अंतरिक्ष में शरीर पर पड़ने वाले असर
Microgravity Impact on Human Body: अगर आप धरती से बाहर निकलकर अंतरिक्ष में चले जाएं तो आपका शरीर कई बदलाव झेलता है. पिछले 50 साल से NASA का ह्यूमन रिसर्च प्रोग्राम इसी पर काम कर रहा है. यह समझना चाहता है कि स्पेस में इंसान का शरीर क्या-क्या बदलाव महसूस करता है.
इस रिसर्च से एस्ट्रोनॉट्स को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है. स्पेसक्राफ्ट और स्पेससूट को बेहतर बनाया जाता है. फिटनेस, खान-पान और मानसिक स्वास्थ्य के प्रोग्राम तैयार किए जाते हैं. अब मिशन सिर्फ लो-अर्थ ऑर्बिट तक नहीं बल्कि चांद और मंगल तक जा रहे हैं. इसलिए लंबे समय तक स्पेस में रहने के असर को समझना बहुत जरूरी हो गया है.
NASA का आर्टेमिस प्रोग्राम चांद पर एस्ट्रोनॉट्स उतारने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए ज्यादा डेटा इकट्ठा किया जा रहा है. स्कॉट केली और क्रिस्टीना कोच जैसे एस्ट्रोनॉट्स ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर लगभग एक साल बिताया. यह पहले के औसत से दोगुना समय था.
NASA ने स्पेस में शरीर पर पड़ने वाले मुख्य खतरों को ‘रीज’ नाम दिया है. यह एक शॉर्ट फॉर्म है. आरआईडीजीई मतलब स्पेस रेडिएशन, आइसोलेशन और कॉन्फिनमेंट, डिस्टेंस फ्रॉम अर्थ, ग्रैविटी फिल्ड और होस्टाइल या क्लोज्ड एनवायरमेंट. ये पांच जोखिम एस्ट्रोनॉट्स की सेहत के लिए सबसे बड़े खतरे हैं.
इनमें सबसे खतरनाक स्पेस रेडिएशन है. धरती पर मैग्नेटिक फील्ड और वायुमंडल हमें हानिकारक पार्टिकल्स से बचाते हैं. लेकिन स्पेस में एस्ट्रोनॉट्स तीन मुख्य स्रोतों से रेडिएशन झेलते हैं. पहला पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड में फंसे पार्टिकल्स. दूसरा सूरज से आने वाली सोलर एनर्जेटिक पार्टिकल्स. तीसरा गैलेक्टिक कॉस्मिक रेज जो बहुत मुश्किल से रोके जा सकते हैं.
लंबे समय तक रेडिएशन के संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा बढ़ता है. दिल की बीमारियां और मोतियाबिंद जैसी डीजेनेरेटिव बीमारियां भी हो सकती हैं. जानवरों और सेल स्टडीज से पता चला है कि स्पेस का रेडिएशन धरती के रेडिएशन से ज्यादा खतरनाक होता है.
छह महीने के स्पेस स्टेशन मिशन की तुलना में चांद और मंगल मिशन बहुत लंबे होते हैं. इसलिए कुल रेडिएशन डोज ज्यादा मिलती है. स्वास्थ्य जोखिम भी बढ़ जाते हैं.
NASA नए रेडिएशन डिटेक्टर बना रहा है. इससे रेडिएशन की मात्रा और प्रकार का बेहतर पता चल सकेगा. शील्डिंग, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और स्पेशल प्रोसीजर से जोखिम कम करने की कोशिश जारी है.
स्पेस में छह महीने या सालों तक रहने वाले मिशन में जोखिम अलग-अलग होते हैं. NASA इन अंतर को समझकर डीप स्पेस मिशन के लिए बेहतर तैयारी कर रहा है. इससे आने वाले दशकों में एस्ट्रोनॉट्स सुरक्षित रह सकेंगे.
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