दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अनिवार्य उपस्थिति मानदंडों पर फिर से विचार करने की तत्काल आवश्यकता है क्योंकि कोविड-19 महामारी के बाद शिक्षण पद्धतियों में काफी बदलाव आया है.
अदालत ने कहा कि छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य, जो प्रभावित होता है, उपस्थिति आवश्यकताओं पर विचार करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए और शैक्षणिक संस्थानों में शिकायत निवारण तंत्र और सहायता प्रणाली की भूमिका को सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है.
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और अमित शर्मा की पीठ ने कहा कि स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में उपस्थिति आवश्यकताओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए या नहीं, इस मुद्दे को किसी विशिष्ट पाठ्यक्रम, कॉलेज, विश्वविद्यालय या संस्थान तक सीमित करने के बजाय बहुत उच्च स्तर पर संबोधित किया जाना चाहिए.
पीठ ने कहा कि कम उपस्थिति के लिए छात्रों को दंडित करने के बजाय कक्षाओं में उपस्थित होने के लिए कुछ प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. अदालत ने कहा कि वह इन सभी कारकों का अध्ययन करने और उसके समक्ष एक रिपोर्ट पेश करने के लिए एक समिति बनाने के लिए इच्छुक है ताकि यूजी और पीजी पाठ्यक्रमों और उनमें उपस्थिति आवश्यकताओं के लिए कुछ समान प्रथाएं विकसित की जा सकें.
उच्च न्यायालय सितंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू की गई एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है जो एमिटी लॉ यूनिवर्सिटी के एक छात्र द्वारा कथित आत्महत्या पर थी. मार्च 2017 में मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था. एमिटी के तीसरे वर्ष के लॉ छात्र सुशांत रोहिल्ला ने 10 अगस्त 2016 को अपने घर पर फांसी लगा ली थी जब विश्वविद्यालय ने कथित तौर पर अपेक्षित उपस्थिति की कमी के कारण उसे सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया था.
छात्र ने एक नोट छोड़ा था जिसमें कहा गया था कि वह असफल है और जीना नहीं चाहता. इस मुद्दे से निपटते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि नियामक निकायों और कुछ विश्वविद्यालयों ने अपने क़ानून और अध्यादेशों में ऐतिहासिक रूप से अनिवार्य उपस्थिति आवश्यकताओं को निर्धारित किया है.
पीठ ने कहा हाल के दिनों में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों द्वारा वर्चुअल या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कक्षाएं, परीक्षाएं आयोजित करना असामान्य नहीं है. अनिवार्य उपस्थिति का मुद्दा भी युवा पीढ़ी में चिंता का विषय है, जो शिक्षा को पूरी तरह से अलग तरीके से देखती है. शिक्षा अब कक्षा शिक्षण तक सीमित नहीं है और वास्तव में अधिक व्यावहारिक क्षेत्रों तक फैली हुई है.
अदालत ने कहा कि स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले युवाओं के लिए नौकरी करना और खुद की तथा अपने परिवार की मदद के लिए शिक्षा प्राप्त करना असामान्य नहीं है, और ऐसे मामलों को भी ध्यान में रखना चाहिए. इसके अलावा, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में उपस्थिति की आवश्यकता समान हो भी सकती है और नहीं भी, जहाँ तकनीक पूरी तरह से विकसित नहीं हुई है. इस अदालत की राय में, उपस्थिति के मानकों पर विचार करने के लिए शिक्षकों और छात्रों से परामर्श किया जाना चाहिए.
-भारत एक्सप्रेस
Nothing CEO Carl Pei: उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी नथिंग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) कार्ल पेई…
Ayodhya Ram Mandir Donation Theft: सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी गई स्टेटस रिपोर्ट में बताया…
एशियन गेम्स 2026 के दूसरे दिन भारत ने निशानेबाजी और एमएमए (MMA) में 3 सिल्वर…
Australia Ageing Population: साल 2060 तक ऑस्ट्रेलिया की आबादी घटने लगेगी. यह देश के इतिहास…
भारत एक्सप्रेस के CMD एवं एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय दिल्ली में होने जा रहे 'हिंदी मेरी…
IIT Bombay Student Death:: IIT बॉम्बे छात्र साहिल वाकोडे की मौत के मामले में परिवार…