दिल्ली उच्च न्यायालय
Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने बिजनेस मैन रतुल पूरी और उनकी मां को मिली राहत को बरकरार रखने का आदेश दिया है. हाई कोर्ट ने इससे पहले जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाला घोषित करने के बैंक ऑफ बड़ौदा के फैसले को रद्द कर दिया था. जस्टिस सी. हरिशंकर और जस्टिस अजय दिगपॉल की पीठ ने बैंक ऑफ बड़ौदा और पंजाब नेशनल बैंक की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया है. बैंक ऑफ बड़ौदा और पंजाब नेशनल बैंक की ओर से सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी.
वर्ष 2019 में मामले में सीबीआई ने मोजर बेयर लिमिटेड के खिलाफ और साल 2020 में मोजर बेयर सोलर लिमिटेड के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी. सीबीआई के मुताबिक, मोजर बेयर और उसके निदेशकों पर विभिन्न बैंकों के साथ घोटाले का आरोप था.
रतुल पुरी और मां पर लगे थे आरोप
यह मामला जांच एजेंसी सीबीआई द्वारा दर्ज किया गया था, जिसमें रतुल पुरी, उनकी मां नीता पूरी और मोजर बेयर इंडिया लिमिटेड को बैंक से लोन देकर पैसे की हेरा फेरी करने का आरोपी बनाया गया था. जिसको राऊज एवेन्यु कोर्ट ने रद्द कर दिया था. जिसके बाद यह मामला हाई कोर्ट पहुंचा था. हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के वर्गीकरण से भविष्य में ऋण से इनकार, आपराधिक कार्यवाही का जोखिम और प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है. कोर्ट ने कहा कि हर चूक जानबूझकर चूक नहीं होती, कदाचार जानबूझकर और सोची समझी होनी चाहिए.
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‘आपराधिक साजिश या धोखाधड़ी का नहीं’
बता दें कि बैंकों ने अपने ही 40 वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ जांच और अभियोजन की सीबीआई को इजाजत नहीं दिया था. जिसपर निचली अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि यह दर्शाता है कि मामला आपराधिक स्वरूप का नहीं है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि जब संबंधित प्राधिकरणों ने बैंक अधिकारियों के खिलाफ पीसी एक्ट की धारा 17ए के तहत जांच की अनुमति नहीं दी, तो यह साफ संकेत है कि यह मामला किसी आपराधिक साजिश या धोखाधड़ी का नहीं है.
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