देश

ऐतिहासिक क्षण: डॉ. मेनका गुरुस्वामी बनीं भारत की पहली LGBTQ+ सांसद

आज का दिन भारत की राजनीति में एक मील का पत्थर साबित होने वाला बन गया. सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील डॉ. मेनका गुरुस्वामी राज्यसभा में शपथ लेकर नया इतिहास रच दिया. वे भारत की पहली खुलकर LGBTQ+ समुदाय से जुड़ी संसद सदस्य बन गई हैं. तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से पश्चिम बंगाल से निर्वाचित होने वाली गुरुस्वामी ने राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन के समक्ष शपथ ली.

यह घटना न केवल भारतीय लोकतंत्र के लिए, बल्कि LGBTQ+ समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है. दशकों से समानता और समावेशन की लड़ाई लड़ने वाली गुरुस्वामी अब संसद के उच्च सदन में अपनी आवाज बुलंद करेंगी.

कौन हैं मेनका गुरुस्वामी?

डॉ. मेनका गुरुस्वामी संवैधानिक कानून की प्रमुख विशेषज्ञ हैं. उन्होंने 2018 में सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक सेक्शन 377 मामले में अहम भूमिका निभाई थी, जिसने भारत में समलिंगी संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया था. वे मानवाधिकार, समानता और संवैधानिक मूल्यों की मजबूत पैरोकार रही हैं. पश्चिम बंगाल सरकार के कई महत्वपूर्ण मामलों में भी उन्होंने राज्य का प्रतिनिधित्व किया है, जिसमें आर.जी. कर अस्पताल कांड भी शामिल है.

फरवरी 2026 में TMC ने उन्हें राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित किया था. 16 मार्च को हुए चुनाव में वे निर्विरोध चुनी गईं.

LGBTQ+ समुदाय के लिए नया अध्याय

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में संसद में LGBTQ+ समुदाय की खुली प्रतिनिधित्व पहली बार हुआ है. यह कदम न केवल समुदाय के लाखों सदस्यों को उम्मीद देगा, बल्कि राजनीतिक दलों को भी समावेशी सोच अपनाने के लिए प्रेरित करेगा. TMC प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस फैसले को प्रगतिशील राजनीति का प्रतीक बताया है.

गुरुस्वामी ने शपथ के बाद कहा कि वे समानता, भाईचारे और भेदभाव-रहित समाज के लिए काम करेंगी. उनकी उपस्थिति संसद में LGBTQ+ मुद्दों, समान अधिकारों और सामाजिक न्याय पर चर्चा को नई दिशा देगी.

वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित LGBTQ+ समुदाय पर आधारित कुछ प्रमुख पुस्तकों की संक्षिप्त चर्चा.

  • मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी! — लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी
    हिजड़ा एक्टिविस्ट लक्ष्मी की सशक्त आत्मकथा. पहचान, सम्मान, संघर्ष और समाज की स्वीकृति की मार्मिक कहानी. यह पुस्तक ट्रांसजेंडर जीवन की सबसे चर्चित हिंदी किताबों में से एक है.
  • मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है — विजयराजमल्लिका (अनुवाद: सुमा एस.)
    ट्रांसजेंडर लेखिका की जीवनी/आत्मकथा. समाज की नजर में ‘अन्य’ होने के दर्द, प्रतिरोध और आत्मसम्मान को छूती हुई किताब.
  • यह दिल है कि चोर दरवाजा — किनशुक गुप्ता
    आधुनिक हिंदी में क्वियर शॉर्ट स्टोरीज़ का उत्कृष्ट संग्रह. प्रेम, इच्छा, रोजमर्रा की चुनौतियां और सामाजिक दबावों को संवेदनशील भाषा में बयान करती कहानियाँ.
  • सतरंगी भाषा— एवियन वी (AVIAN WE)
    क्वियर समुदाय के लिए हिंदी में सही सर्वनाम, शब्दावली और संवेदनशील भाषा-प्रयोग की व्यावहारिक गाइड. लेखकों, शिक्षकों और मीडिया के लिए बहुत उपयोगी.
  • क्वियर विमर्श: लेस्बियन, गे, बाई-सेक्सुअल, ट्रांसजेंडर — के. वनजा
    क्वियर सिद्धांत की बुनियादी समझ, लैंगिकता की तरलता और भारतीय संदर्भ में क्वियर पहचान पर विमर्शात्मक किताब.
  • लल्लन मिस — रमा पाण्डेय
    किन्नर/ट्रांस समुदाय की ज़िंदगी और सामाजिक वास्तविकता पर आधारित.
  • किन्नर: सेक्स और सामाजिक स्वीकार्यता— प्रियंका नारायण
    किन्नर समुदाय की यौनिकता और समाज में स्वीकार्यता के मुद्दों पर.
  • हिंदी साहित्य में किन्नर जीवन — संपादक: डॉ. दिलीप मेहरा
    हिंदी साहित्य में किन्नर/ट्रांस पात्रों और उनके चित्रण का साहित्यिक-समालोचनात्मक अध्ययन.
  • रानी आओ रानी रानी (जीवन मिथ्या) — होशांग मर्चट (अनुवाद: रेयाजुल हक)
    क्वियर कविता और विमर्श का अनुवादित संग्रह. प्रेम, शरीर और सामाजिक मिथ्याओं पर गहरा चिंतन.
  • तीसरी ताली: किन्नर समाज — पार्वती कुमारी
    किन्नर समुदाय पर सामाजिक-ऐतिहासिक दृष्टि.

ये पुस्तकें हिंदी में क्वियर साहित्य को सिर्फ ‘मुद्दा’ नहीं, बल्कि साहित्यिक धारा बनाती हैं. वाणी प्रकाशन का यह प्रयास समुदाय को अपनी कहानियां खुद बताने का मंच देता है और समाज में समावेश की भावना को बढ़ावा देता है.

राजनीतिक संदर्भ

TMC ने इस नामांकन को लेकर कोई समझौता नहीं किया. पार्टी ने स्पष्ट संदेश दिया कि वह समावेशन और प्रगति में विश्वास रखती है. विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने भी इस ऐतिहासिक कदम का स्वागत किया है. हालांकि कुछ विश्लेषक प्रतिनिधित्व की राजनीति की सीमाओं पर भी चर्चा कर रहे हैं, लेकिन गुरुस्वामी की पृष्ठभूमि और कानूनी विशेषज्ञता इसे एक मजबूत और सार्थक कदम बनाती है. यह घटना भारत के लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाती है. जहां एक समय सेक्शन 377 जैसे कानून समुदाय को दबाते थे, वहीं आज उसी लड़ाई की अगुवाई करने वाली वकील संसद पहुंच गई हैं.

भारत की राजनीति अब और अधिक समावेशी दिख रही है. यह पल याद दिलाता है कि लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब हर वर्ग की आवाज संसद तक पहुंचे.

ये भी पढ़ें: खत्म हुआ इंतजार! दिल्ली में अब मिलेगा घर का मालिकाना हक, जानें क्या है नया मास्टर प्लान

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

Recent Posts

आधी आबादी, पूरी पहचान: क्या महिलाओं को बाहर रखकर तालिबान को वैध सरकार माना जा सकता है?

अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के दौरान महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक…

2 minutes ago

CM धामी के जन्मदिन पर अमित शाह का खास संदेश, उत्तराखंड के विकास और संस्कृति की तारीफ

Amit Shah Birthday Wishes: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह…

11 minutes ago

जड़ी-बूटियों से AI तक: ICABB 2027 में लिखी जाएगी नई इबारत, JIIT में जुटेंगे दुनियाभर के वैज्ञानिक

जेपी इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (JIIT) नोएडा में 28-30 जनवरी 2027 को 10वां ICABB कॉन्फेंस…

18 minutes ago

ट्रंप का 100% टैरिफ, भारत का दो टूक जवाब- ‘दबाव में नहीं झुकेंगे’

रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ की अमेरिकी प्रस्तावित…

25 minutes ago

17 सितंबर को ही क्यों मनाई जाती है विश्वकर्मा पूजा? जानिए पौराणिक मान्यता और वजह

Vishwakarma Puja 17 September Reason: हर साल 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा की पूजा की…

31 minutes ago

बीकानेर की महाजन रेंज में अमेरिकी फौज का पड़ाव, जानिए कौन-सी आधुनिक तकनीकें होंगी टेस्ट?

Defense News: बीकानेर की महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में भारत और अमेरिका का 22वां संयुक्त…

38 minutes ago