बिहार की राजधानी पटना की धरती ने भारतीय लोकतंत्र और स्वतंत्रता संग्राम के कई निर्णायक मोड़ देखे हैं. पटना का इतिहास केवल चुनावी गुणा-गणित का नहीं है, बल्कि यह वह शहर है जो उपनिवेशवाद विरोधी राजनीति, जन-आंदोलनों और बौद्धिक चेतना का मुख्य केंद्र बिंदु बना. वर्ष 1912 में जब बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग कर एक नया प्रांत बनाया गया, तो पटना को उसकी राजधानी घोषित किया गया. इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में पटना के बांकीपुर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का 27वां वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसने इस शहर को राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के नक्शे पर एक नई पहचान दी.
पटना ने वकीलों, छात्रों, पत्रकारों, किसानों और शहरी बुद्धिजीवियों को एक मंच पर लाकर ऐसा राजनीतिक आधार तैयार किया, जहां से राष्ट्रवाद के विचार केवल भाषणों तक सीमित न रहकर कमेटियों, विशाल धरनों और जन-आंदोलनों में तब्दील हो गए.
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार कांग्रेस एक शक्तिशाली आंदोलनकारी शक्ति के रूप में इसलिए उभरी, क्योंकि उसने राष्ट्रीय आजादी के लक्ष्य को स्थानीय जनसमस्याओं और किसानों के दर्द से मजबूती से जोड़ा. इस दौर में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मजहरुल हक, हसन इमाम और सच्चिदानंद सिन्हा जैसे कद्दावर नेताओं ने आंदोलन की कमान संभाली.
बिहार कांग्रेस का यह जन-प्रभाव मुख्य रूप से तीन शक्तियों के तालमेल पर टिका था:
पटना का ‘सदाकत आश्रम’ बिहार कांग्रेस के इतिहास का सबसे जीवंत और प्रतीकात्मक अध्याय रहा है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह स्वाधीनता सेनानियों की रणनीति और बैठकों का मुख्य गढ़ था. बाद में यह बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी का आधिकारिक मुख्यालय बना. देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद अपने जीवन के अंतिम दिन इसी आश्रम में सादगी से बिताए थे. सदाकत आश्रम उस स्वर्णिम दौर की याद दिलाता है जब राजनीति में नैतिक सत्ता और त्याग सबसे ऊपर माने जाते थे.
पटना केवल पारंपरिक राजनीति का केंद्र नहीं था, बल्कि वैचारिक प्रयोगों की एक खुली प्रयोगशाला भी था. वर्ष 1934 में पटना में ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ (CSP) की औपचारिक नींव पड़ी, जिसने मुख्यधारा की कांग्रेस के भीतर एक वामपंथी और समाजवादी विंग के रूप में काम करना शुरू किया. जयप्रकाश नारायण (जेपी), आचार्य नरेंद्र देव और राममनोहर लोहिया जैसे विचारकों ने किसानों, मजदूरों, आर्थिक विषमता और स्वतंत्र भारत के भावी स्वरूप पर व्यापक बहस छेड़ी. इससे साबित होता है कि उस समय की बिहार कांग्रेस एकरस नहीं थी, बल्कि उसमें नरमपंथी, समाजवादी, जन-नेता और स्थानीय संगठनकर्ता एक साथ संवाद करते थे.
स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में कांग्रेस बिहार की सत्ता पर काबिज रही, लेकिन धीरे-धीरे उसका सामाजिक और संगठनात्मक आधार दरकता गया. यह पतन अचानक नहीं हुआ, बल्कि एक क्रमिक प्रक्रिया का परिणाम था:
नेतृत्व का शून्य: आजादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी के शीर्ष नेताओं के अवसान के बाद पार्टी में आंतरिक गुटबाजी हावी हो गई और सर्वमान्य जनाधार वाले नेताओं की कमी खलने लगी.
पिछड़ी जातियों और समाजवाद का उभार: 1960 और 1970 के दशक में लोहिया और बाद में जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन से राज्य में गैर-कांग्रेसी राजनीति को ऊर्जा मिली. पिछड़ी और वंचित जातियों की राजनीतिक आकांक्षाओं ने पारंपरिक उच्च-वर्गीय कांग्रेसी नेटवर्क को सीधी चुनौती दी.
संगठन का क्षरण: जमीनी स्तर (बूथ और प्रखंड) पर पार्टी का सांगठनिक ढांचा कमजोर होता गया और कार्यकर्ता जनता की नई अपेक्षाओं से कटते चले गए.
क्षेत्रीय दलों का उदय: 1990 के दौर में ‘मंडल आंदोलन’ और सामाजिक न्याय की राजनीति के बाद जनता दल (और बाद में राजद व जदयू) जैसे क्षेत्रीय दलों ने जन्म लिया, जिन्होंने जनता के जातीय व सामाजिक सरोकारों को सीधे संबोधित किया. नतीजतन, गौरवशाली अतीत वाली कांग्रेस राज्य की चुनावी राजनीति में सहयोगी की भूमिका तक सिमट गई.
पटना और बिहार कांग्रेस का यह इतिहास आज भी एक बड़ा राजनीतिक सबक देता है. यह इतिहास याद दिलाता है कि किसी भी राजनीतिक दल की महानता केवल उसके ऐतिहासिक बलिदानों या अतीत की विरासत पर टिके रहने से बरकरार नहीं रह सकती, बल्कि इसके लिए लगातार संगठनात्मक नवीनीकरण, समाज के बदलते वर्गों का प्रतिनिधित्व और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के साथ निरंतर संवाद अनिवार्य होता है.
Lalu Prasad Yadav: भारतीय लोकतंत्र में लालू प्रसाद यादव की पहचान एक खास राजनीतिक शैली…
बदायूं के चर्चित दोहरे हत्याकांड (ऑनर किलिंग के मामले) में सेशन कोर्ट द्वारा सुनाई गई…
LEOPARD PANIC IN AYODHYA CANTT: रामनगरी अयोध्या से सटे कैंट (छावनी) इलाके में पिछले कई…
बिहार में गंडक समेत कई नदियों के बढ़ते जलस्तर के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने…
ADANI AHMEDABAD MARATHON LAUNCH: गुजरात के उपमुख्यमंत्री और खेल मंत्री हर्ष सांघवी ने 29 नवंबर…
लालू प्रसाद यादव ने भारतीय लोकतंत्र को देसी अंदाज और सामाजिक न्याय की भाषा दी.…