राजस्थान की प्रमुख जोजरी नदी में अनियंत्रित प्रदूषण और अवैध खनन से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राज्य सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई. शीर्ष अदालत ने अधिकारियों द्वारा नदी की वास्तविक चौड़ाई और खनन गतिविधियों को लेकर अदालत में पेश की गई तथ्यात्मक रिपोर्टों में भारी विसंगतियों पर सख्त नाराजगी जताई. अदालत ने दो टूक शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि झूठी व भ्रामक जानकारियां देने वाले अधिकारियों के खिलाफ आने वाले समय में सख्त जांच के आदेश दिए जा सकते हैं.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने सुनवाई की शुरुआत में ही तल्ख तेवर अपनाते हुए पूछा कि धरातल पर अभी जोजरी नदी की वास्तविक स्थिति क्या है?
‘पुल 1,782 मीटर का और नदी 8 मीटर की? यह बेतुकेपन की हद है’
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने अधिकारियों द्वारा नदी के बहाव क्षेत्र को लेकर दी गई दलीलों पर कड़े सवाल दागे. उन्होंने पूछा कि राजस्थान के अधिकारी आखिर सुप्रीम कोर्ट के किस आदेश के आधार पर यह दावा कर रहे हैं कि नदी की चौड़ाई को केवल सूखे मौसम (Dry Season) के बहाव के हिसाब से मापा जाए? पीठ ने सवाल किया:
“सुप्रीम कोर्ट का कौन सा फैसला या आदेश ऐसा कहता है? हमें वह आदेश दिखाइए और बताइए कि कौन सा अधिकारी ऐसी अजीबोगरीब व्याख्या लेकर अदालत में आया है?”
पीठ ने इसी संदर्भ में लूनी नदी का उदाहरण देते हुए अधिकारियों के आंकड़ों की पोल खोल दी. जस्टिस मेहता ने कहा कि नदी पर बने एक पुल की चौड़ाई लगभग 1,782 मीटर है, जबकि राज्य के अधिकारी ने अदालत में नदी के बहाव की चौड़ाई महज 8 मीटर दर्ज की है. पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अदालत को जो आंकड़े दिए गए हैं, वे पूरी तरह से हास्यास्पद हैं और यह बेतुकेपन की पराकाष्ठा है.
राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि यह लापरवाही जानबूझकर की गई है या नहीं, इसका पता लगाना होगा. कोर्ट ने सरकार के उस दावे पर भी गंभीर सवाल खड़े किए जिसमें लूनी को एक मौसमी नदी बताते हुए कहा गया था कि सूखे के दिनों में इसमें केवल 15.3 एमएलडी (MLD) सीवेज का पाही नी ही बहता है.
गौरतलब है कि इससे पूर्व की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण और जलीय पारिस्थितिकी को हो रहे भारी नुकसान को देखते हुए जोजरी नदी के किनारे से 100 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार के निर्माण या विकास गतिविधियों पर पूर्ण रोक लगा दी थी. अदालत ने स्पष्ट किया था कि हाई फ्लड लाइन (HFL) और जरूरी इकोलॉजिकल बफर जोन तय करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया पूरी होने तक नदी के इकोसिस्टम को बचाने के लिए एक अंतरिम और मापने योग्य सुरक्षा दायरा अनिवार्य है.
पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन और राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) की घोर विफलता पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि क्या इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी जाए?
हालांकि, राजस्थान सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) शिव मंगल शर्मा ने पीठ को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ बेहद सख्त कदम उठा रही है. उन्होंने बताया कि:
पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच के लिए एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के नेतृत्व में विशेष जांच दल (SIT) गठित किया जा रहा है.
दोषी उद्योगों, कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) प्रबंधन और लापरवाह सरकारी अधिकारियों की भूमिका की विस्तृत जांच कर एफआईआर दर्ज की जाएगी.
मामला संज्ञान में आते ही जयपुर से एक विशेष तकनीकी टीम जोधपुर भेजी गई थी, जिसके बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दो अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया और कई वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले किए गए हैं. साथ ही उद्योगों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति (Environmental Compensation) लगाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है.
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