प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई से देश के सबसे बड़े गोल्ड रिफाइनर्स में शुमार ‘राजेश एक्स्पोर्ट्स’ की आने वाले समय में मुश्किलें बढ़ सकती हैं. मामले की जांच कर रही एजेंसी ईडी ने राजेश एक्स्पोर्ट्स पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. ईडी के अनुसार, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 के तहत चल रही जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.
हाल ही में यानी 23 जून को ईडी ने राजेश एक्स्पोर्ट्स के कई ठिकानों पर छापेमारी की है. इस कार्रवाई के दौरान ईडी ने कई बेहद संवेदनशील डिजिटल डिवाइस, वित्तीय दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत अपने कब्जे में लिए हैं, जो कंपनी के भीतर चल रही बड़ी वित्तीय गड़बड़ी की ओर इशारा कर रहे हैं.
जांच में सबसे बड़ा खुलासा टॉप मैनेजमेंट की सैलरी शीट को लेकर हुआ है. राजेश एक्स्पोर्ट्स का कंसोलिडेटेड टर्नओवर लगभग 7.7 लाख करोड़ रुपये है, लेकिन इसके बावजूद वरिष्ठ अधिकारियों की सैलरी कौड़ियों में दर्ज है. ईडी की अब तक की जांच में खुलासा हुआ है कि मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) को साल 2020 से सैलरी नहीं मिली है, जबकि कंपनी के प्रबंध निदेशक (MD) का मासिक वेतन सिर्फ 17,000 रुपये बताया जा रहा है. इसने जांच एजेंसी के कान खड़े कर दिए हैं और एजेंसी इसे एक बड़े सिंडिकेट से जोड़कर देख रही है.
ईडी की पूरी जांच विदेशों में हुए संदिग्ध ट्रांजेक्शन पर टिकी हुई है. लेकिन ईडी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि कंपनी विदेशों में हुए लेन-देन से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों को उपलब्ध नहीं करा पा रही है. ईडी की मानें तो राजेश एक्स्पोर्ट्स आयात, निर्यात, विदेशी निवेश और पेमेंट्स के सेटलमेंट से जुड़े दस्तावेज दिखाने में विफल रही है, जिससे ट्रांजेक्शन का सत्यापन मुश्किल हो गया है. खास तौर पर कंपनी द्वारा अफ्रीकी देशों की सोने की खदानों में किए गए करीब 1,035 करोड़ रुपये के निवेश को लेकर कोई ठोस दस्तावेज एजेंसी को नहीं मिले हैं और कंपनी ने इससे जुड़े दस्तावेज भी नहीं सौंपे हैं.
जांच के दौरान करीब 3,000 करोड़ रुपये के विदेशी व्यापार की प्राप्तियों और देनदारियों के मनमाने समायोजन (एडजस्टमेंट) का मामला भी सामने आया है. ईडी के हाथ लगे सबूतों से यह पता चलता है कि कंपनी ने बिना किसी ठोस व्यावसायिक आधार के कुछ संदिग्ध विदेशी शेल कंपनियों के साथ इन पैसों का हेरफेर किया. इनके तार मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) समेत कुछ अन्य टैक्स हैवन देशों से जुड़े हुए हैं. ईडी इस बात का पता लगाने में जुटी है कि आखिर 3,000 करोड़ रुपये के इस ट्रांजेक्शन का असली मकसद क्या था.
सबसे चौंकाने वाली बात कंपनी के स्टॉक रिकॉर्ड को लेकर सामने आई है. ईडी का दावा है कि फैक्ट्री में मौजूद वास्तविक स्टॉक और कंपनी के रिकॉर्ड में दर्ज स्टॉक के बीच लगभग 40% का अंतर पाया गया है. यानी कागजों में जो माल दिखाया गया, उसका बड़ा हिस्सा मौके पर मौजूद नहीं था. यह अंतर जांच एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है.
ईडी की शुरुआती जांच में सामने आया है कि कंपनी के शेयरों में लगातार कुछ संदिग्ध ब्लॉक डील की जा रही थीं, ताकि बाजार को गुमराह किया जा सके. इसमें चौंकाने वाली बात यह है कि इस खेल में उन चेहरों के नाम भी शामिल दिख रहे हैं, जिनका जिक्र पूर्व में खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन (ICIJ) की वैश्विक रिपोर्ट्स में आ चुका है. आशंका जताई जा रही है कि एनआरआई (NRI) बेनामी खातों का एक जाल तैयार किया गया था, जिसके जरिए शेयरों की कीमतों को कृत्रिम रूप से प्रभावित किया गया और इसी हेरफेर के रास्ते करीब 600 करोड़ रुपये से अधिक की रकम को अवैध रूप से भारत की सीमा से बाहर भेज दिया गया.
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यह कंपनी तब सुर्खियों में आई थी, जब मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI) ने आरोप लगाया कि राजेश एक्स्पोर्ट्स ने 15.15 लाख करोड़ रुपये का फर्जी निर्यात दिखाया है. सेबी ने कंपनी और उसके प्रमोटर राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी किया और जांच पूरी होने तक कंपनी के शेयरों में खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी. बता दें कि साल 1989 में बेंगलुरू से राजेश एक्स्पोर्ट्स ने बहुत छोटे स्तर पर अपना बिजनेस शुरू किया था और देखते ही देखते सोने की रिफाइनिंग, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट की पूरी वैल्यू चेन पर अपना एकछत्र राज कायम कर लिया था.
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