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सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर पहुंची सरकार, आखिर किस कानून को चाहती है हटाना?

आयुर्वेदिक, सिद्ध या यूनानी दवाओं के भ्रामक विज्ञापनों पर अंकुश लगाने से संबंधित कानून को हटाने की मांग लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक रूल्स 1945 के नियम 170 के सरकार के फैसले पर रोक लगा दिया था. साथ ही इससे जुड़े आयुष मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना को रद्द कर दिया था.

यह नियम 170 आयुवेदिक, सिद्ध या यूनानी दवाओं के भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाता है. इसके तहत लाइसेंसिंग प्राधिकारी की मंजूरी के बिना तीनों पद्धतियों की दवाओं का कोई भी विज्ञापन नहीं जारी किए जाने का प्रावधान है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस संदीप मेहता बेंच द्वारा पिछले साल 27 अगस्त को जारी आदेश को वापस लेने की मांग की है.

क्या तर्क दिया गया?

याचिका में कहा गया है कि नियम 170 के तहत लगाए गए प्रतिबंध केवल आयुष उद्योग पर ही लागू होते हैं, जबकि अन्य उद्योग जैसे एलोपैथिक फार्मास्युटिकल्स, न्यूट्रास्युटिकल्स, सौंदर्य प्रसाधन और खाद्य पूरक अपने उत्पादों का विज्ञापन के लिए छूट है, जिसमें मशहूर हस्तियों द्वारा विज्ञापन भी शामिल है.

  • यह चयनात्मक प्रतिबंध असमान व्यवहार के समान है.
  • अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है.
  • संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है.

2023 में सरकार ने लगा दी थी रोक

बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा 2023 में जारी एक पत्र ने पहले नियम 170 को लागू करने पर प्रभावी रूप से रोक दिया था. इस पत्र में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया था कि वे भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ इस नियम को लागू न किया जाए. क्योंकि सलाहकार बोर्ड ने इसे हटाने की सिफारिश की थी.

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सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इंडियन मेडिकल एसोसिएशन व अन्य की ओर से दायर याचिका पर नाराजगी व्यक्त किया था. साथ ही स्पष्ट किया था कि यह नियम फिलहाल कानून की किताबों में रहेगा. सरकार की ओर से दाखिल अर्जी में कहा है कि नियम 170 की संवैधानिक वैधता को लेकर हितधारकों द्वारा गंभीर चिंता जताई है.

गोपाल कृष्ण

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