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर राज्य का दर्जा लौटाने और स्थानीय लोगों की जमीन व नौकरियों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं. आसान शब्दों में कहें तो, इन 7 सालों में जम्मू-कश्मीर अलगाववाद की राजनीति को पीछे छोड़कर देश की मुख्यधारा और विकास की राह पर आगे बढ़ चुका है.

आर्थिक बदलाव क्या देखने को मिले?

संविधान के अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और अगस्त 2019 में लद्दाख के अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लद्दाख में आए व्यापक आर्थिक, सामाजिक और इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव का ब्योरा देते हुए कहा कि 2019 के बाद से लद्दाख तीव्र विकास और परिवर्तन का एक बड़ा उदाहरण बन चुका है.

1. वार्षिक बजट बढ़कर 6,000 करोड़

गृह मंत्री अमित शाह ने अपने लद्दाख दौरे के दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की थी. इस दौरान उन्होंने बताया था कि लद्दाख का वार्षिक बजट 1,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 6,000 करोड़ रुपये हो गया है. साथ ही, औद्योगिक निवेश और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने के लिए ‘सिंधु अवसंरचना विकास निगम’ का गठन किया गया है.

2. इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी में उछाल देखने को मिला

सड़कों की लंबाई 1,799 किमी से बढ़कर 4,040 किमी हो गई है. पुलों की संख्या 19 से बढ़कर 72 और हेलीपैड 7 से बढ़कर 41 हो चुके हैं. स्नो-क्लियरिंग मशीनों की संख्या 215 होने से जोजिला और कारगिल-लेह मार्ग सर्दियों में भी खुले रहते हैं, जिससे सालभर व्यापारिक गतिविधियां जारी रहती हैं.

3. पावर और डिजिटल नेटवर्क का विस्तार हुआ

ट्रांसफार्मरों की संख्या 1,182 से बढ़कर 3,153 हो गई है, जिससे दूरदराज इलाकों में बिजली पहुंच रही है. वहीं मोबाइल टावरों की संख्या 344 से बढ़कर 653 होने से डिजिटल कनेक्टिविटी और ऑनलाइन व्यापार मजबूत हुआ है.

4. नए प्रशासनिक और व्यापारिक अवसर मिले

पांच नए जिले (शाम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास) बनने से प्रशासनिक विस्तार हुआ है. स्थानीय भाषाओं जैसे की भोटी और पुरगी को मान्यता मिलने से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार व व्यापार के नए रास्ते खुले हैं.

5. सुरक्षा परिदृश्य और पर्यटन क्षेत्र में बड़ा बदलाव

अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा परिदृश्य और पर्यटन क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है. सुरक्षा के मोर्चे पर देखें तो वर्ष 2011 से 2018 के बीच राज्य में कुल 2,333 आतंकी घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें 2018 का साल 614 घटनाओं के साथ सबसे भयानक रहा. वहीं, 5 अगस्त 2019 के बाद से घाटी में आतंकवादी हमलों और हिंसक गतिविधियों में 70% तक की गिरावट आई है. हालांकि, सेना की कड़ाई के कारण आतंकियों ने अब आमने-सामने की लड़ाई के बजाय जम्मू के पहाड़ी इलाकों में प्रवासियों और नागरिकों पर टार्गेटेड किलिंग का पैंतरा अपनाया है, लेकिन ओवरऑल सिक्योरिटी ग्रिड मजबूत होने से स्थिति काफी हद तक नियंत्रण में आई है.

शांति और सुरक्षा में बड़ा सुधार

दूसरी ओर, शांति और सुरक्षा में सुधार का सीधा लाभ पर्यटन उद्योग को मिला है. जहां 2011 से 2018 के 8 वर्षों में लगभग 8.70 करोड़ पर्यटक और श्रद्धालु आए थे, वहीं 370 हटने के बाद से अब तक रिकॉर्ड 9.75 करोड़ से अधिक लोग जम्मू-कश्मीर का दौरा कर चुके हैं. महामारी के बाद पर्यटन में ऐतिहासिक उछाल देखा गया और वर्ष 2024 में 2.30 करोड़ सैलानियों के आगमन के साथ अब तक का सबसे बड़ा ऑल-टाइम रिकॉर्ड बना. वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा जैसे धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ गुलमर्ग और पहलगाम जैसे हिल स्टेशनों पर उमड़ती भारी भीड़ यह साबित करती है कि जम्मू-कश्मीर अब हिंसा के दौर को पीछे छोड़कर विकास और पर्यटन का मुख्य केंद्र बन चुका है.

डेमोग्राफिक बदलाव क्या आया?

अनुच्छेद 370 और 35A को खत्म करने के बाद जम्मू-कश्मीर के डोमिसाइल नियमों और भूमि कानूनों में बड़े बदलाव आए हैं. नए डोमिसाइल नियमों के तहत जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से रह रहे लोगों और सरकारी कर्मचारियों को निवास प्रमाण पत्र जारी किए जा रहे हैं. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अब तक लाखों प्रमाण पत्र जारी हो चुके हैं, जिनमें गैर-स्थायी और बाहरी नागरिकों का भी एक हिस्सा शामिल है. इसके अतिरिक्त, देश के अन्य राज्यों के नागरिकों के लिए भी वहां भूमि और संपत्ति खरीदने का मार्ग प्रशस्त हो गया है, जिससे क्षेत्र में संभावित जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर व्यापक चर्चाएं शुरू हुई हैं.

इन सुधारों का असर राज्य की चुनावी और राजनीतिक व्यवस्था पर भी पड़ा है. चुनाव नियमों में हुए संशोधनों के बाद अब वहां रहने वाले किसी भी ‘आम आदमी’ जैसे कि कर्मचारी, छात्र या मजदूर को मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने का अधिकार मिल गया है. इसके साथ ही, हाल ही में पूर्ण हुई विधानसभा परिसीमन प्रक्रिया ने सीटों की संख्या और भौगोलिक सीमाओं को पुनर्गठित किया है, जिसने जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक प्रतिनिधित्व (Political representation) और सत्ता के नए समीकरणों को नया आकार दिया है.

संविधानिक बदलाव क्या देखने को मिले?

5 अगस्त 2019 के फैसलों के बाद जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक और प्रशासनिक स्तर पर कई मुख्य बदलाव देखने को मिले. धारा 370 और 35A खत्म होने से अलग संविधान, अलग झंडा और दोहरी नागरिकता की व्यवस्था खत्म हो गई. अब वहां पर केवल एक भारतीय संविधान, एक तिरंगा और एक भारतीय नागरिकता लागू है.

केंद्र सरकार ने पूरे राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांट दिया. जिसमें जम्मू-कश्मीर (विधानसभा के साथ) और लद्दाख (बिना विधानसभा के) शामिल हैं. इसके अलावा राज्य की विधान परिषद समाप्त कर दी गई. राज्यपाल की जगह उपराज्यपाल (LG) को ले आया गया. जिसके चलते भारतीय दंड संहिता (IPC) सहित भारत के सभी केंद्रीय कानून अब यहां सीधे लागू होने लगे.

जमीन, अधिकारऔर नागरिकता में बदलाव

15 साल से रहने वाले या निश्चित समय तक पड़े/नौकरी किए लोगों को डोमिसाइल प्रमाणपत्र मिलने लगा. अब भारत का कोई भी नागरिक यहां पर जमीन खरीद सकता है और नौकरियों के लिए आवेदन भी कर सकता है. पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों, वाल्मीकि और गोरखा समुदायों को भी अधिकार दिए गए.

  • जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद वहां SC, ST, OBC और EWS आरक्षण पूरी तरह लागू हो गया. विधानसभा में अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए सीटें आरक्षित की गईं.
  • इन बदलावों का असर वहां की विधानसभा सीटों पर भी देखने को मिला. केंद्र सरकार ने परिसीमन कर विधानसभा सीटों की संख्या को बढ़ाकर 90 (43 जम्मू और 47 कश्मीर) कर दी.
  • जम्मू-कश्मीर अभी भी एक केंद्र शासित प्रदेश ही है. पुलिस और कानून-व्यवस्था का नियंत्रण LG यानी केंद्र सरकार के पास है. राज्य का पूर्ण दर्जा (Statehood) बहाल होना अभी बाकी है.

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-भारत एक्सप्रेस

Shubhra Rai

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