प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार सुबह प्राचीन भारतीय ज्ञान और नैतिक मूल्यों को रेखांकित करते हुए एक विशेष संस्कृत सुभाषित साझा किया. इस संदेश के माध्यम से प्रधानमंत्री ने देशवासियों को निस्वार्थ सेवा और बिना किसी अपेक्षा के दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित किया है.
प्रधानमंत्री ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रकृति के उदाहरणों को देते हुए सज्जनों के स्वभाव के बारे में बताया. उन्होंने लिखा,
‘पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम् । नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः ।।’
साझा किए गए इस सुभाषित का अर्थ समझाते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि जिस प्रकार सूर्य को कमल खिलाने के लिए किसी के अनुरोध की आवश्यकता नहीं होती, चंद्रमा स्वयं कुमुदिनी को विकसित करता है और बादल बिना किसी प्रार्थना के प्यासी धरती पर जल बरसाते हैं; ठीक उसी प्रकार, जो सच्चे और सज्जन पुरुष होते हैं, वे बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के दूसरों के कल्याण में जुटे रहते हैं.
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया ये सुभाषित इस बात पर जोर देता है कि सेवा का भाव स्वाभाविक होना चाहिए, न कि किसी के कहने या दबाव में.
अपनी पोस्ट के साथ प्रधानमंत्री ने एक विशेष एनिमेटेड वीडियो भी साझा किया है. लगभग 62 सेकंड के इस वीडियो में शांत कमल सरोवर और प्रकृति के सुंदर दृश्यों के साथ सुभाषित का मूल पाठ, हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद प्रदर्शित किया गया है. वीडियो का शांत संगीत और गंभीर स्वर पाठकों को प्राचीन भारतीय दर्शन से जोड़ने का काम कर रहा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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