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ED समन पर बवाल: SCAORA ने सुप्रीम कोर्ट से की हस्तक्षेप की मांग, वकीलों की स्वतंत्रता पर खतरे की चेतावनी

Legal News: सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रताप वेणुगोपाल को ईडी द्वारा जारी किए गए स्वतः संज्ञान लेने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन ने सीजेआई बीआर गवई को पत्र लिखा है. ईडी ने प्रताप वेणुगोपाल को यह समन एक मुवक्किल को दी गई कानूनी सलाह के सिलसिले में जारी किया गया है.

18 जून को ईडी ने यह समन जारी किया है समन वेणुगोपाल द्वारा रेलिगेयर इंटरप्राइजेज लिमिटेड (आरईएल) की पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर रश्मि सलूजा को दिए गए कर्मचारी स्टॉक स्वामित्व योजना (ईएसओपी) के संबंध में मेसर्स केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड को दी गई कानूनी सलाह से जुड़ा हुआ है. ईडी ने प्रताप वेणुगोपाल को 27 जून को बॉम्बे के ईडी दफ्तर में पेश होकर बातचीत की सभी रिकॉर्ड पेश करने को कहा है.

वकालत की स्वतंत्रता पर उठते सवाल

SCAORA ने सीजेआई से आग्रह किया है कि वे इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करें, ताकि न्यायपालिका की गरिमा और वकालत की स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित किया जा सके. एडवोकेट्स-ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन द्वारा सीजेआई को लिखे पत्र में कहा गया है कि इस प्रकार के समनों की कानूनी वैधता की जांच की जाए, जो वकीलों को उनके अच्छे विश्वास में दी गई कानूनी राय के लिए जारी किया जाता है.

संवैधानिक और व्यावसायिक सुरक्षा को बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने की मांग की गई है. यह कानूनी सलाह जब दी गई थी तब वरिष्ठ वकील अरविंद दातार थे और वेणुगोपाल एओआर के रूप में सहयोग कर रहे थे.बता दें कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अरविंद पी दातार को ईडी द्वारा जारी समन पर नाराजगी जताई थी. हालाकिं ईडी ने समन को वापस ले लिया है.

जांच एजेंसियों की भूमिका पर गंभीर प्रश्न

कथित तौर पर यह समन दातार द्वारा एक क्लाइंट, केयर हेल्थ इंश्योरेंस की दी गई कानूनी राय से जुडा था, जो रेलिगेयर इंटरप्राइजेज की पूर्व चेयरमैन रश्मि सलूजा को जारी किए गए ईएसओपी के बारे में था. SCAORA ने ईडी की कार्रवाई की कड़ी अस्वीकृति और स्पष्ट निंदा करते हुए कहा था कि यह अत्यधिक अनुचित है और कानूनी पेशे की स्वतंत्रता को खतरा पहुचाता है.

ईडी की यह कार्रवाई न केवल अनुचित है, बल्कि जांच के दायरे से बाहर निकलने की एक परेशान करने वाली प्रवृति को दर्शाती हैं, जो कानूनी पेशे की स्वतंत्रता को खतरे में डालती है. कानून के शासन की नींव को कमजोर करती है. जब जांच एजेंसियों केवल कानूनी राय देने के लिए अधिवक्ताओं के खिलाफ बलपूर्वक उपाय करती हैं, तो वे केवल व्यक्तियों को ही निशाना नहीं बनाती है.

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-भारत एक्सप्रेस 

गोपाल कृष्ण

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