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गिरती फर्टिलिटी रेट के चलते पूरी दुनिया में मंडरा रहा संकट: क्या आप भी नहीं पैदा कर रहे हैं बच्चे?

Global birth rate crisis: दुनिया की आबादी को लेकर दशकों से एक ही डर दिखाया जाता रहा है, ‘जनसंख्या विस्फोट’. लेकिन आज 2026 में, हकीकत इसके बिल्कुल उलट खड़ी है. दुनिया के सामने अब सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि लोग बढ़ रहे हैं, बल्कि संकट यह है कि बच्चे पैदा होने बंद हो रहे हैं.

प्रजनन दर (Fertility Rate) में आ रही यह ऐतिहासिक गिरावट सिर्फ यूरोप या जापान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारत के दरवाज़े पर भी दस्तक दे दी है. हाल ही में आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत की राष्ट्रीय प्रजनन दर (India fertility rate) लगभग 1.9 तक आ चुकी है, जो जनसंख्या स्थिरता के लिए आवश्यक 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है. इसी के साथ दिल्ली की प्रजनन दर भी यूरोपीय देश फिनलैंड से भी कम पाई गई है. आइए जानते हैं कैसे कम या बढ़ती है फर्टिलिटी रेट और इसका असर क्या होगा.

क्या है फर्टिलिटी रेट गिरने की वजह? (Why fertility rate is decreasing)

  • महिला सशक्तिकरण और करियर: 21वीं सदी में महिलाओं की उच्च शिक्षा और करियर प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है. आत्मनिर्भरता की इस दौड़ में शादियां अब 25 या 30 साल की उम्र के बाद हो रही हैं, जिससे जैविक रूप से बच्चे पैदा करने की समयावधि (Fertility window) छोटी हो गई है.
  • आसमान छूती महंगाई (The Cost of a Child): आज के दौर में बच्चे को सिर्फ जन्म देना काफी नहीं है. उसकी अच्छी स्कूली शिक्षा, स्वास्थ्य और रहने के लिए बड़े घर का खर्च मध्यम वर्ग के बजट से बाहर हो रहा है. लोग अब ज्यादा बच्चों के बजाय एक बच्चे को बेहतर जीवन देने की नीति पर चल रहे हैं.
  • शहरी जीवन और सपोर्ट सिस्टम की कमी: गांवों से शहरों की ओर पलायन ने संयुक्त परिवारों (Joint Families) को खत्म कर दिया है. शहरों में फ्लैट संस्कृति और ‘न्यूक्लियर फैमिली’ में रहने वाले कामकाजी माता-पिता के पास बच्चों की देखभाल (Childcare) के लिए समय या सहारा नहीं होता.
  • बदली हुई जीवनशैली और तनाव: आधुनिक लाइफस्टाइल, देर रात तक काम, स्क्रीन एडिक्शन और मानसिक तनाव के कारण कपल्स में इनफर्टिलिटी (बांझपन) की समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं.

किन देशों की हालत सबसे खराब है?

दुनिया के कई देशों में जन्म दर बहुत तेजी से घट रही है, जिससे आने वाले समय में जनसंख्या और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है. दक्षिण कोरिया में जन्म दर लगभग 0.72 से 0.76 तक है, जो दुनिया में सबसे कम मानी जाती है और यहां आबादी तेजी से घट रही है. ताइवान में यह दर 0.70 से भी कम हो गई है, जिससे गंभीर जनसांख्यिकीय संकट पैदा हो रहा है. चीन में जन्म दर लगभग 1.0 के आसपास है, जिसका एक बड़ा कारण लंबे समय तक चली वन-चाइल्ड पॉलिसी है, जिससे कामकाजी आबादी कम हो रही है. वहीं जापान और इटली में जन्म दर लगभग 1.1 से 1.2 के बीच है, जिसके कारण वहां की आबादी तेजी से बूढ़ी होती जा रही है.

अगर बच्चे कम पैदा होंगे, तो दुनिया का क्या होगा?

कम आबादी सुनना पहली बार में पर्यावरण के लिहाज से अच्छा लग सकता है, लेकिन अर्थशास्त्र के चश्मे से देखें तो यह एक टाइम-बम है.

  1. ‘ग्रे’ सोसाइटी (बुजुर्गों की फौज): जब नए बच्चे कम होंगे, तो समाज में युवाओं की तुलना में बुजुर्गों (60+) की आबादी बढ़ जाएगी. फिलहाल चीन और जापान आज इसी संकट से जूझ रहे हैं.
  2. आर्थिक पहिया थम जाना: फैक्ट्रियों, आईटी कंपनियों, सेना और कृषि क्षेत्र को चलाने के लिए युवा हाथ (Labor Force) नहीं मिलेंगे. कार्यबल की कमी से जीडीपी (GDP) ग्रोथ सुस्त पड़ जाएगी.
  3. पेंशन सिस्टम का ध्वस्त होना: किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में युवा टैक्स भरते हैं, जिससे बुजुर्गों को पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती हैं. जब टैक्स देने वाले कम होंगे और पेंशन लेने वाले ज्यादा, तो सरकारी खजाने खाली हो जाएंगे.
  4. सन्नाटे की ओर बढ़ते शहर: दुनिया के कई हिस्सों (जैसे जापान के ग्रामीण इलाकों) में बच्चे न होने के कारण स्कूल बंद हो रहे हैं, खिलौनों की कंपनियां बंद हो रही हैं और पूरे के पूरे कस्बे भूतों के शहर में तब्दील हो रहे हैं.

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देश क्या कर रहे हैं उपाय?

दुनिया के कई देश गिरती जन्म दर की समस्या से निपटने के लिए अलग-अलग उपाय कर रहे हैं. सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में सरकार बच्चों के जन्म पर परिवारों को कैश बोनस और हर महीने भत्ता दे रही है ताकि लोग ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित हों. हंगरी में ऐसी नीति है कि जिन महिलाओं के चार या उससे ज्यादा बच्चे होते हैं, उन्हें जीवनभर इनकम टैक्स नहीं देना पड़ता और शादी करने वाले युवाओं को सस्ते लोन दिए जाते हैं जो बच्चे होने पर माफ भी हो सकते हैं.

वहीं स्वीडन और नॉर्वे जैसे नॉर्डिक देशों में माता-पिता को लंबे समय तक पेड पैरेंटल लीव मिलती है, जिसमें पूरी सैलरी मिलती है और पिता की छुट्टी भी जरूरी होती है ताकि जिम्मेदारी बराबर बंटे. जापान और फ्रांस जैसे देशों में कामकाजी परिवारों के लिए मुफ्त या सस्ती डे-केयर और चाइल्डकेयर सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि महिलाएं नौकरी और मातृत्व दोनों को आसानी से संभाल सकें.

-भारत एक्सप्रेस

Sahil Singh

पढ़ने-लिखने से शुरू हुआ सफर खबरों तक ले गया. पत्रकारिता को करियर बनाने का एक मात्र उद्देश्य—पढ़ना, साथ ही नई-नई चीज़ों को जानने की जिज्ञासा रखना था. आज से पहले ‘आज तक’ चैनल, उसके बाद दायित्व वेबसाइट, और अब भारत एक्सप्रेस में बतौर सब-एडिटर की भूमिका निभा रहा हूं.

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