Himalaya Cloudburst Explainer: सुबह की मखमली धूप, धुंध की चादर में लिपटी हरी-भरी वादियां और चीड़ के जंगलों से छनकर आती ठंडी हवाएं पहाड़ों का यह सौंदर्य हर किसी को सम्मोहित करता है. लेकिन पिछले डेढ़ दशक से पहाड़ों की इन खूबसूरत वादियों में एक ऐसा खामोश और खौफनाक बारूद पक रहा है, जो मानसून की एक ही बारिश में ‘जलप्रलय’ बनकर पूरी इंसानी आबादी को लील जाता है. हाल के वर्षों में लेह से लेकर केदारनाथ, हिमाचल और उत्तरकाशी तक आई प्राकृतिक आपदाएं महज ‘इत्तेफाक’ या ‘ईश्वरीय प्रकोप’ नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पैरों के नीचे खिसकती जमीन और कराहते हिमालय की एक चेतावनी है.
पहाड़ों पर पिछले 15 वर्षों में आई इस आसमानी आफत ने विकास और पर्यावरण के संतुलन पर एक बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है. आइए आंकड़ों की गवाही के साथ समझते हैं कि आखिर क्यों बार-बार फट रहे हैं बादल और क्यों हमारा संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र विनाश के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है?
पिछले 15 वर्षों का इतिहास गवाह है कि पहाड़ों पर बादल फटने और जलप्रलय की घटनाओं ने हजारों हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया है. आंकड़ों का यह स्याह पन्ना किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कंपाने के लिए काफी है.
अगस्त 2010 (लेह का महा-बादल फटना): लद्दाख के लेह में प्रकृति ने ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि अचानक फटे बादल के कारण पूरा शहर मलबे में तब्दील हो गया और 250 से 600 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई.
सितंबर 2012 (उत्तरकाशी आपदा): उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बादल फटने से आई भीषण बाढ़ की चपेट में आने से करीब 45 लोगों की जान चली गई.
जून 2013 (केदारनाथ की ऐतिहासिक तबाही): आधुनिक भारत की सबसे बड़ी प्राकृतिक त्रासदियों में से एक, केदारनाथ जलप्रलय. मंदाकिनी नदी के उफान और चोराबारी ग्लेशियर झील के टूटने से 5000 से ज्यादा लोग काल के गाल में समा गए.
सितंबर 2014 (कश्मीर घाटी का प्रलय): कश्मीर घाटी में अचानक फटे बादल और बाढ़ की चपेट में आने से करीब 200 लोग असमय काल कवलित हो गए.
अगस्त 2019 (आराकोट का हाहाकार): उत्तरकाशी के आराकोट में मूसलाधार बारिश और बादल फटने की घटना ने 21 लोगों की जिंदगी छीन ली.
साल 2025 (धराली और मंडी की आफत): हाल ही में बीते वर्ष 2025 में भी प्रकृति का कहर थमा नहीं. उत्तराखंड के धराली में आई भीषण आपदा में 68 लोगों की मौत हुई, जबकि पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश के मंडी में बादल फटने से 15 लोगों की जान चली गई.
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, पूरा हिमालयी क्षेत्र (Himalayan Belt) दुनिया का सबसे युवा और अति-संवेदनशील टेक्टोनिक ज़ोन है. इस क्षेत्र में लगातार छोटे-छोटे भूकंप आते रहते हैं. आम जनता को लगता है कि इन हल्के झटकों से कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन भूगर्भ के भीतर ये छोटे भूकंप साइलेंट किलर का काम करते हैं.
हल्के झटके आंतरिक भूगर्भीय चट्टानों को अंदर ही अंदर तोड़ते और कमजोर करते रहते हैं. जब चट्टानें खोखली हो जाती हैं, तो मानसून के समय अत्यधिक बारिश होते ही भूस्खलन (Landslide) की संभावना कई गुना बढ़ जाती है और पूरा पहाड़ ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है.
वैश्विक तापमान (Global Warming) में हो रही लगातार बढ़ोतरी ने हिमालय के बर्फानी पिरामिडों यानी ग्लेशियरों को बुरी तरह पिघलाना शुरू कर दिया है. ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण पहाड़ों की अत्यधिक ऊंचाई पर विशाल झीलों का निर्माण हो रहा है. ये झीलें उन दुर्गम जगहों पर बन रही हैं, जहां इनका होना प्राकृतिक रूप से सुरक्षित नहीं है.
जब भी इन ऊंचाई वाले इलाकों में भारी बारिश होती है या कोई बड़ा भूस्खलन होता है, तो ये प्राकृतिक झीलें अपनी क्षमता से अधिक पानी होने के कारण अचानक टूट जाती हैं. इसके बाद मिट्टी, बड़े-बड़े पत्थर और मलबे का एक खौफनाक सैलाब तेजी से नीचे की ओर बहता है और पहाड़ों की तलहटी में बसी इंसानी बस्तियों को चंद मिनटों में मलबे के ढेर में तब्दील कर देता है.
प्रकृति तो अपना काम कर ही रही है, लेकिन पहाड़ों पर आ रही इस विनाशकारी आफत की रफ्तार को दोगुना करने में खुद इंसानी गतिविधियां सबसे बड़ी जिम्मेदार हैं.
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पहाड़ों का यह खूनी इतिहास चीख-चीख कर कह रहा है कि यदि हमने अब भी प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया, तो आने वाले समय में यह तबाही और अधिक भयावह रूप अख्तियार कर लेगी. विकास समय की मांग है, लेकिन ऐसा विकास किस काम का जो हजारों इंसानी जिंदगियों की कीमत पर मिले? हिमालय को बचाने के लिए हमें कड़े पर्यावरणीय नियमों, वैज्ञानिक निर्माण पद्धतियों और वनों के संरक्षण को युद्ध स्तर पर अपनाना होगा.
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