गुरमीत राम रहीम को 21 दिन की पैरोल मिली
Gurmeet Ram Rahim Parole: रेप और मर्डर के संगीन अपराधों में 20 साल और उम्रकैद की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के लिए शायद जेल अब कोई ‘कैद’ नहीं बल्कि मानो एक ‘पार्ट-टाइम रिहाइश’ बनकर रह गई है. दरअसल रोहतक की सुनारिया जेल से बाबा को एक बार फिर 21 दिन की फरलो मिल गई है. सजा मिलने के बाद से यह 17वां मौका है जब बाबा जेल का फाटक लांघकर बाहर खुली हवा में सांस लेगा.
वहीं बात करें आम कैदी की तो वे एक-एक दिन की पैरोल के लिए अदालतों के चक्कर काटते-काटते घिस जाते हैं, लेकिन बाबा के लिए पैरोल का दरवाजा ऐसे खुलता है मानो किसी 5-स्टार होटल का ऑटोमैटिक स्लाइडिंग डोर हो.
साल 2017 में जब विशेष सीबीआई अदालत ने दो साध्वियों से यौन शोषण और हत्या के मामलों में बाबा को अंदर किया था, तब लगा था कि इंसाफ हुआ है. लेकिन पिछले 10 सालों का रिपोर्ट कार्ड उठाकर देखें तो बाबा 16 बार पहले ही बाहर आ चुका है और अब 17वीं बार 21 दिनों के लिए सिरसा वाले आश्रम में ‘विश्राम’ फरमाएंगे.
ज्ञात रहे मई में ही 30 दिन की पैरोल काटने के बाद बाबा अभी ठीक से जेल की दाल-रोटी पचा भी नहीं पाए होंगे कि सिस्टम ने फिर से रिहाई का रेड कारपेट बिछा दिया.
साध्वी यौन शोषण में 10-10 साल की दो अलग-अलग सजाएं, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरा मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या का गुनाह-इतने भारी-भरकम ‘अपराधों का पुलिंदा’ पीठ पर लादे घूमने वाले कैदी पर आखिर जेल प्रशासन इतना मेहरबान क्यों है? बता दें कानून की किताबों में लिखा है कि पैरोल ‘खास और आपात परिस्थितियों’ में मिलती है, लेकिन बाबा के मामले में लगता है कि ‘आपात स्थिति’ हर दो-तीन महीने में अपने आप ऑटो-रिन्यू हो जाती है.
शुरुआत में जब बवंडर मचा था तो बाबा को यूपी के बागपत के बरनावा आश्रम में ‘क्वारंटीन’ रखा जाता था. लेकिन धीरे-धीरे बाबा का रसूख ऐसा चमका कि अब सीधे सिरसा डेरा सच्चा सौदा आश्रम में पधारने की परमिशन मिल जाती है. मंगलवार को जब बाबा फिर से सिरसा आश्रम में कदम रखेगा, तो अनुयायियों का मेला लगेगा, सत्संग के ऑनलाइन वीडियो चलेंगे और बाबा फिर से ‘ज्ञान’ बांटेंगे-मानो कोई सजायाफ्ता मुजरिम नहीं बल्कि किसी लंबे टूर से लौटा हुआ कोई वीआईपी मेहमान हो.
हरियाणा और पंजाब में डेरा प्रेमियों का वोट बैंक हमेशा से नेताओं की भूख मिटाता आया है. यही वजह (Gurmeet Ram Rahim Parole) है कि जब भी बाबा को पैरोल या फरलो मिलती है, राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी शुरू हो जाती है. जनता पूछ रही है कि यह पैरोल की नीति है या ‘वोट बैंक मैनेजमेंट’ का कोई गुप्त फॉर्मूला?
सवाल अब ये भी उठ रहे हैं कि अगस्त 2017 में जिस बाबा की गिरफ्तारी पर पूरा हरियाणा-पंजाब हिंसा की आग में झुलस गया था, उसी बाबा को बार-बार ‘अस्थाई आजादी’ देना कानून का मजाक उड़ाने जैसा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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