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दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधित बिल 2026 पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया, 22 जुलाई को होगी अगली सुनवाई

दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधित बिल 2026 को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, देश के सभी राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. दायर याचिका में बिना किसी मेडिकल दखल के, अपने लिंग का स्वयं निर्धारण करने के अधिकार की मांग की गई है. कोर्ट 22 जुलाई को मामले में अगली सुनवाई करेगा. यह याचिका डॉक्टर चंद्रेश जैन की ओर से दायर की गई है. इस संशोधन में साल 2019 के कानून के आर्टिकल 4(2) हटाने का प्रस्ताव है. इसमें जेंडर के सेल्फ आइडेंटिफिकेशन के अधिकार का जिक्र था.

नई परिभाषा के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति जिनका संबंध किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता जैसे सामाजिक सांस्कृतिक पहचान वाले समुदाय से है, उन्हें ट्रांसजेंडर माना जाएगा. इसके अलावा इंटरसेक्स लोगों को भी इस परिभाषा के अन्तर्गत रखा गया है. इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि यह 2019 कि तुलना में ट्रांसजेंडर पहचान को सीमित कर देती है. इसमें अब सेल्फ आइडेंटिफिकेशन वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जगह नहीं मिली है. इसके अलावा नए बिल में सजा का भी प्रावधान है, नए बिल में बच्चों को ट्रांसजेंडर बनाने पर आजीवन कारावास की सजा व 5 लाख रुपए जुर्माना का प्रावधान है.

किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी

वही बालिग के मामले में 10 साल तक कि सजा व दो लाख तक का जुर्माना हो सकता है. इसको लेकर किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर प्रोफेसर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कहा कि सरकार हमारे समुदाय को ट्रांस्फोबिक अधिकारी से बचाए, क्योंकि ये अधिकारी हमारी भावनाओं को नही समझ रहे है. उन्होंने कहा कि बिल बनाते वक्त हमारी कम्युनिटी से कोई संवाद नही किया गया. और बिल को जल्दबाजी में लाया गया. नए संशोधित बिल के मुताबिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अब अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार नही होगा, ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आवश्यक होगी. ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए सख्त सजा हो सकती है. ऐसे में खुद को ट्रांसजेंडर मानने वाले लाखों लोग इस कैटेगरी से बाहर हो जाएंगे.

2019 के एक्ट में यह प्रावधान था कि कोई भी शख्स अपनी इच्छा से खुद को ट्रांसजेंडर घोषित कर सकता था और उसके बाद उसे डीएम से सर्टिफिकेट मिल जाता है. लेकिन अब यह व्यवस्था समाप्त हो गई है और मेडिकल टेस्ट कराना जरूरी कर दिया गया है. मेडिकल टेस्ट के बाद ही डीएम किसी को ट्रांसजेंडर का सर्टिफिकेट दे पाएंगे.

पहचान के लिए कोई मेडिकल जांच जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने नालसा बनाम भारत संघ 2014 के केस में यह फैसला सुनाया था कि खुद की पहचान मौलिक अधिकार है. कोई भी व्यक्ति यह तय कर सकता है कि वह पुरुष है, महिला है या फिर ट्रांसजेंडर है. इसके लिए किसी मेडिकल जांच की जरूरत नही है. साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कानून सेवा प्राधिकरण से जुड़े फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता दी थी.

ये भी पढ़ें: देशभर में सक्रिय हैं बच्चों को बेचने वाले गिरोह, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को कहा- ‘सिर्फ निगरानी हमारा काम, कार्रवाई आपको ही करनी होगी’

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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