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सरदार पटेल की बेटी नहीं, अपनी अलग पहचान रखने वाली सेनानी थीं मणिबेन पटेल; जानिए उनके संघर्ष और देशसेवा की अनसुनी कहानी

देश की आजादी और राष्ट्रीय एकता की बात होती है, तो सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम सबसे पहले याद आता है. देश की सैकड़ों रियासतों को एक सूत्र में पिरोने वाले लौह पुरुष की जयंती पर पूरा देश उन्हें याद कर रहा है. 31 अक्टूबर को मनाए जाने वाले राष्ट्रीय एकता दिवस के मौके पर उनके योगदान की चर्चा भी स्वाभाविक है. लेकिन सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी एक ऐसी शख्सियत भी हैं, जिनका योगदान अक्सर इतिहास की चर्चाओं में पीछे छूट जाता है. ये थीं उनकी बेटी मणिबेन पटेल.

मणिबेन की पहचान आमतौर पर सरदार पटेल की पुत्री के रूप में ही की जाती रही है, जबकि उनका अपना राजनीतिक और सामाजिक जीवन भी बेहद प्रेरणादायक रहा. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, जेल की यातनाएं सहीं, पिता के साथ देश के महत्वपूर्ण राजनीतिक दौर को करीब से देखा और आजाद भारत की राजनीति में भी अपनी भूमिका निभाई.

लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा की पुस्तक मणिबेन पटेल: एक जुनूनी सेनानी, प्रखर जनप्रतिनिधि और विचारक की अंतयात्रा (पेंगुइन स्वदेश) इसी भूले-बिसरे व्यक्तित्व को सामने लाने की कोशिश करती है. पुस्तक में मणिबेन के जीवन के उन पहलुओं का जिक्र है, जो बताते हैं कि वे केवल एक बड़े नेता की बेटी नहीं, बल्कि अपने विचारों और सिद्धांतों पर चलने वाली स्वतंत्र व्यक्तित्व की धनी महिला थीं.

बचपन से ही सादगी और गांधीवादी विचारों का प्रभाव

मणिबेन पटेल का जन्म गुजरात के करमसाद में 1903-04 के आसपास हुआ था. बचपन में ही उनकी मां झवेरबा का निधन हो गया. इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके चाचा विट्ठलभाई पटेल ने किया. उन्होंने मुंबई के क्वीन मैरी हाईस्कूल में पढ़ाई की और आगे चलकर गांधीजी की ओर से स्थापित गुजरात विद्यापीठ से स्नातक की शिक्षा पूरी की.

महात्मा गांधी के विचारों का मणिबेन पर गहरा असर पड़ा. उन्होंने खादी पहनना शुरू किया और चरखा कातने को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया. उनकी सादगी केवल दिखावे तक सीमित नहीं थी. वे अपने पिता के लिए भी खुद सूत कातकर कपड़े तैयार करती थीं. उनके जीवन में दिखावा, आराम और निजी सुख-सुविधाओं के बजाय अनुशासन और सेवा को ज्यादा महत्व मिला.

आजादी की लड़ाई में निभाई अहम भूमिका

मणिबेन ने स्वतंत्रता आंदोलन को केवल दूर से नहीं देखा, बल्कि उसमें सक्रिय रूप से हिस्सा लिया. बारदोली सत्याग्रह से लेकर नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन तक उनकी भागीदारी रही. उन्होंने आंदोलन के दौरान महिलाओं को एकजुट करने और उन्हें आजादी की लड़ाई से जोड़ने का काम किया.

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन्हें पुणे की यरवड़ा जेल में रखा गया, जहां वे 1945 तक बंद रहीं. जेल का जीवन आसान नहीं था, लेकिन मणिबेन ने वहां भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. प्रार्थना, चरखा और नियमित दिनचर्या उनके जीवन का हिस्सा बने रहे. वे जेल में बीमार साथियों की देखभाल भी करती थीं.

उनका यह व्यवहार दिखाता है कि उनके लिए स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं था, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका था.

पिता की सबसे भरोसेमंद साथी बनीं मणिबेन

1930 के दशक से मणिबेन ने सरदार पटेल की निजी सहायक और सचिव के रूप में काम करना शुरू कर दिया था. धीरे-धीरे वे उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन गईं. राजनीतिक बैठकों से लेकर निजी मुलाकातों तक, वे अक्सर अपने पिता के साथ मौजूद रहती थीं.

मणिबेन की एक खास आदत थी. वे दिनभर की गतिविधियों, बैठकों, मुलाकातों और महत्वपूर्ण बातचीत को अपनी डायरी में दर्ज करती थीं. बाद में यही नोट्स ऐतिहासिक महत्व के साबित हुए. उनकी डायरी पर आधारित सामग्री Inside Story of Sardar Patel के नाम से प्रकाशित हुई, जिससे सरदार पटेल के जीवन और आजादी के बाद लिए गए कई अहम फैसलों को समझने में मदद मिलती है.

सरदार पटेल भी मणिबेन की भूमिका को अच्छी तरह समझते थे. उन्होंने उन्हें केवल अपनी बेटी नहीं, बल्कि अपना मजबूत सहारा माना था. मणिबेन ने विवाह नहीं किया और अपना पूरा जीवन पिता की देखभाल तथा देशसेवा को समर्पित कर दिया.

पिता के निधन के बाद भी नहीं बदले जीवन के सिद्धांत

15 दिसंबर 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन हो गया. उनके जाने के बाद मणिबेन के सामने जीवन का एक नया दौर शुरू हुआ. लेकिन इस मुश्किल समय में भी उन्होंने अपने पिता के सिद्धांतों का पालन किया.

पुस्तक में एक महत्वपूर्ण प्रसंग का जिक्र है. सरदार पटेल के निधन के बाद मणिबेन ने उनके निर्देशों के मुताबिक कांग्रेस पार्टी के 35 लाख रुपये और उनसे संबंधित हिसाब-किताब की किताबें जवाहरलाल नेहरू को सौंप दीं. यह घटना उनकी ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है.

पिता के निधन के बाद भी उन्होंने अपनी जीवनशैली नहीं बदली. अहमदाबाद की सड़कों पर उन्हें अक्सर अकेले पैदल चलते देखा जाता था. न कोई खास दिखावा, न सत्ता का रौब और न ही सुविधाओं की मांग. खादी के कपड़े और बेहद साधारण रहन-सहन ही उनकी पहचान बने रहे.

संसद में भी उठाती रहीं आम लोगों की आवाज

मणिबेन का राजनीतिक सफर आजादी के बाद भी जारी रहा. उन्होंने चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया और संसद तक पहुंचीं. 1952 और 1957 में वे कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा के लिए चुनी गईं. बाद में कांग्रेस में विभाजन हुआ तो उन्होंने कांग्रेस (ओ) का साथ दिया.

इसके बाद वे जनता पार्टी से जुड़ीं और 1977 में गुजरात की मेहसाणा सीट से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं. संसद में उन्होंने नागरिक अधिकारों और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखी. वे उन नेताओं में शामिल थीं, जिनके लिए राजनीति केवल पद हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के प्रति जिम्मेदारी निभाने का रास्ता थी.

राजनीति के अलावा मणिबेन कई सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं से भी जुड़ी रहीं. गुजरात विद्यापीठ, वल्लभ विद्यानगर, बारदोली स्वराज आश्रम और नवजीवन ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के साथ उनका जुड़ाव रहा. इन गतिविधियों के जरिए उन्होंने शिक्षा, समाजसेवा और गांधीवादी विचारों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया.

26 मार्च 1990 को मणिबेन पटेल का निधन हो गया. उनके जाने के साथ भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन की एक ऐसी शख्सियत का सफर समाप्त हुआ, जिसने हमेशा सादगी और सिद्धांतों को प्राथमिकता दी.

इतिहास में मणिबेन को भी मिलनी चाहिए उनकी सही जगह

राजगोपाल सिंह वर्मा की यह पुस्तक मणिबेन पटेल के जीवन को एक नए नजरिए से देखने का मौका देती है. गांधीवादी लेखक अरविंद मोहन ने भी इस पुस्तक की सराहना करते हुए इसे सरदार पटेल और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित एक ऐसी महिला की कहानी बताया है, जिसने संघर्ष और सादगी को अपने जीवन का आधार बनाया.

दरअसल, इतिहास में अक्सर बड़े नेताओं के नाम और उनके फैसले तो याद रखे जाते हैं, लेकिन उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले लोगों की कहानियां कहीं पीछे छूट जाती हैं. मणिबेन की जिंदगी भी कुछ ऐसी ही कहानी है. उन्होंने न तो अपने पिता की लोकप्रियता का लाभ उठाने की कोशिश की और न ही सत्ता और सुविधाओं को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया.

आज राष्ट्रीय एकता दिवस पर जब देश सरदार पटेल के योगदान को याद कर रहा है, तब मणिबेन पटेल की कहानी को जानना भी उतना ही जरूरी है. उनका जीवन बताता है कि देश के निर्माण में केवल बड़े पदों पर बैठे लोगों की भूमिका नहीं होती, बल्कि पर्दे के पीछे रहकर लगातार काम करने वाले लोगों का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है.

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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