Dhar Bhojshala Dispute and History
Dhar Bhojshala Dispute and History: धार भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने जैन समाज और मुस्लिम पक्ष की याचिकाएं खारिज करते हुए भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर माना है. बता दें कि यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है, भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर घोषित करते हुए एक बार फिर यह मामला फिर से चर्चा में आ गया है. इस कड़ी में आपको भोजशाला के इतिहास और विवाद के बारें में विस्तार से बताते हैं.
भोजशाला विवाद साल 2022 में शुरू हुआ था. बता दें कि उस समय रंजना अग्निहोत्री और उनके सहयोगियों ने भोजशाला को धार्मिक स्वरूप और हिंदुओं को वहां पूर्ण पूजा अधिकार देने की मांग करते हुए हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिक के 2 साल बाद मार्च 2024 को हाईकोर्ट ने एएसआई को पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था और इस मामले की जांच करने के लिए कहा था. एएसआई ने 22 मार्च 2024 से 98 दिनों तक परिसर का सर्वे किया और 15 जुलाई 2024 को 2000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट अदालत में पेश की.
इंदौर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 6 अप्रैल 2026 से इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू की. 12 मई 2026 तक चली सुनवाई में हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने अपने-अपने दावे और साक्ष्य अदालत में पेश किए. करीब एक महीने से ज्यादा चली सुनवाई के दौरान अदालत में हजारों दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, पुरातात्विक साक्ष्य और धार्मिक दावे रखे गए. सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था.
भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है. ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार भोजशाला में मां सरस्वती का मंदिर और विद्या केंद्र था. 12वीं-13वीं शताब्दी में मंदिर को ध्वस्त कर मुस्लिम समाज ने वहां मकबरा और मस्जिद का निर्माण कर दिया था. रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के रिसर्च पेपर ‘धार, भोज और सरस्वती’ के अनुसार “भोजशाला” शब्द का उपयोग पहली बार जर्मन भारतविद एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने 1893 में किया था. इन सबके बाद ब्रिटिश अधिकारी के.के. लेले ने इस स्थान की जांच की, जिससे यह बात सामने आई कि वर्तमान ढांचे का निर्माण ध्वस्त मंदिर के अवशेषों से किया गया था.
अयोध्या विवाद के बाद भोजशाला का मुद्दा भी तेजी से उभरा, दक्षिणपंथी संगठनों ने यहां हिंदू पूजा के पूर्ण अधिकार की मांग तेज कर दी. 1994 में विश्व हिंदू परिषद द्वारा स्मारक पर झंडा फहराने की चेतावनी के बाद धार में कर्फ्यू जैसी स्थिति बन गई. बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौते के बाद मंगलवार और शुक्रवार को पूजा-नमाज की व्यवस्था जारी रही. 1997 में एक बार फिर विश्व हिंदू परिषद ने स्मारक पर झंडा फहराने का ऐलान किया, जिसके बाद प्रशासन ने आम लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी.
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