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क्या आंकड़ों के खेल में उलझ गया है राजस्थान का विकास? जानें क्यों 5,000 KM सड़क बनने के बाद भी गुस्से में है जनता!

Rajasthan development model issues: राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार एक ओर बुनियादी ढांचे के रिकॉर्ड विस्तार और 95% बजट उपयोगिता का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर इस “विकास मॉडल” (Rajasthan Development) की मजबूती पर गंभीर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं. दरअसल सरकारी आंकड़े भले ही हजारों किलोमीटर सड़क निर्माण की गुलाबी तस्वीर पेश करें लेकिन धरातल पर गुणवत्ता, क्षेत्रीय भेदभाव और अधूरे वादों की दरारें अब साफ दिखाई देने लगी हैं. इसको लेकर आलोचकों का कहना है कि आंकड़ों की बाजीगरी के बीच आम जनता को मिलने वाला वास्तविक लाभ अभी भी कोसों दूर है.

रफ्तार की होड़ में गुणवत्ता से समझौता?

लोक निर्माण विभाग (PWD) ने दावा किया है कि राज्य में 5,000 किलोमीटर से अधिक नई सड़कों का जाल बिछाया गया है और हजारों किलोमीटर पुरानी सड़कों को अपग्रेड किया गया है. लेकिन इस ‘तेज रफ्तार’ निर्माण की पोल तब खुल जाती है जब कई जिलों से मानसून की पहली बारिश में ही सड़कों के बह जाने या कुछ ही महीनों में गड्डों में तब्दील होने की खबरें आती हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि निर्माण का लक्ष्य (Target) पूरा करने की जल्दबाजी में गुणवत्ता मानकों की अनदेखी की जा रही है. अगर मेंटेनेंस और गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में यह ‘विकास’ सरकारी खजाने पर मरम्मत का भारी बोझ बन जाएगा.

बांसवाड़ा: आजादी के दशकों बाद भी रेल की पटरी का इंतजार

भजनलाल सरकार के विकास मॉडल पर सबसे बड़ा प्रहार राजस्थान का आदिवासी बहुल वागड़ क्षेत्र करता है. विशेषकर बांसवाड़ा जिला आज भी देश के उन चुनिंदा अभागे इलाकों में शामिल है, जिसे आजादी के 75 वर्षों बाद भी रेल कनेक्टिविटी (Banswara Rail Connectivity) नहीं मिल सकी है. इस क्षेत्र के लोग आज भी रेल के लिए डूंगरपुर, उदयपुर या मध्य प्रदेश के रतलाम स्टेशन पर निर्भर हैं.

स्थानीय लोगों का दर्द है कि सरकारें आती-जाती हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन बांसवाड़ा की पटरी हमेशा कागजों में ही दबी रह जाती है. यह स्थिति दर्शाती है कि विकास का पहिया राज्य के चुनिंदा हाई-प्रोफाइल शहरों तक ही सीमित है और आदिवासी बेल्ट आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है.

भूमि अधिग्रहण और फाइलों में दबे प्रोजेक्ट्स

सरकार बड़े-बड़े एक्सप्रेसवे और मेगा प्रोजेक्ट्स की घोषणा तो कर देती है, लेकिन धरातल पर उन्हें उतारना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं आज भी केवल डीपीआर (DPR) स्तर पर ही अटकी हुई हैं. लंबी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया, मुआवजे को लेकर स्थानीय किसानों का विरोध और प्रशासनिक सुस्ती ने घोषणा और क्रियान्वयन के बीच एक लंबी खाई खोद दी है. आलोचकों का सवाल है कि जब तक प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे नहीं होंगे, तब तक केवल बजट खर्च करने को ‘उपलब्धि’ कैसे माना जा सकता है?

समावेशी विकास या सिर्फ निर्माण की होड़?

राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर (Rajasthan Development) पर निवेश तो बढ़ा है, लेकिन इसका सीधा लाभ स्थानीय युवाओं और रोजगार सृजन में नजर नहीं आ रहा है. यह विकास मॉडल ‘कंस्ट्रक्शन-ड्रिवन’ (निर्माण आधारित) तो है, लेकिन ‘इंक्लूसिव’ (समावेशी) नहीं. स्थायी रोजगार की कमी और स्थानीय युवाओं की अनदेखी ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं.

इसके अलावा सरकार का पूरा फोकस नए प्रोजेक्ट्स लॉन्च करने की होड़ में दिख रहा है, जबकि पुरानी सड़कों की मरम्मत और नियमित रखरखाव को हाशिए पर धकेल दिया गया है. जनता अब केवल नए शिलान्यास नहीं, बल्कि पुराने प्रोजेक्ट्स की मजबूती और समान विकास की मांग कर रही है.

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-भारत एक्सप्रेस

नतांश पटेल

Crime and political journalist with 5+ years of experience, currently serving as Bureau In-Charge, Rajasthan at Bharat Express News Network. Known for leading editorial teams, delivering high-impact interviews, and driving audience growth through sharp content strategy.

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