India fertility rate
Global birth rate crisis: दुनिया की आबादी को लेकर दशकों से एक ही डर दिखाया जाता रहा है, ‘जनसंख्या विस्फोट’. लेकिन आज 2026 में, हकीकत इसके बिल्कुल उलट खड़ी है. दुनिया के सामने अब सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि लोग बढ़ रहे हैं, बल्कि संकट यह है कि बच्चे पैदा होने बंद हो रहे हैं.
प्रजनन दर (Fertility Rate) में आ रही यह ऐतिहासिक गिरावट सिर्फ यूरोप या जापान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारत के दरवाज़े पर भी दस्तक दे दी है. हाल ही में आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत की राष्ट्रीय प्रजनन दर (India fertility rate) लगभग 1.9 तक आ चुकी है, जो जनसंख्या स्थिरता के लिए आवश्यक 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है. इसी के साथ दिल्ली की प्रजनन दर भी यूरोपीय देश फिनलैंड से भी कम पाई गई है. आइए जानते हैं कैसे कम या बढ़ती है फर्टिलिटी रेट और इसका असर क्या होगा.
दुनिया के कई देशों में जन्म दर बहुत तेजी से घट रही है, जिससे आने वाले समय में जनसंख्या और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है. दक्षिण कोरिया में जन्म दर लगभग 0.72 से 0.76 तक है, जो दुनिया में सबसे कम मानी जाती है और यहां आबादी तेजी से घट रही है. ताइवान में यह दर 0.70 से भी कम हो गई है, जिससे गंभीर जनसांख्यिकीय संकट पैदा हो रहा है. चीन में जन्म दर लगभग 1.0 के आसपास है, जिसका एक बड़ा कारण लंबे समय तक चली वन-चाइल्ड पॉलिसी है, जिससे कामकाजी आबादी कम हो रही है. वहीं जापान और इटली में जन्म दर लगभग 1.1 से 1.2 के बीच है, जिसके कारण वहां की आबादी तेजी से बूढ़ी होती जा रही है.
कम आबादी सुनना पहली बार में पर्यावरण के लिहाज से अच्छा लग सकता है, लेकिन अर्थशास्त्र के चश्मे से देखें तो यह एक टाइम-बम है.
ये भी पढ़ें: मेडिकल छात्रों के लिए बड़ी खुशखबरी: कडपा GGH में सरकारी नौकरी का मौका, 10 जून तक झटपट करें अप्लाई
दुनिया के कई देश गिरती जन्म दर की समस्या से निपटने के लिए अलग-अलग उपाय कर रहे हैं. सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में सरकार बच्चों के जन्म पर परिवारों को कैश बोनस और हर महीने भत्ता दे रही है ताकि लोग ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित हों. हंगरी में ऐसी नीति है कि जिन महिलाओं के चार या उससे ज्यादा बच्चे होते हैं, उन्हें जीवनभर इनकम टैक्स नहीं देना पड़ता और शादी करने वाले युवाओं को सस्ते लोन दिए जाते हैं जो बच्चे होने पर माफ भी हो सकते हैं.
वहीं स्वीडन और नॉर्वे जैसे नॉर्डिक देशों में माता-पिता को लंबे समय तक पेड पैरेंटल लीव मिलती है, जिसमें पूरी सैलरी मिलती है और पिता की छुट्टी भी जरूरी होती है ताकि जिम्मेदारी बराबर बंटे. जापान और फ्रांस जैसे देशों में कामकाजी परिवारों के लिए मुफ्त या सस्ती डे-केयर और चाइल्डकेयर सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि महिलाएं नौकरी और मातृत्व दोनों को आसानी से संभाल सकें.
-भारत एक्सप्रेस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू को फोन…
8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग की 18 महीने की समयसीमा का 66% हिस्सा पूरा…
भारत और न्यूजीलैंड के बीच ऑकलैंड के ईडन पार्क में खेले जा रहे पहले वनडे…
दिल्ली हाई कोर्ट ने सनी देओल की आगामी फिल्म 'सूर्या: अंत से आरंभ तक' की…
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने दो से अधिक बच्चे होने पर पंचायत और स्थानीय निकाय…
मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2026 को 'किसान कल्याण वर्ष' घोषित करते हुए किसानों की…