STF Investigation Report
KGMU Conversion Case: उत्तर प्रदेश की प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) एक बार फिर गंभीर आरोपों को लेकर चर्चा में है. विश्वविद्यालय परिसर में कथित धर्मांतरण, प्रेम संबंधों के जरिए यौन शोषण, महिला कर्मचारियों को धमकाने और शिकायतों को दबाने के मामलों में STF की विस्तृत जांच रिपोर्ट सामने आई है. रिपोर्ट में पैथोलॉजी समेत कई विभागों के डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं. साथ ही विश्वविद्यालय के भीतर कथित गुटबाजी, रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ भेदभाव और शिकायतकर्ताओं पर दबाव बनाने जैसे आरोप भी दर्ज किए गए हैं. STF ने अपनी जांच के आधार पर शासन को रिपोर्ट भेजकर संबंधित डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच और नियमानुसार कार्रवाई करने की सिफारिश की है. हालांकि, रिपोर्ट में दर्ज सभी आरोपों की स्वतंत्र जांच और प्रशासनिक स्तर पर पुष्टि होना अभी बाकी है.
इस पूरे मामले की शुरुआत उत्तर प्रदेश यूथ एसोसिएशन के अध्यक्ष शिवम श्रीवास्तव की शिकायत से हुई थी. उन्होंने STF मुख्यालय को पत्र भेजकर KGMU परिसर में कथित धर्मांतरण और लव जिहाद से जुड़े मामलों की जांच कराने की मांग की थी. इसके बाद STF के पुलिस उपाधीक्षक प्रमेश कुमार शुक्ल को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई. अपर पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था एवं STF अमिताभ यश ने 25 अगस्त 2026 को अपर मुख्य सचिव (गृह) को रिपोर्ट भेजी. इसमें विश्वविद्यालय के अलग-अलग विभागों से जुड़े कई मामलों, शिकायतों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है.
STF रिपोर्ट में दो प्रमुख मामलों का जिक्र किया गया है. पहला मामला KGMU की रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. देवारती मित्रा की शिकायत से जुड़ा है. उनकी शिकायत पर 23 दिसंबर 2025 को चौक थाने में डॉ. रमीज मलिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था. इसमें शादी का झांसा देकर यौन शोषण करने, धमकी देने और धर्मांतरण प्रतिषेध कानून के तहत आरोप लगाए गए थे. दूसरा मामला नर्सिंग स्टाफ माविया की शिकायत से संबंधित है. 29 दिसंबर 2025 को कैसरबाग थाने में रेजिडेंट डॉक्टर मोहम्मद आदिल के खिलाफ केस दर्ज हुआ था. शिकायत में आदिल पर माविया समेत एक अन्य हिंदू नर्सिंग कर्मचारी को कथित तौर पर प्रेम संबंधों में फंसाकर शारीरिक और मानसिक शोषण करने तथा धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप लगाए गए. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डॉ. रमीज के खिलाफ अन्य महिला डॉक्टरों से संबंधित शिकायतें सामने आई थीं. उन्हें 9 जनवरी 2026 को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था.
STF की जांच रिपोर्ट में KGMU के पैथोलॉजी विभाग को लेकर सबसे अधिक गंभीर टिप्पणियां की गई हैं. रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से चुनिंदा कर्मचारियों और रेजिडेंट डॉक्टरों को संरक्षण दिया जाता था. जांच में दावा किया गया कि महिला रेजिडेंट डॉक्टरों, छात्राओं और नर्सिंग स्टाफ की शिकायतों को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें डराने या दबाने की कोशिश की जाती थी. विरोध करने वाली महिलाओं को करियर खराब करने, मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कराने और नौकरी से हटाने जैसी धमकियां दिए जाने के आरोप भी रिपोर्ट में शामिल हैं. हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष और विभागीय जांच के निष्कर्ष सामने आना बाकी है.
STF की रिपोर्ट केवल पैथोलॉजी विभाग तक सीमित नहीं है. इसमें गांधी वार्ड, माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया है. गांधी वार्ड में डॉक्टर आदिल और नर्सिंग स्टाफ नफीस तथा फुरकान पर महिला नर्सिंग कर्मचारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार, शोषण और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप दर्ज किए गए हैं. माइक्रोबायोलॉजी विभाग में संविदा पर कार्यरत एक महिला कंप्यूटर ऑपरेटर ने एक वरिष्ठ कर्मचारी के खिलाफ छेड़छाड़ और धर्मांतरण के लिए दबाव डालने की शिकायत की थी. रिपोर्ट के अनुसार, शिकायत पर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय संबंधित महिला कर्मचारी की संविदा समाप्त कर दी गई. वहीं रेडियोलॉजी विभाग में कार्यरत डॉक्टर रिजवान पर दो हिंदू महिला डॉक्टरों को प्रेम संबंधों में उलझाकर कथित रूप से ब्लैकमेल करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप लगाए गए हैं. शिकायत करने पर पीड़ितों को परीक्षा में फेल करने और करियर बर्बाद करने की धमकी दिए जाने का भी दावा किया गया है.
STF ने पैथोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश बाबू और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुमायरा कयूम की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि डॉ. देवारती मित्रा की शिकायत सामने आने के बाद प्रोफेसर सुरेश बाबू ने उनके परिजनों से बातचीत के दौरान उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ बताते हुए डॉ. रमीज का बचाव किया था. विभागीय बैठक में भी डॉ. रमीज को निर्दोष बताने और मामले को अधिक तूल न देने की कोशिश किए जाने का दावा किया गया है. STF ने यह भी आरोप लगाया कि विभाग में रेजिडेंट डॉक्टरों की सूची श्रेणी के आधार पर तैयार कराई गई थी. रिपोर्ट में इस व्यवस्था और विभागीय निर्णयों को लेकर सवाल उठाए गए हैं.
डॉ. सुमायरा कयूम पर रेजिडेंट डॉक्टरों की छुट्टियों को मंजूरी देने में कथित भेदभाव करने का आरोप भी लगाया गया है. STF रिपोर्ट के मुताबिक, विभागाध्यक्ष ने छुट्टी से संबंधित अतिरिक्त जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी. रिपोर्ट में 2023 बैच की रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. सबीना का उदाहरण दिया गया है. आरोप है कि ट्रामा लैब में तैनाती के बावजूद उन्हें छुट्टी दे दी गई, जबकि उनकी जगह काम करने वाले डॉ. हर्षित जैन से अतिरिक्त ड्यूटी कराई गई और उनकी नकारात्मक रिपोर्टिंग की गई. STF के अनुसार, डॉ. हर्षित जैन ने छठ पूजा और अपने दादा-दादी के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अवकाश मांगा था. आरोप है कि उन्हें छुट्टी देने के बजाय अपमानजनक टिप्पणियां सुननी पड़ीं. इसके विपरीत मुस्लिम रेजिडेंट डॉक्टरों को नमाज, शादी और व्यक्तिगत कार्यों के लिए आसानी से छुट्टी दिए जाने का दावा रिपोर्ट में किया गया है.
रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग की बायोकेमिस्ट्री लैब के प्रभारी डॉ. वाहिद अली का नाम भी शामिल है. STF के मुताबिक, लैब परिसर में मौजूद HPLC लैब का इस्तेमाल कुछ मुस्लिम छात्रों और महिलाओं के बैठने तथा नमाज पढ़ने के लिए किया जाता था. डॉ. वाहिद अली पर मुस्लिम छात्रों के साथ बैठकें करने और डॉ. देवारती से जुड़े मामले में डॉ. रमीज का समर्थन करने का आरोप लगाया गया है. इसके अलावा, रिपोर्ट में कुछ मुस्लिम मरीजों की जांच मुफ्त श्रेणी में कराए जाने का दावा भी किया गया है. इन सभी बिंदुओं को लेकर STF ने विभागीय स्तर पर जांच की आवश्यकता जताई है.
STF की रिपोर्ट में ‘इस्लामिक मेडिकोज’ नाम के एक समूह का भी उल्लेख किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, इस समूह में KGMU और आगरा के सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज (SNMC) से जुड़े कुछ मुस्लिम मेडिकल छात्र और डॉक्टर शामिल थे. जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि समूह के नाम से एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसमें वर्ष 2012 से 2016 बैच तक के मुस्लिम मेडिकल छात्रों का विवरण दर्ज था. इसमें डॉ. रमीज, डॉ. रिजवान मलिक, डॉ. अदनान अंसारी और डॉ. सैम अनीस समेत कुछ अन्य नामों का उल्लेख किया गया है. STF का आरोप है कि समूह के सदस्य आपस में संपर्क बनाए रखते थे और नए मुस्लिम छात्रों को अपने नेटवर्क से जोड़ते थे. रिपोर्ट में कुछ सदस्यों के महिला रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ करीबी संबंधों का भी जिक्र है.
डॉ. रमीज पर कई महिला डॉक्टरों की मुलाकात समूह के सदस्यों से कराने का आरोप लगाया गया है. रिपोर्ट में डॉ. सैम अनीस को लेकर कथित तौर पर कही गई एक विवादित बात का भी उल्लेख है. हालांकि, इस तरह के दावों को जांच रिपोर्ट में दर्ज आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि प्रमाणित अपराध के रूप में.
STF ने KGMU के कुलपति के निजी सचिव एसए अब्बास की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, वह पहले विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में क्लर्क के पद पर कार्यरत थे और सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें कुलपति का निजी सचिव नियुक्त किया गया था. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. अब्बास अली मेहंदी के साथ उनके करीबी संबंध थे और विश्वविद्यालय में विवादों की जांच के लिए समितियां गठित करने तथा उनके सदस्यों के नाम सुझाने में उनकी भूमिका हो सकती थी. इसके अतिरिक्त, मेडिसिन विभाग के नेफ्रोलॉजिस्ट प्रोफेसर उस्मान कौसर का भी नाम रिपोर्ट में शामिल है. STF ने आरोप लगाया है कि वह मुस्लिम फैकल्टी और रेजिडेंट डॉक्टरों से जुड़े मामलों में सक्रिय भूमिका निभाते थे. मेडिसिन विभाग के डॉ. हैदर अब्बास और बायोकेमिस्ट्री विभाग के डॉ. अहमद तथा डॉ. कलीम की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है. इन सभी के संबंध में रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है.
STF की रिपोर्ट में इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के फिजियोलॉजी विभाग में कार्यरत डॉ. नसीम खान का भी जिक्र है. वह पहले KGMU के डेंटल विभाग से जुड़े थे. रिपोर्ट के मुताबिक, उन पर विश्वविद्यालय के कुछ मुस्लिम छात्रों के बीच इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक की विचारधारा का प्रचार करने का आरोप लगाया गया है. STF ने दावा किया है कि वर्ष 2013 में KGMU परिसर के जिम की दूसरी मंजिल पर एक स्थान का इस्तेमाल नमाज और इबादत के लिए किया जाने लगा था. रिपोर्ट में इस व्यवस्था के पीछे डॉ. नसीम खान की भूमिका होने का आरोप है. इस स्थान पर बाहरी मौलानाओं के आने और तकरीर करने का भी उल्लेख किया गया है.
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STF की जांच रिपोर्ट में डॉ. रमीज के खिलाफ दर्ज मुकदमे और विश्वविद्यालय की विशाखा कमेटी की जांच का भी उल्लेख है. रिपोर्ट के अनुसार, विशाखा कमेटी ने डॉ. रमीज को संबंधित आरोपों में दोषी पाया था. ADG अमिताभ यश ने शासन को भेजी रिपोर्ट में डॉ. रमीज के अलावा अन्य संबंधित डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ भी विभागीय जांच कराने तथा नियमानुसार कार्रवाई करने की सिफारिश की थी. रिपोर्ट मिलने के बाद शासन की ओर से KGMU के कुलपति और कुलसचिव को पत्र भेजकर संबंधित अध्यापकों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने और उसकी जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया है.
STF की रिपोर्ट के सामने आने के बाद KGMU का यह मामला एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मुकदमे से आगे बढ़कर विश्वविद्यालय के प्रशासनिक और विभागीय कामकाज से जुड़े गंभीर सवालों तक पहुंच गया है. इसमें महिला कर्मचारियों की सुरक्षा, शिकायत निवारण व्यवस्था, रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ समान व्यवहार और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही जैसे मुद्दे शामिल हैं. अब निगाहें KGMU प्रशासन और शासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं. विभागीय जांच में आरोपों की कितनी पुष्टि होती है और संबंधित अधिकारियों तथा कर्मचारियों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाते हैं, यह आने वाला समय बताएगा.
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